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Tuesday, 23 April, 2024
होमदेशअर्थजगतभले ही गुजरात तेजी से आगे बढ़ने वाला राज्य, लेकिन वहां के लोग गरीबी रेखा में 'पिछड़े' बंगाल के बराबर हैं

भले ही गुजरात तेजी से आगे बढ़ने वाला राज्य, लेकिन वहां के लोग गरीबी रेखा में ‘पिछड़े’ बंगाल के बराबर हैं

गुजरात की प्रति व्यक्ति आय पश्चिम बंगाल से लगभग दोगुनी है, लेकिन दोनों राज्य 'बहुआयामी गरीबी' के स्तर पर लगभग बराबर है. पश्चिम बंगाल ने बीते 5 वर्षों में काफी प्रगति की है.

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नई दिल्ली: ‘गुजरात मॉडल’ की “आर्थिक सफलता की कहानी” को इस देश में काफी सराहा जाता रहा है. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं द्वारा अक्सर चुनावों में ‘गुजरात मॉडल’ की कहानी दोहराई जाती है, जबकि इसके विपरित पश्चिम बंगाल को एक पिछड़ा राज्य माना जाता है. हालांकि, इस सप्ताह सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि दोनों राज्यों में ‘बहुआयामी गरीबी’ लगभग बराबर है और दोनों ने एक जैसा प्रदर्शन किया है.

‘राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक: प्रगति की समीक्षा 2023’ शीर्षक वाली रिपोर्ट से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में, 11.89 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी के तहत निवास करती है, जबकि गुजरात में यह आंकड़ा 11.66 प्रतिशत है, जोकि पश्चिम बंगाल से कुछ ही कम है.

जबकि एक तथ्य यह भी है कि सांख्यिकी मंत्रालय के 2021-22 के अनुमान के अनुसार, गुजरात की प्रति व्यक्ति आय प्रतिवर्ष औसत लगभग 2.5 लाख रुपये हैं, जो पश्चिम बंगाल की 1.24 लाख रुपये से लगभग दोगुनी है.

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार प्रति व्यक्ति आय में अंतर के बावजूद, पश्चिम बंगाल ने पिछले पांच सालों में गुजरात की तुलना में बहुआयामी गरीबी को कम करने की दिशा में काफी बेहतर काम किया है.

देश भर में बहुआयामी गरीबी का आंकड़ा जुटाने के लिए, नीति आयोग की रिपोर्ट 2015-16 (एनएफएचएस-4) और 2019-21 (एनएफएचएस-5) में आयोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) से डेटा लिया है.

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यह रिपोर्ट गरीबी को आय के मानक मीट्रिक के आधार पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन जीने में आ रही मुश्किलों को लेकर आंकड़े जुटाती है. इसे कुल 12 उप-संकेतकों में विभाजित किया गया है.

2016 में, गुजरात में लगभग 18.5 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 21.3 प्रतिशत लोग बहुआयामी गरीबी के तहत रहते थे. 2021 तक गुजरात में यह 6.8 प्रतिशत अंक कम होकर लगभग 11.7 प्रतिशत हो गई, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 9.4 प्रतिशत अंक गिरकर 11.9 प्रतिशत पर पहुंच गई.

Multidimensional poverty in Gujarat and West Bengal
चित्रण: मनीषा यादव | दिप्रिंट

सरल शब्दों में कहें तो, इतने समय में पश्चिम बंगाल में हर 11 में से एक व्यक्ति गरीबी से बाहर निकल गया, लेकिन गुजरात में, हर 15 में से केवल एक व्यक्ति ही गरीबी से बाहर निकल पाया.

यह देखते हुए कि पश्चिम बंगाल की तुलना में गुजरात आबादी कम है. ये आंकड़े पूर्वी भारतीय राज्य में गरीबी से निकलने वाले लोगों की एक बड़ी संख्या को दर्शाता है.

अगर संख्या की बात करे तो 2016 से 2021 तक, पश्चिम बंगाल में 92.58 लाख लोग गरीबी से बाहर निकले, जबकि इसी अवधि में गुजरात में यह संख्या सिर्फ 47.84 लाख रही.

पश्चिम बंगाल ने 9 संकेतकों पर गुजरात से बेहतर प्रदर्शन किया

बहुआयामी गरीबी सूचकांक 12 संकेतकों के आधार पर आंकड़े जुटाती है जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और जीवन स्तर जैसी चीजें शामिल हैं.

दिप्रिंट ने सभी 12 संकेतकों का अलग-अलग और विस्तृत विश्लेषण किया और पाया कि पश्चिम बंगाल ने इनमें से नौ में गुजरात के मुकाबले काफी बेहतर प्रदर्शन किया है.

Multidimensional poverty indicators
चित्रण: मनीषा यादव | दिप्रिंट

उदाहरण के लिए, पोषण को ही ले लें. 2016 में, पश्चिम बंगाल में लगभग 33.6 प्रतिशत और गुजरात में 41.37 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक सदस्य को अल्पपोषण का सामना करना पड़ रहा था.

2021 तक, ये संख्या पश्चिम बंगाल में 27.3 प्रतिशत और गुजरात में 38.09 प्रतिशत तक रह गई.

अनिवार्य रूप से, इसी अवधि के दौरान, गुजरात में प्रत्येक 100 में से तीन कम लोगों को अल्पपोषण का सामना करना पड़ा. लेकिन पश्चिम बंगाल ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया, जहां प्रत्येक 100 में से छह कम लोगों को इस समस्या का सामना करना पड़ा.

एक अन्य उदाहरण स्वच्छता को लेकर है, जहां स्वच्छता को लेकर सुविधा नहीं मिलने पर आंकड़े दिए गए हैं. गुजरात में स्वच्छता सुविधा नहीं मिलने वाले लोगों का प्रतिशत 2016 और 2021 के बीच जहां 37 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत हो गया, वहीं, पश्चिम बंगाल ने सुधार के मामले में और भी बेहतर प्रदर्शन किया. पश्चिम बंगाल में यह 16 प्रतिशत की कमी के साथ 47.81 प्रतिशत से 32 प्रतिशत पर पहुंच गया.

30 मिनट की पैदल दूरी के भीतर सुरक्षित पेयजल तक पहुंच के मामले में भी, पश्चिम बंगाल फिर से गुजरात से आगे निकल गया. पश्चिमी राज्य की तुलना में अब यहां कम लोग पेयजल के अभाव का सामना कर रहे हैं.

2016 में गुजरात में लगभग 7.7 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 9.46 प्रतिशत लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित थे. 2021 तक, गुजरात में यह 5.3 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में यह केवल 4.97 प्रतिशत था.

तीन संकेतक जिस पर गुजरात ने पश्चिम बंगाल से बेहतर प्रदर्शन किया है वह है आवास, खाना पकाने का ईंधन और बिजली.


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गुजरात में गरीबी ‘तेजी’ से बढ़ रही?

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, “गरीबी की तीव्रता”, उन सभी लोगों के द्वारा बताए गए अनुभव के आधार पर बनाई गई, जिन्हें बहुआयामी रूप से गरीब माना जाता है.

दोनों राज्यों में बहुआयामी गरीबी का स्तर समान होने के बावजूद, पश्चिम बंगाल और गुजरात में लोगों के द्वारा बताए गए अपने अनुभव के आधार पर बनाए गए आंकड़े में थोड़ा अंतर दिखता है.

2016 में, गुजरात में गरीबी की तीव्रता जहां 44.9 प्रतिशत थी, वहीं पश्चिम बंगाल में यह थोड़ा अधिक 45.5 प्रतिशत थी. इसका मतलब यह है कि दोनों राज्यों में एक गरीब व्यक्ति को बहुआयामी गरीबी सूचकांक में सूचीबद्ध लगभग आधे संकेतकों पर मुश्किल का सामना करना पड़ा.

पांच साल बाद, पश्चिम बंगाल ने इसपर कुछ हद तक बेहतर प्रदर्शन किया है.

Poverty intensity
चित्रण: मनीषा यादव | दिप्रिंट

2021 तक, गुजरात में गरीबी की तीव्रता घटकर 43.25 प्रतिशत हो गई, और पश्चिम बंगाल में यह और भी कम होकर 42.35 प्रतिशत पर आ गई.

इससे पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में गरीबी की तीव्रता गुजरात की तुलना में थोड़ी कम है.

इन निष्कर्षों से पता चलता है कि राज्य की आर्थिक समृद्धि से राज्य के लोगों की बहुआयामी गरीबी कम नहीं हो सकती है. एक बड़ा औद्योगिक राज्य होने और दूसरे राज्यों के मुकाबले अधिक विकसित राज्य होने के बावजूद, गुजरात उन 14 राज्यों की सूची में पहुंचने में कामयाब नहीं हुआ है जहां 10 प्रतिशत से कम लोग बहुआयामी गरीबी में रहते हैं.

(संपादनः ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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