प्रयागराज, 30 जनवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक आरोपी को जमानत दे दी और आरोपियों के घुटने या उससे नीचे गोली मारने की लगातार घटनाओं के लिए पुलिस को फटकार लगाई।
अदालत ने यह संकेत भी दिया कि ऐसी मुठभेड़ों को समय से पहले पदोन्नति पाने या सोशल मीडिया पर प्रसिद्ध होने के लिए रचा गया हो सकता है।
राजू उर्फ राजकुमार नाम के एक आरोपी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा, “इस तरह की कार्रवाई की कानून की नजर में अनुमति नहीं है क्योंकि आरोपी को सजा देने का काम न्यायपालिका का है। भारत एक लोकतांत्रित देश है जो संविधान से चलता है जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट रूप से अलग की गई है।”
अदालत ने कहा, “प्रशंसा की आड़ में या अन्य बाहरी उद्देश्यों के लिए पुलिस अधिकारियों को अनावश्यक रूप से गोली चलाकर एक अपराधी को दंडित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि दंड देने का काम न्यायपालिका का है।”
अदालत के पूर्व के निर्देश के मुताबिक, प्रदेश के अपर गृह सचिव संजय प्रसाद और पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण वीडियो कान्फ्रेंस के जरिए शुक्रवार को उच्च न्यायालय के समक्ष पेश हुए और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र सरकार (2014) के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी निर्देश के अनुपालन में एक अगस्त, 2017 और 11 अक्टूबर, 2024 को डीजीपी द्वारा जारी सर्कुलर पेश किया।
उच्चतम न्यायालय ने उक्त मामले में उन पुलिस मुठभेड़ के संबंध में निर्देश जारी किए थे जिनमें आरोपी की मृत्यु होती है या वह गंभीर रूप से घायल होता है।
हालांकि, अदालत ने इन अधिकारियों के जवाब से असंतुष्टि जताते हुए निर्देश दिया कि यदि मुठभेड़ में पुलिस द्वारा गोलीबारी की जाती है जिससे आरोपी या कोई अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल होता है तो इस संबंध में मुठभेड़ में शामिल पुलिस टीम के मुखिया द्वारा प्राथमिकी दर्ज की जाएगी और इसकी जांच सीबीसीआईडी या किसी अन्य थाने की पुलिस टीम द्वारा की जाएगी।
अदालत ने कहा कि हालांकि, प्राथमिकी में मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के नाम का उल्लेख आरोपी या संदिग्ध वर्ग में करने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने कहा कि घायल अपराधी को चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए और उसकी चोट का परीक्षण करके उसका बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि पुलिस मुठभेड़ की घटना की जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट सक्षम अदालत को भेजी जानी चाहिए।
अदालत ने कहा, “समय से पहले प्रोन्नति या वीरता पुरस्कार, पुलिस मुठभेड़ के तुरंत बाद पुलिस टीम के अधिकारी को नहीं दिया जाएगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इस तरह के पुरस्कार की सिफारिश तभी की जाए जब पुलिस प्रमुख द्वारा गठित समिति उस व्यक्ति को वीरता पुरस्कार के लिए संदेह से परे पाती है।”
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि पुलिस मुठभेड़ में घायल व्यक्ति का परिवार पाता है कि उक्त प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है या स्वतंत्र जांच में खामी है तो वह सत्र न्यायाधीश को शिकायत कर सकता है। अदालत ने निर्देश दिया कि शिकायत मिलने पर संबंधित सत्र न्यायाधीश शिकायत में दम है या नहीं, इस बात को देखेगा और उसमें की गई शिकायत का निस्तारण करेगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले में यदि यह पाया जाता है कि किसी भी जिले में पुलिस अधिकारी ने मुठभेड़ की घटना में उच्चतम न्यायालय के उक्त दिशानिर्देशों का अनुपालन नहीं किया है तो ना केवल पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाला अधिकारी, बल्कि जिले की पुलिस के प्रमुख पर अदालत की अवमानना का मुकदमा चलाया जा सकता है।
भाषा सं राजेंद्र अमित
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