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Sunday, 16 June, 2024
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3,000 करोड़ रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन सुनवाई को बढ़ावा; eCourts फेज-3 लिए क्या है सरकार की योजना

तीसरे चरण के इस वर्ष शुरू होने की संभावना है, जिसका विजन एक अधिक सुलभ और कुशल न्याय प्रणाली को बनाना है. अधिकारियों का कहना है कि इसका एक अहम हिस्सा अदालतों को पेपरलेस बनाना है.

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नई दिल्ली: निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के 3,000 करोड़ से अधिक दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, 1,000 पेपरलेस निचली अदालतें, 1,000 से अधिक अधीनस्थ वर्चुअल कोर्ट्स, और डिजिटल स्टोरेज के लिए क्लाउड स्पेस की खरीद – अपने ई-न्यायालय परियोजना के तीसरे चरण के केंद्र सरकार के ये कुछ प्रमुख फोकस क्षेत्र हैं.

भारतीय न्यायपालिका को बदलने की दृष्टि से 2005 में ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना की परिकल्पना की गई थी. जबकि चरण I, जो 2007 में शुरू हुआ, ने बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया, चरण II, जो 2015 में शुरू किया गया था और चल रहा है, ने वादियों, वकीलों और स्टेक होल्डर्स के सर्विस डिलीवरी पर जोर दिया.

चरण III, जो इस वर्ष शुरू होने की संभावना है, जस्टिस डिलीवरी सिस्टम को नागरिकों तक उनके दरवाजे पर पहुंचाने को प्रतिबद्ध है, ताकि न्यायिक प्रणाली को हर उस व्यक्ति के लिए अधिक कुशल और न्यायसंगत बनाया जा सके जो न्याय पाने के लिए अदालतों का रुख करता है.

ईकोर्ट्स परियोजना के लिए इस वर्ष के बजट में 7,000 करोड़ रुपये के आउटले की घोषणा करते हुए, केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि चार वर्षों में शुरू किए जाने वाले चरण III को न्याय के कुशल प्रशासन के लिए शुरू किया जाएगा.

परियोजना से जुड़े कानून और न्याय मंत्रालय के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि निचली अदालत के मामलों के दस्तावेजों का डिजिटलीकरण इस चरण का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक होगा और कुल आवंटन का लगभग 30 प्रतिशत खर्च होने की संभावना है.

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हालांकि, न्यायिक रिकॉर्ड को डिजिटाइज़ करने की प्रक्रिया 2015 में दूसरे चरण में शुरू की गई थी, अधिकारियों ने कहा कि वर्तमान चरण में मुख्य फोकस निचली न्यायपालिका को पेपरलेस कामकाज की तरफ आगे बढ़ाना होगा.

पेपरलेस होना है

मंत्रालय के एक अधिकारी ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा कि निचली अदालतों में वकीलों को नए मामले शुरू करने के लिए ई-फाइलिंग सुविधा का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. अधिकारी ने कहा, “लेकिन पुराने लंबित मामलों को डिजिटाइज करने की जरूरत है ताकि इन मामलों में नए दस्तावेजों को भी ऑनलाइन दाखिल किया जा सके.” आगे उन्होंने कहा कि इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सिर्फ पेंडिंग केसेज को ही डिजिटाइज़ किया जाएगा बल्कि पुराने मामलों को भी डिजिटाइज किया जाएगा.


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अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति द्वारा एक्टिव मामलों और अदालती दस्तावेजों के संग्रह को ध्यान में रखते हुए सरकार को पिछले साल 3,108 करोड़ मामले होने का अनुमान दिया था.

ई-समिति, ई-न्यायालय परियोजना की देखरेख करने वाली गवर्निंग बॉडी है.

अधिकारियों ने कहा कि भले ही उच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतें राज्य के विषय हैं, उम्मीद है कि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण के लिए 100 प्रतिशत धन केंद्र सरकार द्वारा दिया जाएगा.

मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने कहा, ‘हम कोशिश कर रहे हैं कि राज्य साथ आएं और अगर वे योगदान देने के लिए राजी हुए तो हम उनके साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे.’

वर्चुअल हियरिंग, ई-सेवा केंद्र

दूसरा कंपोनेंट जिस पर तीसरे चरण में खर्च होने की संभावना है, वह है डिजिटल रिकॉर्ड को स्टोर करने और लाइव-स्ट्रीमिंग या ऑनलाइन सुनवाई का समर्थन करने के लिए क्लाउड स्पेस की खरीद.

अधिकारी ने कहा, ‘यह सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सूचीबद्ध सरकारी या निजी एजेंसी से खरीदा जाएगा.’

उन्होंने कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग के लिए सभी मुकदमों और उच्च न्यायालयों के लिए एक साझा मंच बनाने का प्रयास किया जाएगा. फ़िलहाल, हालांकि, YouTube पर अदालती सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग हो रही है, जिसमें प्रत्येक उच्च न्यायालय का अपना चैनल है.

दूसरे अधिकारी ने कहा, “एक सामान्य मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जाएगी और नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे ताकि लाइव स्ट्रीमिंग को सभी हाईकोर्ट और अंततः ट्रायल कोर्ट द्वारा अपनाया जा सके.”

इस चरण में वर्चुअल सुनवाई को भी बढ़ावा मिलेगा.

अधिकारियों ने कहा कि इसके लिए अधीनस्थ न्यायपालिका में और अधिक डिजिटल अदालतों का संचालन एक महत्वपूर्ण कार्य होगा.

अधिकारियों ने कहा कि देश में 20,000 ट्रायल कोर्ट्स हैं, जिनमें 1,000 की पेपरलेस मोड में बदलने के लिए पहचान की जाएगी और कई को वर्चुअल कोर्ट के रूप में कार्य करने के लिए तैयार किया जाएगा.

योजना के मुताबिक पेपरलेस अदालतों में, वकीलों और वादियों का शारीरिक रूप से उपस्थित होना वैकल्पिक होगा.

एक तीसरे अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “मामला दाखिल करने और दस्तावेजों को दर्ज करने से लेकर सबूतों की रिकॉर्डिंग तक, जहां भी आवश्यक होगा, डिजिटल होगा.”

वर्चुअल कोर्ट हाईब्रिड तरीके से काम करेंगे. न्यायाधीश के पास ऑनलाइन उपस्थिति की अनुमति देने का विवेकाधिकार होगा. कुछ मामलों को वर्चुअली ही निपटाया जाएगा.

अधिकारी ने कहा, “उदाहरण के लिए, वर्तमान में ट्रैफ़िक चालान ऑनलाइन जमा किए जाते हैं. निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट से संबंधित मामलों की सुनवाई भी ऑनलाइन की जाती है. हो सकता है कि इस तरह के और अपराध सूची में जोड़े जा सकें ताकि किसी को भीड़ बढ़ाने के लिए अदालत जाने की जरूरत न पड़े.’

इसके अलावा, हाइब्रिड मोड में काम करने वाली ट्रायल कोर्ट को जिला अस्पतालों से जोड़ा जाएगा ताकि आपराधिक मामलों में डॉक्टरों के साक्ष्य को वर्चुअली रिकॉर्ड किया जा सके.

उपरोक्त अधिकारी ने कहा, “एक दिन में, 30 डॉक्टर विभिन्न ट्रायल कोर्ट में पेश होते हैं. यदि हम उन्हें वर्चुअल कोर्ट्स का लिंक प्रदान करते हैं, तो वे अपनी नौकरी के दौरान अपना बयान दर्ज कर सकते हैं.”

एक कॉमन लीगल सवाल से बनने वाले मामलों को एक साथ मिलाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग, छेड़छाड़ को रोकने के लिए ब्लॉकचेन का विकास, और इलेक्ट्रॉनिक रूप से रिकॉर्ड किए गए साक्ष्य की समीक्षा करना अन्य क्षेत्र होंगे जिनमें तीसरे चरण में काम शुरू होगा.

अधिकारियों ने कहा कि इसके लिए प्रशासनिक नियमों में संशोधन की जरूरत होगी.

तीसरे चरण में जिलों और तालुकों में ई-सेवा केंद्रों में भी वृद्धि देखी जाएगी.

ई-सेवा एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो वादियों को मामले की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सक्षम बनाता है, उन्हें ई-फाइलिंग तक पहुंच प्रदान करता है, और उन्हें निर्णयों और आदेशों की प्रतियों तक पहुंचने में मदद करता है. वर्तमान में ऐसे 700 केंद्र हैं. अधिकारियों ने कहा कि अगले चार वर्षों में इस संख्या को बढ़ाने की योजना है.

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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