Saturday, 2 July, 2022
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दिल्ली पुलिस ने 12 कांस्टेबल्स को किया बर्खास्त, 14 साल पहले फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस से पाई थी नौकरी

ये कांस्टेबल्स 2017 में परीक्षा के जरिए भर्ती किए गये थे, जो कि पुलिस कंट्रोल रूम यूनिट में नियुक्त थे.

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नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस ने विभागीय जांच में दोषी पाये जाने पर 12 कांस्टेबल्स को उनकी सेवा से बर्खास्त कर दिया है, जिन्होंने 14 साल पहले अपनी भर्ती प्रक्रिया के दौरान फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस जमा किया था.

गौरतलब है कि ये कांस्टेबल्स 2007 में परीक्षा के जरिए भर्ती किए गये थे, जो कि पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) यूनिट में नियुक्त किए गये थे.

11 नवंबर के बर्खास्तगी आदेश में, डीसीपी (ऑपरेशन एंड पीसीआर) पंकज कुमार ने कांस्टेबलों के खिलाफ जांच का विवरण नोट किया है. दिप्रिंट के पास इस आदेश की कॉपी है.

कथित भर्ती घोटाला 2012 में तब सामने आया जब उम्मीदवारों में से एक सुल्तान सिंह ने, जिसने पहले 2007 की परीक्षा के लिए आवेदन किया था, ने कांस्टेबल (ड्राइवर) के पद के लिए फिर से आवेदन किया. 2012 में परीक्षा के लिए उसका आवेदन, जो कि डीसीपी/भर्ती द्वारा आयोजित की गई, उसी ड्राइविंग लाइसेंस के साथ आया था जिसे कि 2007 में जमा किया गया था.

डीसीपी स्पेशल ब्रांच द्वारा किए गए सत्यापन में पाया गया कि उक्त लाइसेंस मथुरा में संबंधित प्राधिकरण द्वारा जारी नहीं किया गया था.

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बर्खास्तगी के आदेश में कहा गया है, ‘इस सत्यापन रिपोर्ट ने उन सभी 81 उम्मीदवारों के संबंध में ड्राइविंग लाइसेंस के बारे में संदेह पैदा किया, जिनकी ड्राइविंग लाइसेंस रिपोर्ट दिनांक 12.11.2008 को प्राप्त हुई थी.’

इसके बाद, दिल्ली पुलिस आयुक्त के निर्देश पर मामले को आगे की जांच के लिए अपराध शाखा को ट्रांसफर कर दिया गया. इसके बाद शहर पुलिस ने मथुरा में ड्राइविंग लाइसेंस अधिकारियों को पत्र भेजकर इनका ब्यौरा मांगा.

जांच में पता चला कि इन 12 कांस्टेबल्स ने जो कि लाइसेंस जमा किए थे, उनके रिकॉर्ड लाइसेंसिंग अधिकारियों के रिकॉर्ड में नहीं थे और न ही होल्डर्स के नाम पर जारी किए गए थे.

12 नवंबर 2019 की वेरिफिकेशन रिपोर्ट ने कथित घोटाले का पर्दाफाश किया और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी को लेकर 14 अगस्त 2020 को 12 कांस्टेबलों के खिलाफ एफाआईआर दर्ज की.


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अपने बचाव में क्या बोले कांस्टेबल्स 

सवाल के घेरे में आए कांस्टेबल्स ने इस साल 23 अगस्त को इस मामले में अपने बचाव में एक संयुक्त बयान दिया है और इन्हें 1 नवंबर को व्यक्तिगत तौर से बुलाया गया.

11 नवंबर के आदेश के मुताबकि, ‘अपने उपस्थिति के साथ बचाव में, उन्होंने मुख्य रूप से दलील दी कि एफआईआर अपने आप में एक ठोस सबूत नहीं है, अपराधियों ने जरूरी औपचारिकताएं पूरी की हैं, लेकिन मथुरा परिवहन प्राधिकरण के हाथों धोखा दिया गया है और कानून के विपरीत कोई कार्य नहीं किया…’

दल्ली में आगे कहा है कि, ‘दिल्ली पुलिस विभाग भी भर्ती के तुरंत बाद लाइसेंस को वेरिफाई करने के लिए जिम्मेदार था और न कि इसे 13 साल बाद वेरिफाई करना, जारी किए गए ड्राइविंग लाइसेंसेज भी उसी प्राधिकरण द्वारा नवीकृत किए गए हैं, प्राधिकरण के अधिकारियों ने उस समय जारी करने में, समुचित रिकॉर्ड नहीं रखा और अपराधियों के पास यह तय करने के लिए कोई तंत्र नहीं था कि प्राधिकरण ने वास्तविक या डुप्लीकेट लाइसेंस जारी किया है …’

हालांकि, आदेश में कहा गया है कि ये आधार ‘अपुष्ट’ हैं और दलीलें ‘योग्यता और वास्तविकता से परे’ हैं.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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