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Saturday, 28 March, 2026
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नागरिक समाज समूह ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बारे में वित्त मंत्री के बयान की आलोचना की

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कोलकाता, पांच नवंबर (भाषा) ‘बैंक बचाओ देश बचाओ’ मंच ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के हाल में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बारे में दिए गए बयान की आलोचना करते हुए उनके दावे का विरोध किया और सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के प्रति आगाह किया है।

सीतारमण ने अपने बयान में कहा था कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सका।

वित्त मंत्री को लिखे एक पत्र में, कोलकाता स्थित बैंक बचाओ देश बचाओ मंच (बीबीडीबीएम) ने कहा कि राष्ट्रीयकरण ने ग्रामीण और छोटे शहरों में संस्थागत ऋण तक पहुंच सुनिश्चित करके भारत की वित्तीय प्रणाली को मौलिक रूप से नया रूप दिया है, जिसे निजी बैंकों ने 1969 से पहले अनदेखा किया था।

समूह ने पत्र में दावा किया, ‘‘1969 के बाद से देश की आर्थिक प्रगति का श्रेय केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को दिया जा सकता है, जो भारत की वित्तीय संरचना की रीढ़ बने हुए हैं।’’

हालांकि, सीतारमण ने मंगलवार को इस आशंका को खारिज कर दिया कि सरकारी बैंकों के निजीकरण से वित्तीय समावेश और राष्ट्रीय हित को नुकसान होगा।

नागरिक समाज समूह ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) का अभी भी कुल जमा और कर्ज का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है और ये 90 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण शाखाओं का संचालन करते हैं जो किसानों, कम आय वाले परिवारों और छोटे व्यवसायों को सेवा प्रदान करती हैं।

आंकड़ों का हवाला देते हुए, बीबीडीबीएम ने उल्लेख किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्तीय समावेश को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बैंकों ने 53.1 करोड़ से अधिक जन धन खाते खोले हैं, जिनमें से 31 करोड़ से अधिक ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं, जिनमें से 55 प्रतिशत महिलाओं के हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पीएमजेजेबीवाई, पीएमएसबीवाई, मुद्रा और पीएम स्वनिधि जैसी सरकार समर्थित बीमा और ऋण योजनाओं की भी अगुवाई की।

मंच ने आरोप लगाया कि इसके विपरीत, कर्ज लेने वाली कंपनियों को रियायत मिली है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2015-16 और वित्त वर्ष 2024-25 के बीच 12.08 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि बट्टे खाते में डाल दी, जबकि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में कुल बट्टे खाते में डाली गई राशि 16.35 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी।

समूह के संयुक्त संयोजक बिस्वरंजन रे और सौम्या दत्ता द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया, ‘‘सरकार राष्ट्रीयकरण को एक विफलता के रूप में चित्रित करने पर आमादा है ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अंततः कुछ पसंदीदा व्यावसायिक समूहों को हस्तांतरित किया जा सके।’’

उन्होंने चेतावनी दी कि निजीकरण वित्तीय संप्रभुता को खतरे में डालेगा और गरीबों और ग्रामीण नागरिकों के लिए ऋण तक पहुंच को सीमित करेगा।

भाषा रमण अजय

अजय

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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