scorecardresearch
Tuesday, 23 July, 2024
होमदेश'कुत्तों की नाक से बहता खून, हांफती बिल्लियां'; दिल्ली में गर्मी और प्यास से मर रहे हैं जानवर

‘कुत्तों की नाक से बहता खून, हांफती बिल्लियां’; दिल्ली में गर्मी और प्यास से मर रहे हैं जानवर

पशु कल्याण समूह आश्रयों और सेंटर को आवश्यक संसाधनों जैसे कूलर, एसी और पानी से से लैस करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि गर्मी के महीनों में सर्जरी या उपचार किया जा सके.

Text Size:

नई दिल्ली: सुबह सात बजे, गैर-लाभकारी संगठन यमुना खिमत्संग के सदस्य और स्वयंसेवक नई दिल्ली के न्यू अरुणा नगर में 120 स्ट्रीट डॉग्स के लिए चावल और दही के सूप से भरे स्टील के ट्रे भरने के लिए दौड़ पड़े. रसोई और सड़कों पर लोगों में एक भावना है कि दिल्ली की चिलचिलाती धूप शुरू होने से पहले सभी कुत्तों को खाना खिलाना है. सुबह 9 बजे तक, हर कोई अपने घरों और झुग्गियों में चले जाते हैं, और कुत्ते जहाँ कहीं भी थोड़ी छाया मिल जाती है, वहाँ चले जाते हैं.

शुक्रवार को हुई बारिश ने लोगों और जानवरों को इस गर्मी में अत्यधिक और लंबे समय तक चलने वाली गर्मी से राहत दी. लेकिन रिकॉर्ड तोड़ भीषण गर्मी ने इंसानों और जानवरों को गर्मी के कारण तनाव, थकावट और यहाँ तक कि स्ट्रोक के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया है.

इस साल आवारा कुत्तों में हीटस्ट्रोक के मामलों में वृद्धि से पशुओं का ध्यान रखने वाले स्तब्ध हैं. ये वे जीव हैं जिनके बारे में माना जाता है कि वे काफी गर्मी बर्दाश्त कर सकते हैं.

दिल्ली में लगभग 700 आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले एनजीओ, ओजस्विनी के शुभांकर सिंह ने कहा, “हमने पांच साल पहले काम करना शुरू किया था और यह पहली बार है जब हम हीटस्ट्रोक के इतने सारे मामले देख रहे हैं. पिछले 25 दिनों में, हमारे द्वारा खिलाए जाने वाले कुत्तों में से पांच गर्मी के कारण मर गए हैं.”

Community dogs being fed at New Aruna Nagar area by Yamuna Khimtsang | Photo by special arragement
यमुना खिमत्संग द्वारा न्यू अरुणा नगर क्षेत्र में सामुदायिक कुत्तों को खाना खिलाया जा रहा है | फोटो विशेष व्यवस्था द्वारा

अत्यधिक तापमान के कारण कुछ पशु समूहों ने नसबंदी और टीकाकरण जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों पर भी रोक लगा दी है.

बढ़ती गर्मी, व्यवहार में बदलाव

उत्तरी दिल्ली में यमुना के बाढ़ के मैदानों के किनारे, मजनू का टीला में, एनजीओ यमुना खिमत्संग ने क्षेत्र के आवारा कुत्तों के लिए 150 बड़े कंक्रीट के पानी के कटोरे बनाए हैं.

यमुना खिमत्संग के सह-संस्थापक कुंगसांग त्सफेल ने कहा, “गर्मियों के दौरान कुत्ते अधिक सुस्त हो जाते हैं. अगर बहुत गर्मी हो जाए, तो वे खाने के लिए बाहर नहीं निकलेंगे. लेकिन भोजन से ज़्यादा हमें यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि उन्हें पीने के लिए पानी मिले. यह सुनिश्चित करना भी हमेशा आसान नहीं होता है.”

लेकिन सुस्ती ही कुत्तों के व्यवहार में होने वाला एक मात्र परिवर्तन नहीं है जिसे इनकी देखभाल करने वाले समूहों ने देखा है. बढ़ते तापमान के साथ, अच्छे स्वभाव वाले कुत्ते भी चिड़चिड़े हो गए हैं. अच्छे स्वभाव वाले कुत्ते भी खेलना या कूदना पसंद नहीं करते.

तिमारपुर में एक कल्याणकारी संगठन नेबरहुड वूफ़ की स्थापना करीब 10 साल पहले हुई थी, वह इस वक्त चार कुत्तों के हीटस्ट्रोक की समस्या से जूझ रहा है. इस महीने की शुरुआत में, उन्हें एक कुत्ता मिला जिसकी नाक से खून बह रहा था, उसे अविश्वसनीय रूप से तेज़ बुखार था और वह हांफ रहा था.

संगठन चलाने वाली आयशा क्रिस्टीना बेन ने कहा, “हम उसे लेकर आए, और छांव, भोजन और सुरक्षा मुहैया कराई. वह बच गया,” चार मामलों में से दो दिल्ली विश्वविद्यालय से थे.

बेन ने इस स्थिति के लिए परिसर के कंक्रीटीकरण को जिम्मेदार ठहराया, जिससे तापमान बढ़ जाता है और छांव कम रह जाती है. उन्होंने हीटस्ट्रोक के साथ-साथ टिक फीवर में भी वृद्धि देखी है.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि वे खुद को ठंडा रखने के लिए कीचड़ में जाकर बैठते हैं. और इससे उन्हें कीड़े लग जाते हैं.”

दिल्ली की सड़कों और जेजे क्लस्टर्स में, मनुष्य और जानवर अक्सर एक ही संसाधन के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. त्सेफेल के अनुसार, उनका काम झुग्गी निवासियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना है कि पानी के कटोरे चोरी न हों और नियमित रूप से फिर से भरे जाएं.

Children from adjacent JJ colony help in feeding the dogs at New Aruna Nagar in Majnu Ka Tilla | Photo by special arrangement
मजनू का टीला के न्यू अरुणा नगर में कुत्तों को खिलाने में आस-पास की जेजे कॉलोनी के बच्चे मदद करते हैं | फोटोः विशेष व्यवस्था द्वारा

त्सेफेल ने कहा, “कुत्ते सब कुछ संभाल सकते हैं; उन्हें बस कुछ संसाधनों की आवश्यकता होती है. हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि वे चीजें उनके लिए उपलब्ध हों ताकि उन्हें उनकी तलाश में दूर न जाना पड़े,”


यह भी पढ़ेंः क्या वडनगर फिर से लिखेगा इतिहास? 3,000 साल पुराना गुजरात का ये शहर भारत के ‘अंधे युग’ के देता है संकेत


जानवरों के लिए पानी के बर्तन, कूलर

गर्मी ने बिल्लियों और लावारिस मवेशियों को भी नहीं बख्शा है. सेक्टर-94 में नोएडा एनिमल शेल्टर की वॉलंटियर करिश्मा गौर, जिसका प्रबंधन ऑल क्रिएचर्स ग्रेट एंड स्मॉल (AGCS) द्वारा किया जाता है, सेंटर में कैटरी की देखरेख करती हैं. इसमें गायों सहित 2,000 से अधिक जानवर हैं.

गौर ने कहा, “इस साल, मैंने उन्हें (बिल्लियों को) हांफते हुए देखा, जो बिल्लियों के लिए सामान्य नहीं है. इससे मुझे चिंता हुई.”

कैटरी में मिट्टी के बर्तन और पानी के बर्तन भरे हुए हैं, ताकि जानवरों को हाइड्रेट किया जा सके और वे गर्मी से बच सकें. उन्होंने बिल्लियों के लिए पानी से भरे बड़ी ट्रे रखे हैं, ताकि वे इसमें नहा सकें. सबसे बढ़िया बात यह है कि बिल्लियों के लिए खास तौर पर तीन नए कूलर हैं. अलग-अलग जानवरों को पानी उपलब्ध कराने के लिए विस्तृत व्यवस्था की गई है. कुत्तों और गधों के लिए शेल्टर में बड़े पानी के परात रखे गए हैं और गायों के लिए कुंड हैं.

गौर ने कहा, “जहां भी संभव हो, हमने बड़े-बड़े जूट के पर्दे लगा दिए हैं, जिन्हें हम पूरे दिन गीला रखते हैं, ताकि विभिन्न सेक्शन में आने वाली हवा को प्राकृतिक रूप से ठंडा किया जा सके.”

भोजन में बदलाव करना भी इन पशु कल्याण समूहों द्वारा अपनाई जाने वाली एक और रणनीति है. यमुना खिमत्संग और नेबरहुड वूफ़ दोनों ने दूध की जगह दही का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. पारा बढ़ने के साथ ही मांसाहारी भोजन और दूध पूरी तरह से बंद कर दिया गया क्योंकि ये खाद्य पदार्थ शरीर की गर्मी को प्रभावित करते हैं और जानवरों के पेट को खराब करते हैं.

बेन ने गर्मियों के दौरान कुत्तों में विटामिन के स्तर में भी भारी गिरावट देखी है. “हमें यह देखने के लिए कुछ और साल चाहिए कि क्या यह विशेष रूप से गर्मी की वजह से है.”

नसबंदी अभियान को झटका

मजनू का टीला के कुत्तों को दिन में एक बार खाना खिलाया जाता है. त्सेफेल ने कहा कि यह मात्रा उनकी भूख मिटाने और उन्हें स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त है. वे इस काम को लगातार पूरा करने में सक्षम हैं क्योंकि उनके कुत्तों की आधी आबादी की नसबंदी हो चुकी है, यह उपलब्धि नेबरहुड वूफ के सहयोग से हासिल की गई है. हालांकि, ये संस्थागत प्रयास – नियमित नसबंदी और टीकाकरण – गर्मी के मौसम में मुश्किल हो जाते हैं. दिल्ली के डॉग्स (और कैट्स) की संस्थापक अनुप्रिया डालमिया ने अपने नसबंदी कार्यक्रमों पर गर्मी के गंभीर प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया.

उन्होंने बताया, “आमतौर पर, हम रोजाना बड़ी संख्या में नसबंदी करते हैं. हमारे यहां रोजाना 15 से 30 कुत्तों की नसबंदी होती है. लेकिन गर्मी के कारण, हमें अपने कार्यक्रम को लगभग पूरी तरह से रोकना पड़ा क्योंकि कुत्तों के लिए वैन में बैठना, यात्रा करना और सर्जरी करवाना बहुत मुश्किल है,”

आवारा कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण रखने और रेबीज के प्रकोप को रोकने के लिए समय पर नसबंदी अभियान चलाना आवश्यक है.

दिल्ली नगर निगम ने आवारा पशुओं की नसबंदी और टीकाकरण के लिए नेबरहुड वूफ़ को पैनल में शामिल किया है. शुक्र है कि यह संकट से निपटने में कामयाब रहा है.

बेन ने कहा, “हम कुत्तों को ठंडा रखने के लिए सुबह पकड़ते हैं और देर शाम को छोड़ते हैं. हम कार और कुत्तों को ठंडा रखने के लिए उन्हें गीला करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि हमारे वाहन का एयर कंडीशनर ठीक से काम कर रहा है,”

अभूतपूर्व गर्मी ने न केवल नसबंदी की प्रक्रिया को बाधित किया है, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों – भोजन और टीकाकरण – को भी बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है. चूंकि रात और सुबह का तापमान अधिक रहता है, इसलिए आवारा पशुओं को खिलाने की डालमिया की पहल भी प्रभावित हुई है, चाहे वे दिन में कितनी भी जल्दी शुरू क्यों न हों. इन कठिनाइयों के बावजूद, संगठन अपने भोजन कार्यक्रमों को जारी रखने में कामयाब रहा है.

उन्होंने कहा, “खाना खिलाना बंद नहीं किया जा सकता. ऐसा एक भी दिन नहीं रहा जब हमने खाना न खिलाया हो. लेकिन बाकी सब कुछ बहुत धीमा हो गया है.”

‘कुछ चुनिंदा लोग बोझ नहीं उठा सकते’

सभी पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया. डालमिया, जो एक और पहल, पॉज़ फॉर ए कॉज़ चलाते हैं, ने दिल्ली भर में पशु देखभाल करने वालों को 150 पानी के कटोरे वितरित किए.

पक्षियों और बंदरों के लिए छतों पर पानी के कटोरे रखना या दिन के दौरान आवारा कुत्तों को छायादार बरामदे में सोने देना जैसी सरल प्रथाएं सरल लेकिन आवश्यक कार्य हैं.

बेन ने कहा, “ये सभी चीजें मायने रखती हैं. समुदाय के कुछ चुनिंदा लोगों के लिए मौजूदा बोझ को संभालना बहुत मुश्किल है. सभी को इसमें सहभागिता निभाने की जरूरत है.”

पशु कल्याण समूह आश्रयों और केंद्रों को आवश्यक संसाधनों – कूलर, एसी और पानी की सुविधा – से लैस करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि गर्मी के महीनों में सर्जरी या उपचार किया जा सके. दिल्ली में चल रही पानी की कमी ने उनके काम को और जटिल बना दिया है. और उन्हें हमेशा पैसे की जरूरत होती है.

इस गर्मी में, आश्रय के लिए बेन के बिजली बिल 60,000 रुपये तक पहुंच गए. एक हफ़्ते पहले, नेबरहुड वूफ़ के इंस्टाग्राम पेज पर, उन्होंने औद्योगिक आकार के कूलर और वॉटर कूलर के लिए एक अपील की थी. आश्रय में एक छोटे से एयर कूलर के सामने लगभग 30 कुत्ते इकट्ठे हो गए थे, उनको ठंडा रखने के लिए उनकी कोट पर पानी का छिड़काव किया जाता है.

डालमिया ने कहा, “हमारे पास किसी भी तरह की बड़ी सरकारी वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं है. इसलिए, हमारे लिए इन चीज़ों के लिए भुगतान करते रह पाना संभव नहीं है. इन चीज़ों को पूरे समुदाय के नेतृत्व में होना चाहिए, जो कि नहीं हो रहा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


यह भी पढ़ेंः कैसी ज़िंदगी जी रहे भारत के बुजुर्ग; भजन, पूजा-पाठ के अलावा करने को है और भी बहुत कुछ 


 

share & View comments