नई दिल्ली: 2 फरवरी को घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से रूस से कच्चे तेल के आयात में तुरंत कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है. बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि अगर स्रोत बदले भी, तो यह धीरे-धीरे होगा और इसका आधार राजनीतिक वादों के बजाय कारोबारी फायदे होंगे.
इस हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा और अमेरिका व वेनेजुएला से खरीद बढ़ाएगा. लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषकों का कहना है कि रूसी तेल अभी भी भारत की रिफाइनिंग व्यवस्था के लिए आर्थिक रूप से बहुत जरूरी है.
ग्लोबल ट्रेड इंटेलिजेंस कंपनी केपलर में रिफाइनिंग और मॉडलिंग के लीड एनालिस्ट सुमित रिटोलिया ने दिप्रिंट से कहा, “रूसी तेल की मात्रा अगले 8 से 10 हफ्तों तक लगभग तय है और भारत की जटिल रिफाइनिंग प्रणाली के लिए यह आर्थिक रूप से अहम बनी हुई है. इसकी वजह आईसीई ब्रेंट के मुकाबले यूराल्स तेल पर मिलने वाली भारी छूट है.”
रिटोलिया का अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च और दूसरी तिमाही की शुरुआत यानी अप्रैल से जून तक भारत में रूस से तेल आयात 11 से 13 लाख बैरल प्रति दिन के दायरे में लगभग स्थिर रहेगा. इसका मतलब है कि यह व्यापार समझौता तुरंत रूस से तेल की मात्रा घटाने में नहीं बदलेगा.
केपलर के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में भारत ने रूस से करीब 11.6 लाख बैरल प्रति दिन कच्चा तेल आयात किया. यह उस महीने के कुल आयात का करीब 22 प्रतिशत था, जो इस अवधि में किसी भी देश से सबसे ज्यादा था. इसके बाद इराक से 20 प्रतिशत, सऊदी अरब से 15 प्रतिशत, संयुक्त अरब अमीरात से 8 प्रतिशत और अमेरिका से 6 प्रतिशत तेल आया.
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा इस महीने हुई है, लेकिन अभी इस पर साइन नहीं हुए हैं. औपचारिक समझौते पर मार्च में दस्तखत होने की उम्मीद है, जो अभी कुछ हफ्ते दूर है.
अमेरिका को सीमित फायदा, रूस की जगह नहीं लेगा
रूसी तेल में अचानक कटौती के बजाय रिटोलिया का मानना है कि भारत धीरे-धीरे अपने स्रोतों में विविधता लाएगा, जिसमें अमेरिका “सीमांत स्तर पर सबसे बड़ा लाभ पाने वाला” होगा. उनके मुताबिक, अमेरिका से तेल की हिस्सेदारी भारत के मासिक आयात में करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से पश्चिम अफ्रीका से आने वाले हल्के तेल की जगह लेगी, न कि रूस के तेल की.
आईसीआरए लिमिटेड में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड (कॉरपोरेट रेटिंग्स) प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि भारत अमेरिका से ज्यादा तेल खरीद सकता है, लेकिन अंतिम फैसला कारोबारी फायदे पर ही निर्भर करेगा. उन्होंने कहा कि भारतीय रिफाइनर कीमत और मुनाफे को ध्यान में रखकर ही आपूर्ति के स्रोत बदलेंगे.
वशिष्ठ ने कहा, “यह जरूरी नहीं है कि… सिर्फ इसलिए कि किसी ने घोषणा कर दी है, भारतीय रिफाइनर जाकर खरीद ही लें.”
उन्होंने बताया कि एक बड़ी चुनौती माल ढुलाई यानी फ्रेट लागत है. वशिष्ठ के अनुमान के मुताबिक, अमेरिका के गल्फ कोस्ट या वेनेजुएला से भारत तक तेल लाने की लागत प्रति बैरल करीब 2.5 डॉलर से 3.5 डॉलर तक होती है और कभी-कभी 4 डॉलर तक भी पहुंच जाती है. वहीं, पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल की ढुलाई लागत करीब 40 सेंट प्रति बैरल होती है, जो बढ़कर 70 सेंट प्रति बैरल तक जाती है.
वेनेजुएला का तेल संभव, लेकिन सीमाएं हैं
अमेरिका के साथ-साथ वेनेजुएला भी संभावित सप्लायर के तौर पर चर्चा में आया है, खासकर उन भारतीय रिफाइनरियों के लिए जो भारी किस्म के तेल को प्रोसेस कर सकती हैं.
वशिष्ठ के मुताबिक, वेनेजुएला का कच्चा तेल बहुत भारी और ज्यादा सल्फर वाला होता है, जिसका मतलब है कि दुनिया में बहुत कम रिफाइनरियां इसे प्रोसेस कर सकती हैं.
रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) जैसी भारतीय रिफाइनरियां वेनेजुएला के तेल को कई वैश्विक कंपनियों से बेहतर तरीके से रिफाइन कर सकती हैं.
हाल में वेनेजुएला से तेल आयात में कोई बढ़ोतरी नहीं दिखी है. आखिरी खेप मई 2025 में आई थी, जो ज्यादातर आरआईएल ने मंगाई थी. हालांकि रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, आरआईएल ने वेनेजुएला से 20 लाख बैरल तेल खरीदने का सौदा किया है, लेकिन इसकी समय-सीमा नहीं बताई गई है.
लंबे समय के हिसाब से वशिष्ठ ने कहा कि दूरी के कारण वेनेजुएला के तेल की आर्थिक व्यवहार्यता चुनौती बनी रहेगी. उन्होंने कहा कि शिपिंग लागत की भरपाई के लिए वेनेजुएला के तेल की कीमत काफी कम होनी चाहिए. उन्होंने कहा, “वेनेजुएला का कच्चा तेल इतनी कम कीमत पर उपलब्ध होना चाहिए कि माल ढुलाई की लागत को सही ठहराया जा सके.”
एक और सीमा इसकी मात्रा है. वशिष्ठ ने बताया कि वेनेजुएला की उत्पादन क्षमता करीब 9 लाख बैरल प्रति दिन है. उत्पादन बढ़ाने के लिए भारी निवेश की जरूरत होगी, जिसमें कई साल लग सकते हैं. इसका मतलब है कि भले ही प्रतिबंध कम हो जाएं, वेनेजुएला निकट भविष्य में रूस की जगह नहीं ले सकता.
रिटोलिया ने भी कहा कि वेनेजुएला का तेल “एक विकल्प के तौर पर अतिरिक्त फायदा दे सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है”, और यह “कम आर्थिक लाभ, प्रतिबंधों के नियम, बीमा और तेल को मिलाकर इस्तेमाल करने की जरूरत” जैसी सीमाओं से बंधा है.
रूस से आयात में कमी, लेकिन पीछे हटना नहीं
जनवरी में रूस से भारत का तेल आयात और घट गया, जिससे दिसंबर में शुरू हुई कमी का सिलसिला जारी रहा. इसका एक कारण रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंध भी थे, जो पिछले साल 21 नवंबर से लागू हुए थे.
केपलर के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2026 में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात नवंबर 2025 के मुकाबले 37 प्रतिशत कम हो गया, जब प्रतिबंध लागू हुए थे.
रिटोलिया के अनुसार, यह 2022 के अंत के बाद भारत का रूस से सबसे कम तेल आयात था. लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि यह गिरावट “अस्थायी खरीद समायोजन है, रूस के तेल से स्थायी दूरी नहीं”.
उन्होंने बताया कि इसका तात्कालिक कारण यह था कि यूरोपीय संघ के 21 जनवरी से लागू प्रतिबंधों के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज और कुछ अन्य रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खेप लेने से बचा. लेकिन रूसी तेल इस क्षेत्र से गायब नहीं हुआ, बल्कि समुद्र में जहाजों पर ही रखा गया है.
केपलर के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में अरब सागर में टैंकरों में 3 करोड़ से ज्यादा बैरल रूसी तेल तैरता हुआ था. इस क्षेत्र में 2 करोड़ से ज्यादा बैरल तेल समुद्र में स्टोरेज के रूप में रखा गया था. तुलना करें तो पिछले साल जनवरी में समुद्र में स्टोरेज 1 करोड़ बैरल से भी कम था.
रिटोलिया ने कहा कि इनमें से कुछ तेल चीन जा सकता है, लेकिन “उम्मीद है कि ज्यादातर तेल कारोबारी और नियमों से जुड़े मुद्दे सुलझने के बाद भारत में ही खरीदा जाएगा.”
भारत की रिफाइनरियों के लिए बड़े स्तर पर रूसी तेल का विकल्प ढूंढना मुश्किल है, क्योंकि इसकी कीमत कम होती है. रिटोलिया ने कहा कि यूराल्स तेल अभी भी ब्रेंट के मुकाबले काफी छूट पर मिलता है, जिससे यह “भारत की रिफाइनिंग प्रणाली के लिए आर्थिक रूप से बहुत अहम” बना हुआ है. उन्होंने कहा कि इसमें ज्यादा कटौती तभी संभव है जब भारतीय सरकार “स्पष्ट नीतिगत बदलाव” करे, जो ऊर्जा सुरक्षा की चिंताओं को देखते हुए मुश्किल लगता है.
यूराल्स को अक्सर रूसी तेल का मानक माना जाता है. यह यूराल और वोल्गा क्षेत्र के भारी और ज्यादा सल्फर वाले तेल तथा साइबेरिया के हल्के तेल का मिश्रण होता है. ब्रेंट हल्का और कम सल्फर वाला कच्चा तेल है, जिसे उत्तरी सागर से निकाला जाता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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