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Sunday, 28 May, 2023
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संसदीय पैनल के सदस्य की सिफारिश- ‘लंबी’ अदालती छुट्टियां खत्म करें, जजों से संपत्ति की घोषणा करवाएं

कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर संसदीय पैनल के कई सदस्यों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में लंबी छुट्टियां मामलों के त्वरित निपटान में बाधा डालती हैं.

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नई दिल्ली: दिप्रिंट को मिली जानकारी के मुताबिक जजों की नियुक्ति और अन्य मुद्दों पर सरकार और न्यायपालिका के बीच लगातार टकराव के बीच, एक संसदीय पैनल के सदस्यों ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय (SC) और उच्च न्यायालयों (HCs) में लंबी छुट्टियों को खत्म करने का आह्वान किया. सदस्यों ने अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की तर्ज पर न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा की भी मांग की.

भाजपा के राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी की अध्यक्षता में कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय पर स्थायी समिति में कई सांसदों का मानना था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में लंबी गर्मी और सर्दियों की छुट्टियां बड़ी संख्या में लंबित मामलों के त्वरित निपटान में बाधा डालती हैं. इस बीच, हाईकोर्ट के जजों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा के मामले पर पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सदस्य एकमत थे.

न्याय विभाग के सचिव एस.के.जी. रहाटे के विचारों को “न्यायिक प्रक्रियाओं और उनके सुधारों” टॉपिक पर सुनने के लिए गुरुवार को बुलाई गई स्थायी समिति की बैठक के दौरान यह मुद्दा उठा रहा.

एक सांसद जो नहीं चाहते थे कि उनका नाम छापा जाए, ने कहा, “कांग्रेस के विवेक तन्खा, जो खुद एक वकील हैं, सहित कई सांसदों का विचार था कि शीतकालीन अवकाश और गर्मी की छुट्टियां एक ‘अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कॉन्सेप्ट’ है और इसे दूर किया जाना चाहिए.” “उन्होंने कहा कि, अन्य सरकारी सेवाओं की तरह, न्यायाधीशों को लंबी छुट्टियों पर जाने वाली अदालतों की मौजूदा प्रथा के बजाय जब उनकी आवश्यकता होती है, वे छुट्टी ले सकते हैं.”

SC का वार्षिक ग्रीष्मकालीन अवकाश मई के मध्य में शुरू होता है और जून के अंत तक रहता है, और दो सप्ताह का शीतकालीन अवकाश दिसंबर के अंत में शुरू होता है. इसके अलावा, शीर्ष अदालत दशहरा और दीवाली के दौरान एक-एक सप्ताह के लिए बंद रहती है.

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सांसद ने कहा, “एक अन्य सांसद ने कहा कि लंबी छुट्टी से आम आदमी को परेशानी होती है. “मामलों के निस्तारण में पहले ही काफी देरी हो चुकी है. छुट्टियां और देरी करती हैं.”

हालांकि, अदालतें छुट्टियों के दौरान मामलों की सुनवाई करती हैं. कुछ न्यायाधीशों वाली अवकाशकालीन पीठें अत्यावश्यक मामलों की सुनवाई के लिए उपलब्ध हैं जो प्रतीक्षा नहीं कर सकते.


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सरकार बनाम ज्युडिशियरी

हाईकोर्ट में लंबी छुट्टियों की प्रथा सरकार के निशाने पर आ गई है.

पिछले दिसंबर में, केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा को बताया था कि “भारत के लोगों के बीच यह भावना है कि अदालतों को मिलने वाली लंबी छुट्टी न्याय चाहने वालों के लिए बहुत सुविधाजनक नहीं है”, और लोगों की भावना को कोर्ट तक पहुंचाना उनका कर्तव्य है.

न्याय सचिव एस.के.जी. रहाटे ने गुरुवार को समिति के सदस्यों को सूचित किया कि सरकार इस मामले पर निर्णय नहीं ले सकती, लेकिन वे स्टैंडिंग कमेटी की सिफारिशों को – जैसे ही वे रिपोर्ट को सबमिट करेंगे – भारत के मुख्य न्यायाधीश और हाईकोर्ट्स में विचार करने के लिए आगे बढ़ा देंगे.

एक तीसरे सांसद ने दिप्रिंट को बताया कि न्याय विभाग ने समिति को यह भी सूचित किया कि, वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट के नियम, 2013, सात सप्ताह की गर्मी की छुट्टियों का प्रावधान करता है, और अदालत व अदालतों के कार्यालयों के लिए छुट्टियों की संख्या मुख्य न्यायाधीश द्वारा इस बात को ध्यान में रखते हुए निर्धारित (और आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित) की जाती है कि वे 103 दिनों से अधिक न हों. वहीं, हाईकोर्ट्स क्रिसमस, सर्दी और गर्मी की छुट्टियों के अलावा साल में 20 अन्य छुट्टियां लेते हैं.

साल में सुप्रीम कोर्ट के औसतन 214 दिन तो हाईकोर्ट सिर्फ 210 दिन कार्य दिवस होते हैं.

2009 में, विधि आयोग ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि उच्च न्यायपालिका में छुट्टियों को कम से कम 10-15 दिनों तक कम किया जाना चाहिए और अदालत के काम के घंटों को कम से कम आधा घंटा बढ़ाया जाना चाहिए.

‘जजों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा’

बैठक में भाग लेने वाले एक चौथे सांसद ने कहा कि हाईकोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा का सुझाव “सिस्टम में पारदर्शिता” सुनिश्चित करने के लिए है.

सांसद ने कहा, “अगर अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए सालाना अपनी संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य है, तो यह हाईकोर्ट पर भी लागू होना चाहिए.”

अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के तहत सिविल सेवकों को अपनी संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य है. भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा सभी चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए संपत्ति की घोषणा करा भी अनिवार्य कर दिया गया है.

न्याय विभाग ने समिति को सूचित किया कि, SC न्यायाधीश (वेतन और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1958 और हाईकोर्ट के न्यायाधीश (वेतन और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1954 के तहत, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के लिए उनकी संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य नहीं है.

विभाग ने न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक तैयार किया था, जिसमें न्यायाधीशों की संपत्ति और देनदारियों की घोषणा का प्रावधान था, लेकिन 15वीं लोकसभा के भंग होने के बाद यह बिल लैप्स हो गया.

अतीत में, कई पूर्व न्यायाधीशों ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणा किए जाने का समर्थन किया था. जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वी.आर. कृष्णन अय्यर ने 2010 में कहा था कि न्यायाधीशों के लिए अपने आचरण और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए अपनी संपत्तियों को सार्वजनिक करना आवश्यक है.

(संपानदः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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