(लक्ष्मी देवी ऐरे)
नयी दिल्ली, 16 अक्टूबर (भाषा) भारत की दूसरी सबसे बड़ी ‘सोडा ऐश’ उत्पादक कंपनी जीएचसीएल लिमिटेड 2030 तक अपनी उत्पादन क्षमता को लगभग दोगुना यानी 23 लाख टन प्रति वर्ष करने के लिए तैयार है। इसके साथ ही गुजरात के कच्छ जिले में इसकी 6,500 करोड़ रुपये की नई परियोजना का निर्माण अगले छह से सात महीनों के भीतर शुरू होने की उम्मीद है।
यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब कंपनी सस्ते चीनी आयात से जूझ रही है। साथ ही भारत के महत्वाकांक्षी 300 गीगावाट सौर ऊर्जा लक्ष्य के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में खुद को स्थापित कर रही है, जहां सोलर ग्लास विनिर्माण के लिए ‘सोडा ऐश’ एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
‘सोडा ऐश’ एक सफेद व पानी में घुलनशील पदार्थ है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर सोलर ग्लास, कपड़े धाने का सर्फ, साबुन आदि बनाने के लिए किया जाता है। इसका रसायनिक नाम सोडियम कार्बोनेट है।
जीएचसीएल के प्रबंध निदेशक (एमडी) आर. एस. जालान ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ विशेष साक्षात्कार में कहा, ‘‘ लगभग सभी प्रमुख औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं, पर्यावरणीय मंजूरी मिल चुकी है, भूमि का एक बड़ा हिस्सा पहले ही खरीदा जा चुका है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ इस समय हमने मौके पर कोई काम शुरू नहीं किया है लेकिन उम्मीद है कि अगले छह से सात महीनों में हम ये गतिविधियां शुरू कर सकेंगे।’’
इस दो चरणों में होने वाले विस्तार से वर्तमान 12 लाख टन क्षमता में 11 लाख टन की वृद्धि होगी। इस नई सुविधा में एक विशाल ‘सोडा ऐश’ संयंत्र होगा जिसे विशेष रूप से सौर ग्लास क्षेत्र के लिए तैयार किया जा रहा है।
जालान ने कहा, ‘‘ यदि आप 119 गीगावाट से 300 गीगावाट की बात करें तो यह एक बड़ा अवसर है और हम जिस सपूर्ण परियोजना की परिकल्पना कर रहे हैं, उसका अधिकतर उपयोग सौर ग्लास के लिए किया जाएगा…’’
जीएचसीएल लगातार वाणिज्य मंत्रालय से चीन और अन्य वैश्विक निर्यातकों से सोडा ऐश के आयात पर डंपिंग रोधी शुल्क लगाने का अनुरोध कर रही है क्योंकि सस्ते निर्यात से स्थानीय उत्पादकों का मुनाफा हो रहा है।
भारत ने ‘सोडा ऐश’ पर 20,108 रुपये प्रति टन के न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) को 31 दिसंबर, 2025 तक बढ़ा दिया है। 2023 में पहली बार अधिसूचित इन प्रतिबंधों का उद्देश्य गलत मूल्य निर्धारण पर अंकुश लगाना है लेकिन अधिशेष-संचालित डंपिंग के खिलाफ ये कमजोर हैं।
भाषा निहारिका अजय
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