scorecardresearch
Thursday, 27 March, 2025
होमदेशनकद बरामदगी विवाद: न्यायालय में याचिका दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध

नकद बरामदगी विवाद: न्यायालय में याचिका दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध

Text Size:

(फाइल फोटो के साथ)

नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर उससे दिल्ली पुलिस को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर अधजले नोटों की गड्डी मिलने के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

याचिका में के वीरास्वामी मामले में 1991 में शीर्ष अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले को भी चुनौती दी गई है। शीर्ष अदालत ने 1991 में फैसला सुनाया था कि प्रधान न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना उच्च न्यायालयों या शीर्ष अदालत के किसी न्यायाधीश के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।

नकदी की कथित बरामदगी 14 मार्च की रात को करीब 11 बजकर 35 मिनट पर यहां लुटियंस क्षेत्र में न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद हुई थी। अग्निशमन अधिकारी आग बुझाने आवास पर पहुंचे थे।

बाद में प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाले उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम और दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को न्यायमूर्ति वर्मा से न्यायिक कार्य वापस लेने समेत कई निर्देश जारी किए।

प्रधान न्यायाधीश ने जांच के लिए एक अंदरूनी समिति गठित की और दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय से कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न सौंपा जाए। सोमवार को न्यायमूर्ति वर्मा को अगले आदेश तक रोस्टर से हटा दिया गया।

अधिवक्ता मैथ्यूज जे नेदुम्परा और तीन अन्य ने 23 मार्च को शीर्ष अदालत में याचिका दायर करते हुए यह भी कहा कि न्यायाधीशों को दी गई छूट कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है और इससे न्यायिक जवाबदेही एवं कानून के शासन को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं।

याचिका में कहा गया है, ‘‘यह घोषित किया जाए कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी पर आग बुझाने के लिए जब अग्निशमन बल/पुलिस की सेवाएं ली गईं, तब भारी मात्रा में नकदी मिलना भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय अपराध है और पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह प्राथमिकी दर्ज करे…।’’

याचिका में 1991 के इस फैसले को चुनौती दी गई है कि ‘‘प्रधान न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के बिना उच्च न्यायालयों या उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।’’

याचिका में कहा गया है, ‘‘(शीर्ष) अदालत के संबंधित फैसले में कानून की अनदेखी की गई है। उसमें इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया है कि पुलिस का यह वैधानिक कर्तव्य है कि जब उसे किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिले, तो वह प्राथमिकी दर्ज करे। शीर्ष अदालत का उक्त निर्देश पुलिस को उसके वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकने के अलावा कुछ नहीं है।’’

याचिका में कहा गया है कि इस निर्देश ने विशेषाधिकार प्राप्त पुरुषों और महिलाओं के एक विशेष वर्ग का निर्माण किया है, जिसे देश के दंड कानूनों से छूट हासिल है।

याचिका में कहा गया है कि न्यायमूर्ति वर्मा से जुड़े मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। इसमें मामले की जांच के लिए कॉलेजियम द्वारा गठित की गई तीन सदस्यीय जांच समिति पर भी सवाल उठाया गया है।

याचिका में दिल्ली पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने और अन्य लोगों को राज्य के संप्रभु पुलिस कार्य में हस्तक्षेप करने से रोकने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

भाषा राजकुमार पारुल

पारुल

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

share & View comments