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Monday, 22 April, 2024
होमदेश‘ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म नहीं तय कर सकते फ्री स्पीच’, ब्लॉक संबंधी आदेशों पर HC में केंद्र की दलील

‘ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म नहीं तय कर सकते फ्री स्पीच’, ब्लॉक संबंधी आदेशों पर HC में केंद्र की दलील

ट्विटर ने कर्नाटक हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से पिछले साल 39 हैंडल ब्लॉक किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी.

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने गुरुवार को कर्नाटक हाईकोर्ट में दलील दी कि कई हैंडल ब्लॉक किए जाने को चुनौती देने वाली ट्विटर की याचिका विचार योग्य नहीं हैं. ट्विटर की कंटेंट मैनेजमेंट नीतियों को ‘विफल’ बताते हुए केंद्र ने कहा कि माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ‘फेक न्यूज या जान-बूझकर गलत सूचना के प्रसार को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही है.’

सरकार ने ट्विटर को ‘नियम-कायदों की अनदेखी का आदी’ प्लेटफॉर्म करार देते हुए दोहराया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, लैंड ऑफ लॉ (यानी स्थानीय स्तर पर लागू होने वाले कानून) है और साथ ही जोड़ा कि ‘देश में सेवाएं देने वाले विदेशी प्लेटफॉर्म यह दावा करने के हकदार नहीं हैं कि भारतीय नियम और कानून उन पर लागू नहीं होते.’

सरकार ने पिछले साल केंद्र की तरफ से पारित 10 आदेशों के खिलाफ ट्विटर की एक याचिका के जवाब में कोर्ट से कहा, ‘यह इंटरमीडियटरी प्लेटफॉर्म यह तय नहीं कर सकता कि कौन-सा कंटेंट फ्री स्पीच है और कौन-सा इसके दायरे में नहीं आता.’

अपनी याचिका में ट्विटर ने इन आदेशों—जो 39 हैंडल को ब्लॉक करने से संबंधित हैं—को यह तर्क देते हुए ‘मनमाना, अनुपातहीन और जरूरत से ज्यादा कड़ा कदम’ करार दिया था कि कारणों के आधार पर इनमें से अधिकांश आदेशों को जायज नहीं ठहराया जा सकता.

ट्विटर ने यह तर्क भी दिया था कि आदेश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए का पालन नहीं करते हैं, जो केंद्र को किसी भी जानकारी तक ऑनलाइन पहुंच को रोकने का निर्देश जारी करने की अनुमति देती है.

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कानून के मुताबिक, इस तरह के उपाय केवल ‘भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में या किसी भी संज्ञेय अपराध के लिए उकसाने से रोकने के लिए किए जा सकते हैं.’

सैन फ्रांसिस्को में मुख्यालय वाली कंपनी की तरफ से किए गए दावों को चुनौती देते हुए केंद्र सरकार ने कहा कि ट्विटर ने हैंडल ब्लॉक करने के इन आदेशों पर अमल ‘कई बार रिमाइंडर और कारण बताओ नोटिस के बाद ही’ किया है.

सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि ट्विटर की ओर यह देरी जान-बूझकर की गई थी. सरकार ने कहा कि कंपनी ने आदेशों का पालन करने में ‘जान-बूझकर बहुत ज्यादा समय (कुछ मामलों में तो एक वर्ष से अधिक) लगाया.

केंद्र ने कहा कि, ‘इसके पीछे इरादा यह था कि ब्लॉक करने के आदेश अपनी प्रासंगिकता खो दें और धारा 69ए के तहत सामग्री अधिक वायरल हो जाए और अन्य प्लेटफार्मों पर भी पहुंच जाए. इससे संप्रभुता और अखंडता, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ता ही है. और कानून-व्यवस्था के मुद्दे अंततः नागरिकों और देश को जोखिम में डाल देते हैं.’


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‘भारत-विरोधी तत्व कर रहे इस प्लेटफॉर्म का उपयोग’

अपनी आपत्तियों के संदर्भ में हाईकोर्ट के समक्ष दायर एक विस्तृत बयान में केंद्र सरकार ने कहा कि ट्विटर परोक्ष रूप से भारत में अपने यूजर्स को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिले भाषण और अभिव्यक्ति के गारंटीशुदा अधिकार के बचाव की कोशिश कर रहा है.

केंद्र ने कहा कि ट्विटर एक ‘विदेशी कंपनी है, जो केवल फाइनेंशियल फायदे के लिए एक वाणिज्यिक गतिविधि चला रही है.’ कंपनी को इसका कोई अधिकार नहीं है कि वह अपने यूजर्स के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाए.

हैंडल ब्लॉक करने संबंधी आदेशों की व्याख्या करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया, ‘इस डिजिटल युग में भारत विरोधी तत्व और विदेशी दुश्मन ऐसे प्लेटफॉर्म का उपयोग राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए करते हैं जिससे देश में अशांति और अव्यवस्था की स्थिति भी पैदा होती है.’

केंद्र ने कहा, ‘भ्रामक सामग्री, फेक न्यूज, धार्मिक या जातीय आधार पर हेट स्पीच वाला कंटेंट व्यापक तौर पर फैल रहा है और इसमें अन्य रूपों या अन्य तरीकों से कई गुना तेजी से दूसरे प्लेटफार्मों पर फैलने की क्षमता होती है.’

असत्यापित, अनाम खाते

ट्विटर ने भी अपनी याचिका में इस पर आपत्ति जताई कि केंद्र सरकार ने उन खातों के संबंध में नोटिस जारी नहीं किया, जिन्हें ब्लॉक करने की मांग उसने अपनी तरफ से की थी.

हालांकि, केंद्र ने अब जोर देकर कहा है कि जहां तक अनाम खातों का सवाल है, उन्हें नोटिस जारी करने की बाध्यता नहीं है, और इस संबंध में मौजूदा कानूनों के तहत ट्विटर को नोटिस देना ही पर्याप्त होगा.

सरकार ने यह भी कहा कि विचाराधीन खाते सत्यापित नहीं हैं और यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि वे भारतीय नागरिकों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं या फर्जी, अनाम या बॉट हैं. आपत्तियों पर अपने बयान में केंद्र की तरफ से कहा गया है कि अनाम को संविधान के तहत कोई मौलिक अधिकार नहीं है.

इसके अलावा, केंद्र ने ट्विटर के इस तर्क पर भी आपत्ति जताई कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित मुद्दों से संबंधित कंटेंट के लिए यूजर्स को नोटिस जारी करना ‘कोई विवेकपूर्ण और समझदारी वाला विकल्प नहीं है.’ सरकार ने इस पर जोर दिया कि ऐसे अधिकांश आदेश राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े कंटेंट को लेकर ही जारी किए जाते हैं.’

बयान के मुताबिक, ‘उदाहरण के तौर पर इसमें भारत विरोधी या देशद्रोही या धार्मिक रूप से आपत्तिजनक ऐसा कोई भी कंटेंट शामिल है जिसमें हिंसा भड़काने की क्षमता हो, और ऐसी सामग्री जो देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ती हो जैसे एसएफजे या खालिस्तान से संबंधित कंटेंट.

सरकार ने हाईकोर्ट को बताया, ‘ये कंटेंट उन यूजर्स की तरफ से पोस्ट किए जाते हैं जो आतंकवादी, देशद्रोही या फिर उनके साथ हमदर्दी रखने वाले हैं या फिर विदेशी दुश्मन हैं, जिनका इरादा सांप्रदायिकता के आधार पर भारत और इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को चोट पहुंचाने का होता है.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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