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Wednesday, 29 May, 2024
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‘हर बार नई समय सीमा’, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर बाड़ लगाने के काम में क्यों हो रही है देरी

इस जनवरी से 915.35 किमी सीमा पर बाड़ लगाने का काम बाकी था. दिप्रिंट के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले साल केवल 35 किमी पर फेंसिंग हुई, जिसके बाद लक्ष्य को पूरा करना एक कठिन काम लगता है.

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नई दिल्ली: दिप्रिंट के एक विश्लेषण के अनुसार गृह मंत्रालय (एमएचए) – जो भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर फेंसिंग का काम देखता है, भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096.7 किमी लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का काम, निर्धारित समय सीमा – मार्च 2024 तक पूरा नहीं कर सकेगा.

मंत्रालय की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट (2022-23) के अनुसार, एमएचए के बॉर्डर मैनेजमेंट डिवीज़न-I ने 3,180.65 किमी सीमा पर फेंस लगा दिया था, जबकि 915.35 किमी मार्च 2024 तक पूरा किया जाना बाकी था.

पिछले पांच वर्षों में जिस गति से फेंसिंग का काम आगे बढ़ा है, उसे देखते हुए पता चलता है कि 2022-23 में, केवल 35.653 किमी पर बाड़ लगाई गई थी, जिस कारण समय सीमा पर काम पूरा करना कठिन है.

अपनी ओर से, गृह मंत्रालय ने सीमा पर फेंसिंग में देरी के लिए भौगोलिक और नौकरशाही कारणों का हवाला दिया है. मंत्रालय ने अपनी पिछली कुछ वार्षिक रिपोर्टों में कहा, “नदी/निचले इलाकों, सीमा के नजदीक बस्तियों, लंबित भूमि अधिग्रहण मामलों और सीमावर्ती आबादी के विरोध के कारण इस सीमा पर कुछ हिस्सों में बाड़ लगाने के निर्माण में कुछ समस्याएं आई हैं, जिससे परियोजना के पूरा होने में देरी हो रही है.”

बांग्लादेश के साथ भारत की सीमा की कुल लंबाई में से 2,216.7 किमी पश्चिम बंगाल में, 856 किमी त्रिपुरा में, 443 किमी मेघालय में, 318 किमी मिजोरम में और 263 किमी असम में है.

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गृह मंत्रालय की रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं है कि शेष 915.35 किमी की सीमा लंबाई का कितना हिस्सा फिजिकल फेंसिंग द्वारा कवर किया जाएगा और कितना हिस्सा नॉन-फिजिकल साधनों जैसे- इन्फ्रारेड किरणों, लेजर किरणों या निगरानी जैसी प्रौद्योगिकी माध्यम से कवर किया जाएगा.

दिप्रिंट ने सीमा प्रबंधन-I प्रभाग को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी है, जिसमें पूछा गया है कि क्या समय सीमा अभी भी पूरी की जा सकती है, साथ ही विस्तार के कारणों के बारे में भी पूछा है. जवाब मिलने पर रिपोर्ट अपडेट कर दी जाएगी.


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हर बार नई समय सीमा

एक सहकर्मी-समीक्षित अकादमिक जर्नल, जर्नल ऑफ़ बॉर्डरलैंड स्टडीज़ के अनुसार, बाड़ लगाने का काम चरणबद्ध तरीके से शुरू हुआ और 1989-99 में इसने 854 किमी की दूरी तय की. लेकिन मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि वे अप्रभावी थे और पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रवासन लगातार जारी रहा.

मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्टों पर नज़र डालने से पता चलता है कि तब से प्रगति धीमी रही है और हर साल समय सीमा बढ़ाई जाती रही है. उदाहरण के लिए, 2015-16 की एमएचए रिपोर्ट के अनुसार, 2,710.02 किमी की बाड़ लगाने का काम दिसंबर 2015 तक पूरा हो गया था और शेष कार्य को पूरा करने की समय सीमा मार्च 2019 निर्धारित की गई थी.

Graphic: Soham Sen | ThePrint
Graphic: Soham Sen | ThePrint

2018-19 की रिपोर्ट में, एमएचए ने कहा कि 3,052.014 किमी के साथ भौतिक बाधाओं से बाड़ लगाने का काम पूरा हो गया है. शेष कार्य पूरा करने की समय सीमा मार्च 2020 निर्धारित की गई थी.

2019-20 में, संख्या बढ़कर 3,063.24 किमी हो गई – यानी उस वर्ष केवल 11.226 किमी की फेंसिंग की गई थी. बाकी काम के लिए एक बार फिर डेडलाइन दिसंबर 2020 तक बढ़ा दी गई.

उस वर्ष की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि सरकार उन तकनीकी विकल्पों का सहारा लेने पर विचार कर रही थी जहां सीमाओं पर भौतिक बाड़ लगाना “संभव” नहीं था. इसमें कहा गया है कि एंटी-कट, एंटी-रस्ट और एंटी-क्लाइम्ब सुविधाओं के साथ एक नए डिजाइन की बाड़ लाने की योजना थी.

अगले साल फेंसिंग के काम में तेजी आई. उस साल सीमा का 48.94 किमी हिस्सा कवर किया गया, जिससे कुल कवरेज 3,112.18 किमी हो गया. बाकी पूरा करने की डेडलाइन मार्च 2021 थी.

2021-22 में, फेंसिंग का काम सुस्त रहा और यह केवल 3,145 किमी तक ही हो सका, यानी उस अवधि के दौरान भौतिक बाधाओं द्वारा बाड़ लगाने का काम केवल 32.82 किमी तक ही किया जा सका. हालांकि, इस बार, फिजिकल या नाॅन-फिजिकल बाधाओं के माध्यम से बाड़ लगाने का काम पूरा करने की समय सीमा एक साल नहीं बल्कि मार्च 2024 तक बढ़ा दी गई थी.

‘भूमि अधिग्रहण, नौकरशाही देरी’

भूमि अधिग्रहण का मुद्दा केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं वाले राज्यों के बीच विवाद का विषय रहा है.

गृह मंत्रालय ने बार-बार भूमि अधिग्रहण में देरी को बाड़ लगाने की गति धीमी करने वाले कारकों में से एक के रूप में उजागर किया है, जैसा कि विशेषज्ञों ने भी दोहराया है.

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की रिसर्च फेलो पुष्पिता दास ने कहा कि केंद्रीय मंत्रालयों के विभिन्न विभागों से मंजूरी भी एक प्रमुख भूमिका निभाती है.

दास ने कहा, “भूमि अधिग्रहण एक बड़ी समस्या रही है क्योंकि राज्य स्तर पर, उनके पास आवश्यक जनशक्ति और विशेषज्ञता की कमी है, और इसलिए भूमि रिकॉर्ड का खराब रखरखाव है. फेंसिंग के लिए जिम्मेदार एजेंसियों को विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों से कुछ मंजूरी की भी आवश्यकता होती है, और परियोजनाओं को आगे बढ़ने में समय लगता है.”

उन्होंने कहा कि भारत और बांग्लादेश के बीच लगभग 75-80 प्रतिशत सीमा पर बाड़ लगाने का काम आवश्यक है.

दास ने कहा, “शेष 20 प्रतिशत क्षेत्रों को भौतिक बाधाओं से नहीं घेरा जा सकता है और आपको आवाजाही पर नज़र रखने के लिए सेंसर और कैमरे जैसी तकनीक की मदद की ज़रूरत है. मुद्दा प्रौद्योगिकी नहीं बल्कि कीमत और अमेरिका-मेक्सिको सीमा जैसे खराब ट्रैक रिकॉर्ड का है और यह अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता है. भारत को सीमा पर सस्ती और उचित रूप से परीक्षण की गई तकनीकी प्रणालियों की आवश्यकता है, जहां भौतिक बाड़ लगाना संभव नहीं है.”

इसके अलावा, राज्य भूमि अधिग्रहण के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि खराब बुनियादी ढांचे से प्रक्रिया में देरी होती है. उदाहरण के लिए, 2018 में पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के अनुरोध के बाद सीमा बाड़ लगाने के लिए भूमि अधिग्रहण को मंजूरी दे दी. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार की मंजूरी, राज्य में 300 एकड़ भूमि के लिए केंद्र सरकार के शुरुआती प्रस्ताव के दो साल बाद आई है.

(संपादन: अलमिना खातून)
(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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