नयी दिल्ली, छह अक्टूबर (भाषा) पोल्ट्री उद्योग उच्च उत्पादन लागत और बड़े स्थानीय बाजार को देखते हुए निर्यात के बजाय घरेलू खपत बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहा है। उद्योग के वरिष्ठ अधिकारियों ने सोमवार को यह कहा।
केंद्रीय पशुपालन, डेयरी और पोल्ट्री मंत्रालय के पूर्व सचिव तरुण श्रीधर ने हैदराबाद में 25-28 नवंबर को होने वाले 17वें पोल्ट्री इंडिया एक्सपो के बारे में जानकारी देने के लिए आयोजित कार्यक्रम में कहा कि अंडा उत्पादन में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर होने के बावजूद, भारत अंडा निर्यात में 25वें या 26वें स्थान पर है।
पूर्व सचिव ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘निर्यात अपने आप में एक लक्ष्य नहीं है।’’ उन्होंने प्रश्न किया, ‘‘अगर मेरा उत्पाद मुझे घरेलू बाजार में अधिक मूल्य दे रहा है, तो मुझे निर्यात क्यों करना चाहिए?’’
मांस उत्पादन में भारत वैश्विक स्तर पर चौथे या पांचवें स्थान पर है। फिर भी, यहां प्रति व्यक्ति खपत दुनिया में सबसे कम यानी तीन किलोग्राम सालाना है, जो बांग्लादेश और अन्य विकासशील देशों से भी कम है।
कर्नाटक पोल्ट्री फार्मर्स एंड ब्रीडर्स एसोसिएशन (केपीएफबीए) के अध्यक्ष नवीन पी के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति चिकन की खपत प्रति वर्ष 6-7 किलोग्राम है, जबकि अंडों की खपत सालाना 103 अंडों की है।
उन्होंने कहा, ‘‘देश में प्रोटीन की कमी वाली आबादी हैं।’’ उन्होंने बताया कि 71 प्रतिशत भारतीय चिकन और अंडे खाते हैं। उन्होंने सवाल किया, ‘‘हमारी आबादी 1.43 अरब है। मैं निर्यात क्यों करना चाहूंगा?’’
भारतीय पोल्ट्री उत्पादकों को प्रमुख निर्यातकों की तुलना में लागत में भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है।
उद्योग के अधिकारियों ने बताया कि भारत में मक्के की कीमत 23-25 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि निर्यातक देशों में यह 14 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि सोयाबीन खली घरेलू स्तर पर 30 प्रतिशत महंगी है।
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (सीएलएफएमए) के अध्यक्ष दिव्य कुमार गुलाटी ने कहा, ‘‘हमारी उत्पादन लागत 90 रुपये है। उनकी उत्पादन लागत हमसे 25-30 रुपये कम है।’’ उन्होंने बताया कि उत्पादन लागत में 80-85 प्रतिशत हिस्सा चारे का होता है।
लागत का यह अंतर आंशिक रूप से भारत द्वारा आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण है, जिससे प्रतिस्पर्धी देशों में चारे की लागत कम हो जाती है।
उद्योग के अधिकारियों ने कहा कि बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण सुधार के बिना निर्यात के अवसर सीमित रहेंगे। श्रीधर ने कड़े अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता मानकों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘जब तक हमारे पास अच्छी प्रसंस्करण सुविधाएं, अच्छे फ्रोजन और प्रसंस्कृत उत्पाद नहीं होंगे, हम निर्यात बाजारों में प्रवेश नहीं कर पाएंगे।’’
गुलाटी ने शुल्क-मुक्त आयात वाले निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्रों को एक संभावित समाधान के रूप में सुझाया। हालांकि इसकी लाभप्रदता अनिश्चित बनी हुई है।
अधिकारियों ने कहा कि प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण लाभों के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देश भारत को अपने पोल्ट्री उत्पादों के लिए एक संभावित बाजार के रूप में देखते हैं।
भाषा राजेश राजेश रमण
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