नयी दिल्ली, चार फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यू यू ललित ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम समय की कसौटी पर खरा उतरा है और कुछ संशोधनों को छोड़कर यह 150 साल पहले की तरह ही मूल स्वरूप में कायम है।
शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने रतनलाल और धीरजलाल की किताब ‘द लॉ ऑफ एविडेंस’ के 26 वें संस्करण के विमोचन के अवसर पर यह बात कही। न्यायमूर्ति ललित ने कहा कि दहेज से संबंधित अपराधों, यौन अपराधों और तकनीकी प्रगति मामलों से संबंधित तीन संशोधनों को छोड़कर, 1872 का भारतीय साक्ष्य अधिनियम मुख्य रूप से एक ही है और एक ‘‘शानदार कृति’’ है।
उन्होंने कहा, ‘‘साक्ष्य अधिनियम मुख्य रूप से वही है, जो हमें 150 साल पहले मिला और यह एक उत्कृष्ट कार्य है।’’ न्यायाधीश ने कहा, ‘‘संशोधन के तीन सेट को छोड़कर, हमारे पास अभी भी मूल पाठ है…साक्ष्य का कानून समय की कसौटी पर खरा उतरा है और मूल साक्ष्य अधिनियम का मसौदा तैयार करने के लिए लेखक सम्मान के हकदार हैं।’’
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी एन प्रकाश डिटिजल तरीके से आयोजित विमोचन कार्यक्रम के सम्मानित अतिथि थे।
भाषा आशीष दिलीप
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