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Wednesday, 1 April, 2026
होमदेश'वोटर लिस्ट पहले से ही 99% ठीक थी'—पूर्व CEC एसवाई कुरैशी ने SIR की जरूरत पर उठाए सवाल

‘वोटर लिस्ट पहले से ही 99% ठीक थी’—पूर्व CEC एसवाई कुरैशी ने SIR की जरूरत पर उठाए सवाल

'भारत जोड़ो अभियान' द्वारा आयोजित 'चुनावी निष्पक्षता के समक्ष चुनौतियां' विषय पर एक पैनल चर्चा में बोलते हुए, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय के रूप में भी देखा जाना चाहिए.

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नई दिल्ली: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने मंगलवार को कहा कि मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की कोई जरूरत नहीं थी. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया का मतलब यह निकलता है कि मौजूदा सूचियों को “कूड़ेदान में फेंक दिया गया”.

उन्होंने कहा, “हमारी प्रणाली पहले ही 99 प्रतिशत सटीकता तक पहुंच चुकी थी, और यह 30 साल की मेहनत से हुआ था. SIR की जरूरत नहीं थी क्योंकि मतदाता सूची का डिजिटलीकरण शेषन साहब के समय से ही किया जा रहा था. सूचियां डिजिटल हो चुकी थीं और उनमें 99 प्रतिशत सटीकता थी.”

टी.एन. शेषन 1990 से 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त थे.

उन्होंने आगे कहा, “यह पूछना जरूरी है कि ऐसा कौन सा जादू है जिससे दो महीने में वह काम किया जा रहा है, जिसे हम 30 साल में भी पूरी तरह नहीं कर पाए और 99 प्रतिशत तक ही पहुंचे.”

कुरैशी नई दिल्ली में भारत जोड़ो अभियान द्वारा आयोजित ‘चुनावी ईमानदारी की चुनौतियां: हाल के चुनावी हेरफेर के सबूतों की जांच’ विषय पर एक पैनल चर्चा में बोल रहे थे.

इस पैनल में अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार परकाला प्रभाकर, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण, भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव और पीटीआई के पूर्व संपादक राजेश महापात्रा भी शामिल थे.

कुरैशी ने कहा कि संविधान के अनुसार मतदाता सूची पूरी तरह सही होनी चाहिए, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि “पहले भी यह काम सही तरीके से किया जा रहा था.”

उन्होंने कहा कि 2003 में यह तय किया गया था कि जब मतदाता सूची डिजिटल हो चुकी है, तो केवल संक्षिप्त पुनरीक्षण किया जाएगा ताकि मौजूदा या भविष्य की गलतियों को दूर किया जा सके.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, “पहले के चुनाव आयोग के पास भी उतनी ही समझ थी जितनी आज के आयोग के पास है, और इस फैसले के पीछे तर्क और कारण थे कि संक्षिप्त पुनरीक्षण से भी वही परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.”

कुरैशी के बोलने से पहले, प्रभाकर ने ‘क्या इस चमत्कार के पीछे कोई गड़बड़ी थी’ शीर्षक से प्रस्तुति दी, जिसमें 2024 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया.

उन्होंने कई सवाल उठाए और मतदाता मतदान के आंकड़ों में कथित गड़बड़ियों की ओर ध्यान दिलाया.

महापात्रा ने भी एक प्रस्तुति दी, जिसमें ओडिशा में 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान 12.48 प्रतिशत “मतदान बढ़ोतरी” का विश्लेषण किया गया और 18 संसदीय क्षेत्रों पर इसके “गणितीय प्रभाव” को समझाया गया.

इसके बाद यादव ने असम में विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों के लिए 2023 में हुई परिसीमन प्रक्रिया पर बात की. उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया “गैर-निष्पक्ष तरीके से सीमाएं तय करने” यानी जेरिमैंडरिंग जैसी थी और इसका इस्तेमाल चुनावी हेरफेर के लिए किया गया.

इन प्रस्तुतियों के बाद बोलते हुए, कुरैशी ने कहा कि इन खुलासों के बाद उन्हें नींद आने में दिक्कत हो सकती है, क्योंकि वह इन दावों को समझने और “हजम” करने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने मतदान प्रतिशत के आंकड़ों और फॉर्म 17C से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया, जिसमें हर मतदान केंद्र पर डाले गए वोटों का विवरण होता है, और कहा कि यह “रियल टाइम डेटा” होना चाहिए.

मतदान प्रतिशत में कथित गड़बड़ी पर उन्होंने एक सवाल उठाया, “हर मतदान केंद्र पर कम से कम पांच अधिकारी अंदर और पांच बाहर होते हैं. ऐसे में किसी भी गड़बड़ी के लिए हर केंद्र पर 10 लोगों को शामिल करना होगा. 3,500 केंद्रों के लिए 35,000 लोगों को शामिल करना पड़ेगा. यह कैसे संभव है, मुझे समझ नहीं आता.”

उन्होंने कहा कि भले ही इन गड़बड़ियों पर शोध गहराई से किया गया है, लेकिन इन सवालों के जवाब भी जरूरी हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि वह चुनावी डेटा, जिसमें फॉर्म 17C भी शामिल है, के फॉरेंसिक ऑडिट की मांग का समर्थन करते हैं क्योंकि “चुनाव न केवल निष्पक्ष होने चाहिए बल्कि निष्पक्ष दिखने भी चाहिए और भरोसेमंद होने चाहिए.”

उन्होंने कहा, “छुपाने के लिए कुछ नहीं है. चुनाव आयोग पहले एक खुली किताब की तरह था.”

कुरैशी ने ईवीएम बदलने के आरोपों पर भी सवाल उठाया और समझाया कि ईवीएम को कैसे सील किया जाता है और मतगणना के दिन कैसे संभाला जाता है.

उन्होंने कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि यह कैसे संभव है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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