नई दिल्ली: पिछले साल मध्य प्रदेश में बाघों की 55 मौतों में से 38 यानी 69 प्रतिशत मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं, जिनमें आपसी लड़ाई, बीमारियां और दुर्घटनाएं शामिल हैं. राज्य सरकार ने यह बात पिछले हफ्ते मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में दाखिल एक विस्तृत हलफनामे में कही.
इन 38 में से 13 बाघ एक साल से कम उम्र के थे—इस उम्र में मृत्यु दर ज्यादा होती है. हलफनामे में यह भी माना गया कि राज्य के अलग-अलग नेशनल पार्कों में बाघों की ज्यादा संख्या के कारण पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं. इन समस्याओं से निपटने के लिए राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से मदद मांगी थी.
इसके अलावा, 55 में से 11 बाघों यानी 20 प्रतिशत की मौत करंट लगने से हुई, जो अधिकतर अवैध बिजली कनेक्शन के कारण था. हलफनामे में कहा गया कि इनमें से कोई भी मामला बाघों का शिकार करने या उनके अंगों की तस्करी के इरादे से नहीं था.
कुल मौतों में छह मामले शिकार के साबित हुए, जो कुल संख्या का 11 प्रतिशत है. राज्य ने कहा कि ये मामले फील्ड में काम कर रहे वन अधिकारियों की सतर्क और प्रभावी खुफिया व्यवस्था के कारण सामने आए. इन सभी मामलों में आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया गया, जिससे यह दिखता है कि वन अधिकारी वन्यजीव क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों के खिलाफ सक्रिय हैं.
राज्य सरकार ने यह हलफनामा पर्यावरण कार्यकर्ता अजय दुबे द्वारा दायर जनहित याचिका पर हाई कोर्ट के नोटिस के जवाब में दाखिल किया. वरिष्ठ वकील आदित्य सांघी के जरिए पेश याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि वह एमपी सरकार को बाघों की मौत रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दे, क्योंकि उनके मुताबिक ये मौतें शिकार के कारण हो रही हैं.
हलफनामे में कारणों के आधार पर विश्लेषण का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि “राज्य में बाघों की मौत का वैज्ञानिक तरीके से आकलन, तुरंत जांच और प्रभावी कार्रवाई की जा रही है.” इसमें कहा गया कि बड़े पैमाने पर शिकार या प्रशासनिक लापरवाही के आरोप तथ्यात्मक रूप से गलत हैं.
हालांकि, हलफनामे में साफ तौर पर यह भी माना गया कि संगठित वन्यजीव अपराध की प्रभावी जांच में राज्य के वन अधिकारियों को कानूनी सीमाओं का सामना करना पड़ता है, खासकर उन मामलों में जहां डिजिटल माध्यम से संपर्क और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क शामिल होते हैं.
वन्यजीव अपराध की जांच करने वाले अधिकारियों को केंद्र सरकार ने अधिकृत एजेंसी के रूप में अधिसूचित नहीं किया है. अगर ऐसा होता तो वे सीधे टेलीकॉम कंपनियों से मोबाइल कॉल रिकॉर्ड ले सकते थे. ज़रूरी जानकारी बुलाने के कानूनी अधिकार न होने के कारण वन अधिकारियों को अन्य विभागों और केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे जांच में देरी होती है और असर पड़ता है.
राज्य ने बताया कि उसने यह मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय और दूरसंचार विभाग (DoT) के सामने उठाया है, लेकिन अभी तक औपचारिक अधिसूचना नहीं मिली है.
राज्य ने कहा कि इस तरह की शक्तियों की कमी से यह ज़रूरत साफ होती है कि वन्यजीव अपराध पर सख्ती के लिए केंद्र स्तर पर उचित कानूनी व्यवस्था हो, ताकि संगठित और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव अपराध को प्रभावी ढंग से रोका जा सके.
वन अधिकारियों का मनोबल बना रहे और वे प्रभावी तरीके से काम कर सकें, इसके लिए राज्य ने उनके संरक्षण के कदम भी उठाए हैं.
अदालत में प्रभावी पैरवी के लिए राज्य ने मध्य प्रदेश वन विभाग के लिए एक विशेष कानूनी प्रकोष्ठ बनाने की प्रक्रिया शुरू की है. शुरुआत में छह विशेष लोक अभियोजक विभाग से जोड़े जाएंगे, जो वन्यजीव अपराध से जुड़े मामलों को संभालेंगे.
ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन 2022 के अनुसार, मध्य प्रदेश में 785 बाघ हैं, जो भारत के कुल 3,682 बाघों का 21 प्रतिशत से अधिक है.
हलफनामे में कहा गया कि संरक्षण के प्रयास सिर्फ संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कॉरिडोर और अन्य इलाकों तक भी बढ़ाए गए हैं. इसके लिए राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का पालन किया जा रहा है.
राज्य ने यह भी माना कि 2019 से 2025 के बीच एमपी में बाघों की मृत्यु दर छह प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा रही, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह पांच प्रतिशत से कम थी, लेकिन इसका कारण राज्य में बाघों की आबादी में तेज़ वृद्धि है, जो राष्ट्रीय दर से लगभग दोगुनी है.
राज्य ने यह भी कहा कि ज्यादा मामलों का पता चलना उसके सतर्क फील्ड स्टाफ की वजह से संभव हुआ है.
हलफनामे में यह भी बताया गया कि राज्य सरकार बाघों की सुरक्षा के लिए सक्रिय क्यों है. बाघ पर्यटन ने राज्य को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर पहचान दिलाई है और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए हैं.
इसलिए राज्य ने कहा कि वह बाघों के संरक्षण और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पर्यावरण संतुलन, आवास सुरक्षा और जिम्मेदार पर्यटन सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा रहा है.
बाघों की मौत कम करने के लिए राज्य ने आम जनता समेत सभी पक्षों के साथ मिलकर काम किया है और वैज्ञानिक आधार पर नीतियां अपनाई हैं.
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