Tuesday, 18 January, 2022
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साफ-सफाई, सैनिटाइजेशन, ठंडा करना और इंतजार—दिल्ली में कैसे बीतता है एक मुर्दाघर कर्मचारी का दिन

मुर्दाघर कर्मचारियों को 11 घंटे की शिफ्ट में काम करने के लिए प्रतिदिन सिर्फ 50 रुपये मिलते हैं. वे बताते हैं कि पीपीई किट पहनने और पूरी सावधानी बरतने के बावजूद मरीजों के रिश्तेदार पास नहीं आना चाहते और इसका नतीजा ये होता है कि कभी-कभी शवों की गलत पहचान भी हो जाती है.

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नई दिल्ली: अफरा-तफरी और बदइंतजामी से जूझ रहे देश के सबसे बड़े कोविड अस्पतालों में से एक लोक नायक जयप्रकाश नारायण (एलएनजेपी) से कुछ ही किलोमीटर दूर एक छोटा, सामान्य-सा मुर्दाघर है, जो अस्पताल की तरह मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज से ही जुड़ा हुआ है.

गुरुवार 13 मई की दोपहर को भीषण गर्मी में अपने पीपीई किट में पसीने से लथपथ चार मुर्दाघर कर्मचारी बेहद सावधानी के साथ एक शव को एंबुलेंस से उतारकर मुर्दाघर में ले गए, जहां उसे पहले सैनिटाइज किया जाएगा और फिर बॉडी बैग में भरकर रेफ्रिजरेट किया जाएगा, तब तक के लिए जब तक मृतक के परिजन दाह संस्कार के लिए उसे लेने नहीं आते.

25 वर्षीय संदीप तिवारी मुर्दाघर के 20 कर्मचारियों में से एक हैं, जो हर दिन असहजता के साथ नोवेल कोरोनावायरस की चपेट में आने का जोखिम उठाते हैं लेकिन कहते हैं कि उन्हें डर नहीं लगता है. तिवारी का कहना है, ‘भगवान ऊपर से सब देख रहे हैं. जो लोग जरूरतमंदों की मदद करते हैं वे बीमार नहीं पड़ते.’

उन्होंने बताया, ‘शवों का इंतजाम करने वाले मॉर्चरी के सभी कर्मचारी उपयुक्त पीपीई किट पहनते हैं और 5-7 पेशेवरों की निगरानी में शवों की साफ-सफाई करके उन्हें लीक-प्रूफ बॉडी बैग में रखते हैं.’

तिवारी बताते हैं कि पहले तो उन्हें शवों को देखना भी असहज कर देता था लेकिन अब इसकी आदत हो गई है. लेकिन वह इस बात से चिंतित हैं जब उनके परिवार को पता चलेगा कि उनका काम क्या है तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी. उन्होंने अभी तक परिवार को इस बारे में नहीं बताया है, और शायद ‘कभी नहीं’ बताएंगे. वह मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के एक छात्रावास में सुरक्षा गार्ड के रूप में काम करता था, लेकिन पिछले साल दिसंबर में कांट्रैक्ट खत्म हो जाने के बाद उसने मॉर्चरी में काम करना शुरू कर दिया.

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वह कहते हैं, ‘मेरे परिवार को मेरा मुर्दाघर में काम करना कभी मंजूर नहीं होगा. बताओ, किसका परिवार इसके लिए तैयार होगा?’

संदीप तिवारी अपने परिवार में कमाने वाले एकमात्र सदस्य हैं. उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में रहने वाले उनके परिवार में उनकी मां, पिता, भाई, छोटी बहन और पत्नी शामिल हैं. उनकी शादी आठ महीने पहले ही हुई है.

मुर्दाघर के कर्मचारियों के प्रति लोग कैसी भावना रखते है, इस बारे में बताते हुए तिवारी कहते हैं कि कुछ कोविड पीड़ितों के परिवार तो यह जानने की कोशिश भी नहीं करते कि क्या उन्होंने अपने प्रियजनों के शव की सही पहचान की है, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर पास गए तो वह बीमारी की चपेट में आ सकते हैं.

तिवारी ने कहा, ‘हमारे पीपीई किट पहने रहने और सभी एहतियाती उपाय करने के बावजूद अधिकांश परिवार अभी भी यही सोचते हैं कि हम वायरस से संक्रमित हैं. वे अपने प्रियजनों के शव की पहचान तक नहीं कर पाते हैं. शवों की अदला-बदली के दो मामले अब तक सामने आ चुके हैं.’


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इस महीने कम शव आए

दिल्ली के आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन के मुताबिक, शहर में शुक्रवार को 289 कोविड मौतें हुईं और संक्रमण के 8,506 नए मामले सामने आए—जो 10 अप्रैल के बाद सबसे कम हैं. पॉजिटिविटी रेट 12.40 प्रतिशत रहा.

लेकिन अब भी हर कुछ घंटों में एक एंबुलेस एमएएमसी मॉर्चरी के गेट पर शव लेकर पहुंचती रहती है, जहां शोक संतप्त परिवारों के लिए एक अस्थायी टेंट लगाया गया है.

तिवारी बताते हैं, ‘हमें हड़बड़ी करने की आदत है, लेकिन आज कम शव आए हैं.’ वह बताते हैं कि मुर्दाघर कर्मचारियों की टीम एक शिफ्ट (सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक) में कम से कम 25 शवों को संभाल रही है, जबकि पिछले महीने यह संख्या लगभग 60 थी.

एलएनजेपी अस्पताल के नोडल अधिकारी विक्रम सिंह ने भी इस बात की पुष्टि की कि पिछले एक सप्ताह में शवों की संख्या घटी है.

विक्रम सिंह ने कहा, ‘अप्रैल में एक दिन में कम से कम 40 से 60 शव मुर्दाघर में आते थे, लेकिन मई की शुरुआत से हमने इसमें धीरे-धीरे गिरावट देखी है. उदाहरण के तौर पर गुरुवार को केवल 25 शवों को मुर्दाघर भेजा गया था.’


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बहुत मामूली मेहनताना

इतने लंबे समय तक संक्रमित शवों को संभालने के बावजूद मुर्दाघर कर्मचारियों को बहुत कम मेहनताना मिलता है—तिवारी प्रति माह सिर्फ 1,550 रुपये या प्रति दिन 50 रुपये कमाते हैं. उन्हें रविवार और राष्ट्रीय अवकाशों के मौके पर छुट्टी मिलती है.

यह पूछे जाने पर कि उनके परिवार का गुजारा कैसे चलता है, वे कहते हैं, ‘मेरे गांव के कुछ दोस्त महीनों बेरोजगार रहे हैं और कुछ के पास तो अब भी कोई काम नहीं है. हालांकि यह राशि उससे कम है जो मैं एक गार्ड के तौर पर कमाता था, मैं फिर भी इसे लेकर कोई शिकायत नहीं करना चाहता. दिल्ली में मौजूदा लॉकडाउन की स्थिति में नौकरी ढूंढ़ना बहुत मुश्किल काम है.’

शहर में कोविड की पहली लहर के दौरान अस्पताल की तरफ से इन अटेंडेंट के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. तिवारी ने मॉर्चरी इंचार्ज से भोजन की व्यवस्था बहाल करने की गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है.

शहर के बाहर से आने वाले कर्मचारियों के लिए अस्पताल के पास ही एक पेइंग गेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था की गई है लेकिन अपने भोजन का इंतजाम उन्हें खुद ही करना होता है.


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‘किसी दुस्वप्न से कम नहीं’

एक अन्य मुर्दाघर कर्मचारी, जो अपना नाम नहीं बताना चाहता, एक शोकाकुल परिजन को एंबुलेंस की तरफ ले जाता है जहां उसके मरीज एक शव इंतजार पड़ा हुआ है. इस कर्मचारी को हाल ही में ऑपरेशन थियेटर से मॉर्चरी में शिफ्ट किया गया है, लेकिन उसे दोनों में ही कोई फर्क नजर नहीं आता. वह कहता है, ‘दोनों ही एक दुस्वप्न को जीने की तरह हैं.’

हालांकि, काम पूरा करके घर लौटने पर यह सोचकर परेशान होने से बदतर कुछ भी नहीं है कि कहीं परिवार को संक्रमित न कर दें. उसने कहा कि यहां तक कि घर में भी हम लोग रोज दो मास्क पहनते हैं.

दूसरा कर्मचारी कहता है, ‘मैं कभी नहीं चाहता कि मेरा परिवार मेरी वजह से कोविड की चपेट में आए, लेकिन यह नौकरी भी मैं नहीं छोड़ सकता. मेरी बेटी अभी सिर्फ पांच साल की है. अगर वह मेरी वजह से पॉजिटिव हो गई तो यह अपराधबोध मेरी जान ले लेगा.’

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