जगदलपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक दर्जन से ज्यादा सरेंडर कर चुके माओवादी कैडर को काउंटर टेररिज्म एंड जंगल वारफेयर (CTJW) कॉलेज भेजा है, जहां वे नए भर्ती जवानों को अपने काम करने के तरीके के बारे में बताएंगे, खासकर इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) को संभालने के बारे में. दिप्रिंट को इस बारे में जानकारी मिली है.
सरेंडर कर चुके इन कैडर में से ज्यादातर पहले प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के साथ रहते हुए ‘IED एक्सपर्ट’ के तौर पर काम करते थे. कुछ लोग संगठन के मेडिकल विभाग में भी काम करते थे, जो गुरिल्ला लड़ाकों को प्राथमिक उपचार और चोट या बीमारी का इलाज देता था.
ये लोग कांकेर स्थित कॉलेज में सब-इंस्पेक्टर और डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के नए बैच को जानकारी देंगे. यह राज्य का प्रमुख ट्रेनिंग संस्थान है, जहां गुरिल्ला युद्ध की रणनीति सिखाई जाती है.
बस्तर रेंज के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस सुंदरराज पट्टिलिंगम ने कहा कि इस कदम का मकसद नए भर्ती जवानों को माओवादियों के काम करने के तरीके और गुरिल्ला रणनीति के बारे में जानकारी देना है, ताकि उन्हें मैदान में काम करने की बेहतर ट्रेनिंग मिल सके.
सरेंडर कर चुके माओवादी कैडर को भेजने की योजना तब बनी, जब आईजी कार्यालय ने संभाग के सभी जिलों—बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर, कांकेर और कोंडागांव, के पुलिस अधीक्षकों को पत्र भेजकर ऐसे उपयुक्त कैडर के नाम मांगे और उनकी यात्रा की निगरानी के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा.
सूत्रों के अनुसार, आईजी के निर्देश के बाद सुकमा से ऐसे 6 सरेंडर कैडर भेजे गए, जबकि बीजापुर से 2 कैडर इस तीन दिन के सत्र के लिए भेजे गए हैं. दंतेवाड़ा और कांकेर से भी इस सत्र के लिए 5-5 कैडर भेजे गए हैं.
योजना से जुड़े एक पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “यह योजना सीधे उन्हीं से सुनने की है. नए भर्ती जवानों को बस्तर के जंगलों में आईईडी और बारूदी सुरंगों को संभालने की ट्रेनिंग की जरूरत है, क्योंकि इस क्षेत्र में IED को हटाने का बड़ा अभियान चलाया जाना है.”
माओवादी संगठन के मेडिकल टीम के सदस्यों को शामिल करने के बारे में अधिकारी ने कहा कि उनके इलाज के तरीके और एलोपैथिक दवाओं की समझ भी महत्वपूर्ण है.
उन्होंने कहा, “कई बार ऐसा हुआ है कि माओवादी संगठन के वरिष्ठ सदस्य मुठभेड़ में घायल हुए, लेकिन फिर भी लंबे समय तक जीवित रहे. उन्होंने किस तरह इलाज की योजना बनाई और उसे प्रभावी बनाया, इसे समझना जरूरी है. यह जानकारी जंगल में काम कर रहे बलों के लिए काम आ सकती है.”
अधिकारियों ने कहा कि हाल के समय में लगाए गए IED की पहचान करने में सरेंडर कर चुके माओवादी कैडर की जानकारी काफी महत्वपूर्ण रही है और यह सत्र उनकी समझ को और बढ़ाएगा.
एक अन्य अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “हम जंगलों और सड़कों पर IED ढूंढने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कई बार तलाशी अभियान के दौरान सरेंडर कर चुके लोगों ने पत्तों की बनावट देखकर IED की जगह पहचानने में मदद की है. उन्होंने बताया कि वे IED लगाने की जगह को पहचानने के लिए खास तरीके से पत्ते रखते थे.”
अधिकारी ने आगे कहा, “बस्तर का इलाका और वह भौगोलिक क्षेत्र जहां IED लगाए गए हो सकते हैं, बहुत बड़ा है और तकनीक के लिए भी चुनौतीपूर्ण है. इस इलाके को जल्दी IED से मुक्त करने के लिए हमें इंसानी जानकारी और अनुभव की जरूरत है.”
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