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Thursday, 30 May, 2024
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भारतीय पुलिस को महिलाओं की पसंद पर पहरा लगाना बंद कर देना चाहिए

अपने औपनिवेशकालीन पूर्ववर्तियों की तरह मौजूदा भारतीय पुलिस भी आजाद ख्याल बेटियों को लेकर एक अलग ही तरह की चिंता से ग्रस्त नजर आती है—और यह उनके अधिकारों की रक्षा से जुड़ी कतई नहीं होती है.

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पुलिस संरक्षण में और हजारों की संख्या में उत्साहित ग्रामीणों के साथ, एक किशोरवय दुल्हन लाल जोड़े में अपने घर में प्रवेश करती है. उसकी कलाइयां शंख-चूड़ियों से भरी हुई हैं, और माथे पर सिंदूर चमक रहा है. स्थानीय हिंदुओं ने आरोप लगाया कि दलित दिहाड़ी मजदूर रजनीकांत नाथ की पत्नी जशोदा सुंदरी का मुस्लिमों की भीड़ ने अपहरण कर लिया था. हालांकि, आरोपी मुस्लिमों के वकीलों की दलील थी कि गरीबी और अपने पति के दुर्व्यवहार से तंग आकर जशोदा ने वास्तव में इस्लाम धर्म अपनाने के बाद अपना घर छोड़ दिया.

इतिहासकार प्रदीप कुमार दत्ता के मुताबिक, 1926 में इस मामले पर अपना फैसला सुनाने वाले चटगांव के मजिस्ट्रेट ने जशोदा सुंदरी के बारे में कहा था, ‘धर्मांतरण की वजह से उसका शरीर तो मुसलमान हो गया है लेकिन शादी के कारण उस पर उसके पति का ही अधिकार है.’

तबसे लेकर नई दिल्ली में श्रद्धा वालकर की नृशंस हत्या तक, अब ‘लव-जिहाद’ कहे जाने वाले सदियों पुराने इस मुद्दे पर बहस जारी ही रही है, और हिंदू दक्षिणपंथियों की शह मिलने से यह अब और तेज हो गई है. देशभर में हिंदू राष्ट्रवादी समूह इस बात पर जोर देते रहे हैं कि महिलाओं को बहला-फुसलाकर या जबर्दस्ती अंतर्धार्मिक संबंधों के लिए बाध्य किए जाने के खिलाफ अधिक कड़े कानून बनाए जाने चाहिए.

अभिनेत्री तुनिषा शर्मा, रायचूर फ्लावर-शॉप पर काम करने वाले भारती और रेहान, तनु शर्मा और इरफान शेख—उपनिवेशकालीन भारत के आखिरी दशकों की तरह मौजूदा समय में भी धार्मिक पहचान की जहरीली राजनीति ने अंतर्धार्मिक संबंधों को बेहद जटिल विवादित मुद्दा बना दिया है.

भारत में उपनिवेशकाल के अंतिम दौर में जशोदा और उसकी जैसी तमाम महिलाओं की कहानी बताती है कि कैसे महिलाओं की पुलिसिंग ने उन्हें न केवल एजेंसी की सुरक्षा से वंचित किया बल्कि उन्हें दुर्व्यवहारपूर्ण रिश्तों में धकेलकर उनके जीवन को खतरे में डाला. अब, समय आ गया है कि भारत महिलाओं की पसंद पर पहरा लगाना बंद करे और इसकी बजाये उन पुरुषों पर शिकंजा कसे जो उनके लिए खतरा बने हुए हैं.

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बगावती बेटियां और जोखिम-भरे रिश्ते

प्यार करना घातक भी हो सकता है. समाज के खिलाफ जाकर प्रेम संबंध बनाने वाली बेटियां की हत्या के मामलों से कोई धर्म अछूता नहीं बचा है. हाल के कुछ महीनों में आयुषी चौधरी, विजया कांबले और अमीना खातून जैसी न जाने कितनी लड़कियां जाति और धर्म के सम्मान के नाम पर मौत के घाट उतार दी गईं. खुशी अहमद का एक हिंदू से शादी करना नई दिल्ली में दंगे भड़कने की वजह बना. पिछले साल, सर्वेश कुमार ने अपनी बेटी का कटा सिर हरदोई की सड़कों पर सार्वजनिक तौर पर दिखाया.

उन्नीसवीं शताब्दी के बाद से भारत में जातिगत और धार्मिक समुदायों ने यौन संबंधों को लेकर सामाजिक मानदंडों के उल्लंघन पर किसी भी हद तक जाने में कोई गुरेज नहीं किया है. यहां तक कि जब महिलाओं ने अपने रिश्तों या धर्मांतरण को स्वैच्छिक बताया—जैसा कि जशोदा ने किया था—तो उनके साथी को अमूमन जेल की हवा ही खानी पड़ी है.

1872 के बाद कॉलोनियल स्टेट ने प्रेमी युगलों के लिए अपने धर्म से परे जाकर शादी करने की राह खोली—लेकिन केवल तभी जब वह अपने खुद के धर्म को त्यागने को तैयार हों. परवेज मोदी लिखते हैं, इसे लेकर उग्र विरोध प्रदर्शन हुए. मेरठ के निवासियों के एक समूह ने दावा किया ‘इस देश की महिलाएं आम तौर पर अशिक्षित हैं और अपना भला-बुरा नहीं समझ सकती हैं, और बुरे चरित्र वाले पुरुषों के लिए उन्हें बहला-फुसलाकर रजिस्ट्रार के सामने ले जाना जरा भी मुश्किल नहीं होगा.’ इस सबके पीछे सबसे बड़ी चिंता जाति को लेकर थी.

औपनिवेशकालीन पुलिस अक्सर खुद को इन विवादों में उलझा पाती थी. 1860 में लागू की गई भारतीय दंड संहिता में माना गया कि महिलाओं को आसानी से बहलाया-फुसलाया जा सकता है और उनके अपहरण का खतरा रहता है. इसी धारणा के साथ अवैध संभोग यानी विवाहेतर रिश्तों को लेकर कानून निर्धारित किया गया. कानून का इस्तेमाल अक्सर नियम विरुद्ध माने जाने वाले रिश्तों को तोड़ने के लिए पुलिसिया कार्रवाई में किया जाता था.

समकालीन बंगाली सच्ची-अपराध कथाएं हमें बताती है कि औपनिवेशिक भारत में महिलाएं अपनी स्वतंत्र सोच रखती थी—और उनकी इच्छाएं उस समय भी पुरुषों में भय की भावना पैदा करती थीं, जैसा कि आज करती हैं. साहित्य ऐसी महिलाओं से भरा पड़ा है, जो प्रेमियों के साथ गोपनीय संबंध रखती थीं, और अपने अनुकूल न होने वाले पुरुषों के साथ भाग भी जाती थीं. और 1861 में स्थापित आधुनिक भारतीय पुलिस बल ने इन मानदंडों को लागू कराने का जिम्मा संभाल लिया था—उन्हें महिलाओं की यौन पसंद का बचाव करने से कोई लेना-देना नहीं था.


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‘लव जिहाद’ का उदय

‘लव जिहाद’ उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तब अस्तित्व में आया जब अपनी-अपनी सांप्रदायिक पहचान को सुरक्षित बनाए रखने के लिए हिंदू और मुस्लिम पुनरुत्थानवादी आंदोलनों का मोर्चा खुला. और महिलाओं का शरीर हिंदू राष्ट्रवाद और इस्लामी पुनरुत्थानवाद के बीच इस जंग का मैदान बन गया. इतिहासकार चारु गुप्ता के मुताबिक, हिंदी फिक्शन ‘कामुक मुस्लिम पुरुषों के यौन-आवेश में हिंदू महिलाओं के शरीर की शुद्धता भंग करने’ वाली कल्पनाओं से भर गए. पूरे उत्तर भारत में ही हिंदुओं की तरफ से चेताया जाने लगा कि महिलाओं का जबरन धर्मांतरण अस्तित्व पर खतरा बनकर मंडराने लगा है. कुछ खास भ्रामक पर्चे जगह-जगह बंटने लगे जिसमें लिखा था, ‘वे शहरों और गांवों में गाड़ियों से घूमते हैं और उन महिलाओं को ले जाते हैं जिन्हें पर्दे में रखकर मुसलमान बना दिया जाता है.’

‘लव जिहाद’ कई मौकों पर टकराव की वजह बना—1924 में कानपुर के डिप्टी कमिश्नर रजा अली और एक हिंदू विधवा के बीच प्रेम संबंधों को लेकर अच्छा-खासा बवाल मचा, जबकि चार साल बाद मथुरा में एक अपहरण की अफवाह पर दंगे भड़क उठे. फिर, आज की तरह नियम-कायदों का पालन कराने के नाम पर कई सतर्क नागरिक संगठन भी बन गए.

गुप्ता के मुताबिक, ‘1927 में जौनपुर के शाहगंज में एक मुस्लिम और उसकी पत्नी को आर्य समाजियों की तरफ से दो बार रोका गया और उस महिला को यह साबित करने के लिए अपना चेहरा और हाथ दिखाने पर मजबूर किया गया कि वह हिंदू नहीं थी, जिसका अपहरण किए जाने की बात सामने आई है.’

आमतौर पर, शांति बनी रहे और औपनिवेशिक सत्ता पर किसी तरह की आंच न आए इसलिए अपहरण की ऐसी घटनाओं की कथित पीड़िताएं उनके परिवारों के पास पहुंचा दी जाती थीं. पुलिस रिकॉर्ड बताता है कि खुद महिलाओं से शायद ही कभी उनकी इच्छा पूछी जाती हो.

दागदार राजनीति

इतिहासकार यास्मीन खान ने लिखा है, जब तक द्वितीय विश्व युद्ध चला, मिसिजनेशन यानी अलग-अलग नस्ल के लोगों के बीच यौन रिश्तों को लेकर फिर से चिंताएं गहरा गई थीं. एक तो अकाल प्रभावित बंगाल में वैसे ही सेक्स वर्क बढ़ गया था, और भुखमरी की स्थितियों के बीच बड़ी संख्या में अमेरिकी और अफ्रीकी सैनिक भी बंगाल पहुंच गए थे. मुस्लिम लीग नेता अबुल कासिम फजलुल हक ने शिकायत की थी कि उन्हें लेजिस्लेटिव असेंबली में करीब 30,000 मुस्लिम महिलाओं के बारे में सवाल उठाने से रोक दिया गया, जिनके बारे में उनका कहना था कि उन्हें सहयोगी सेना के जवानों की सेवाएं करने के लिए भेज दिया गया था.

दिल्ली के अखबार अंसारी ने लिखा, ‘कुछ लोगों की रगों में अमेरिकी खून दौड़ेगा तो कुछ की रगों में अंग्रेजी. जबकि अन्य में विभिन्न समुदायों के भारतीय सैनिकों का खून दौडेगा. इस प्रकार एक पूरी बास्टर्ड पीढ़ी हमारे बीच आ जाएगी.’ एंग्लो-इंडियन रिव्यू ने समुदाय की महिलाओं पर दबाव बढ़ाया, ‘सिनेमा और डांस हॉल जाना रोकें और उन्हें रसोई और सिलाई मशीन चलाने तक सीमित करें.’

मिसिजनेशन को लेकर इंपीरियल रिलेशनशिप के दूसरे पक्ष को भी कम चिंताएं नहीं सता रही थीं. अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने इस वास्तविकता को यद्यपि स्वीकार लिया था कि भारत में उनके सैनिक सेक्स करेंगे, इसलिए उन्होंने सैनिकों के दक्षिणी एशिया में अपनी सेवाएं देने के दौरान शादी करने पर रोक लगा दी थी. लेफ्टिनेंट जनरल जोसेफ ‘विनेगर जो’ स्टिलवेल ने निजी तौर पर स्वीकारा था कि नियम का उद्देश्य ‘मिश्रित नस्ल के बच्चों के पैदा होने की समस्या को रोकना था.’ नए गणतंत्र ने भले ही महिलाओं के लिए समानता का वादा किया, लेकिन परंपरा के नाम पर उनकी पसंद-नापसंद को बेड़ियों में जकड़ने की कोशिशें बदस्तूर जारी रहीं.

मथुरा के पास मेहराना गांव में करीब पांच सौ लोग यह देखने जुटे थे कि कैसे एक युगल के माता-पिता ने अपने किशोर बच्चों के गले में फंदा कस दिया है. अठारह वर्षीय विजेंद्र जाटव को उच्च जाति की लड़की रोशनी के साथ भाग जाने की हिमाकत करने के लिए रात भर प्रताड़ित किया गया था. उसे उल्टा लटका दिया गया था, और पैरों और तलवों पर लाठियों से वार किए गए. उसके मुंह में जलता कपड़ा भी ठूंस दिया गया था.

फिर, सुबह विजेंद्र और रोशनी को बाहर निकाला गया और उन्हें भगाने में मदद करने वाले दोस्त के साथ ही एक बरगद के पेड़ पर लटका दिया गया. 1991 में घटी इस वारदात के लिए अंततः आठ लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई—और समुदाय के नेताओं की नजर में इस कृत्य को अंजाम देने वाले सम्मानित नायक बन गए. किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने इन हत्याओं के बाबत कहा था. ‘मैं भी ऐसा ही करता.’

अपने पहले और बाद वाले हजारों लोगों की तरह ही रोशनी और विजेंद्र ने भी पुलिस की मदद लेने की हिम्मत नहीं की. भले ही कानून ने उन्हें सुरक्षा की गारंटी दे रखी हो लेकिन इस जोड़े को पता था कि प्रशासन को वैधता परंपरा बनाए रखने से मिलती है न कि महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा करने से.

तीन दशकों के बाद भी थोड़ा-बहुत ही बदलाव आया है. महिलाओं के लिए पुलिस सुरक्षा बढ़ाने के लिए निर्धारित धनराशि बर्बाद हो रही है, जबकि यौन अपराधों के पीड़ितों की सहायता के लिए हेल्पलाइन और आपात सहायता केंद्र स्थापित करने पर धनराशि खर्च ही नहीं की गई है.

अपनी पसंद—और एडल्टहुड—की कभी-कभार भारी कीमत चुकानी पड़ जाती है. कई अन्य महिलाओं की तरह श्रद्धा वालकर ने भी एक ऐसा घातक रिश्ता चुना, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.

सरकार के स्तर पर जरूरी है कि महिलाओं को जरूरत पड़ने पर मदद लेने में सक्षम बनाए—न कि उन्हें अपनी पसंद का विकल्प चुनने पर दंडित करने वाले कदम उठाए जाएं. परेशान करने वाला सवाल तो यह है कि वह पुलिस या अपने परिवार से मदद लेने में असमर्थ क्यों रही, न कि यह कि उसने अपनी पसंद से कैसा साथी चुन लिया था.

(लेखक दिप्रिंट में नेशनल सिक्योरिटी एडिटर हैं. वह @praveenswami पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(अनुवादः रावी द्विवेदी | संपादनः ऋषभ राज)
(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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