नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने शीत लहर की स्थिति से उत्पन्न मौजूदा हालात के मद्देनजर राष्ट्रीय राजधानी में अधिकारियों को पर्याप्त रैन बसेरों की व्यवस्था सुनिश्चित करने का बुधवार को निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि कल्याणकारी राज्य में बेघर लोगों के साथ-साथ अस्पतालों में इलाज के लिए आए लोगों को पर्याप्त आश्रय उपलब्ध कराना सरकार का अनिवार्य कर्तव्य है। अदालत ने कहा कि धन या किसी अन्य संसाधन की कमी का हवाला देकर, विशेष रूप से अस्पतालों में आने वाले लोगों को ऐसी सुविधा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने यह आदेश एक स्वतः संज्ञान याचिका पर पारित किया। अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज के लिए आए मरीजों और उनके परिजनों की सड़कों पर रहने की “दयनीय स्थिति” से जुड़ी खबर का संज्ञान लेने के बाद मामले का संज्ञान लिया था।
अदालत ने एम्स, राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) और सफदरजंग ट्रॉमा सेंटर जैसे अस्पतालों के बाहर की स्थिति का संज्ञान लेते हुए दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) को निर्देश दिया कि वह ऐसे संस्थानों के करीब स्थित अंडरपास (सबवे) को अपने नियंत्रण में लेकर बुधवार शाम तक यथासंभव अधिक बिस्तरों की व्यवस्था करे, साथ ही अस्पतालों के आसपास उपलब्ध किसी भी अन्य स्थान पर रैन बसेरे भी स्थापित करे।
अदालत ने कहा, ‘‘अगर सामाजिक कल्याणकारी देश में नागरिकों को पर्याप्त आश्रय का अधिकार नहीं दिया जाता है तो यह भारतीय संविधान के भाग-3 में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों का यह अनिवार्य कर्तव्य बनता है कि जो लोग बेघर हैं और अपने या अपने परिजनों के बेहतर चिकित्सीय उपचार की तलाश में हैं, उन्हें आश्रय उपलब्ध कराया जाए।’’
पीठ ने कहा, ‘‘राज्य और उसकी एजेंसियां, जैसे अस्पताल, विकास प्राधिकरण या नगर निगम, बेहतर चिकित्सीय उपचार की तलाश में मजबूरीवश अस्पतालों में आने वाले लोगों को पर्याप्त आश्रय उपलब्ध कराने की अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकतीं। धन या किसी अन्य संसाधन की कमी का बहाना बनाकर ऐसी सुविधाएं देने से इनकार करने की अनुमति सरकार या उसकी एजेंसियों को नहीं दी जा सकती।”
अदालत ने भूमि स्वामित्व वाली सभी एजेंसियों से डीयूएसआईबी के साथ सहयोग करने को कहा और चेताया कि लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 जनवरी को तय की और संबंधित अधिकारियों से उनके द्वारा अपनाए गए उपायों पर रिपोर्ट तलब की।
पीठ ने मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अवि सिंह से स्थिति से “दीर्घकालिक” रूप से निपटने के लिए “व्यापक सुझाव” देने को कहा।
सुनवाई के दौरान डीयूएसआईबी के वकील ने बताया कि शहर में 300 से अधिक रैन बसेरे हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 19,000 लोगों की है। अदालत ने पूछा, ‘‘दो करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले शहर में 19,000 लोगों के लिए रैन बसेरे पर्याप्त होंगे?”
अदालत ने सड़कों पर रह रहे मरीजों और उनके परिजनों की “दयनीय स्थिति” से संबंधित समाचार का 12 जनवरी को स्वतः संज्ञान लिया था।
भाषा आशीष पवनेश
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