पटना, 23 मार्च (भाषा) बिहार की स्थापना के 110 साल पूरे होने के मौके पर विद्वानों, संरक्षण वास्तुकारों और अन्य लोगों ने पटना व राज्य के अन्य शहरों में स्थित धरोहरों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला और अधिकारियों से अपील की कि वे समग्र विकास के लिए इनको ध्वस्त करने के बजाय संरक्षण पर ध्यान दें।
गौरतलब है कि साल 1925 में स्थापित बिहार और ओडिशा के पहले मेडिकल कॉलेज पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) समेत विभिन्न पुरानी इमारतों को पुनर्विकास परियोजनाओं के लिए ध्वस्त करने के कदम का पुरजोर विरोध किया जा रहा है। विभिन्न विरासत प्रेमियों ने इस पर चिंता व्यक्त की है।
पटना में रहने वाले संरक्षण वास्तुकार 25 वर्षीय दीपांशु सिन्हा ने मंगलवार को कहा कि बिहार दिवस राजधानी पटना और राज्य में अन्य जगहों पर स्थित धरोहरों की दुर्दशा और इनकी स्थिति में सुधार पर चर्चा करने का एक अवसर होना चाहिये।
उन्होंने कहा, ”हर साल स्थापना दिवस पर बिहार व इसकी विरासत, हजारों वर्षों के इतिहास और पाटलिपुत्र यानी पटना के बारे में जोर-शोर से बात की जाती है। लेकिन, हम पाटलिपुत्र को कितना संरक्षित कर पाए हैं? आधुनिक काल में हम असंवेदनशील विकास के सामने पटना को कितना बचा पाए हैं? बिहार के स्थापना दिवस पर हमें खुद से भी पूछना चाहिए कि हमने अपनी विरासत की रक्षा के लिए क्या किया है, तभी यह एक सार्थक उत्सव होगा।”
कई अन्य विरासत विशेषज्ञों ने बिहार के गया, मुंगेर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और अन्य शहरों में कई विरासत भवनों की खराब स्थिति पर भी प्रकाश डाला और सरकार से इनके संरक्षण की अपील करते हुए कहा कि समग्र विकास के लिए इनको ध्वस्त करने के बजाय संरक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिये।
पटना में रहने वाले स्वतंत्र शोधकर्ता और ”पटना: खोया हुआ शहर” के लेखक अरुण सिंह ने पटना और राज्य के अन्य शहरों की निर्मित धरोंहरों की दुर्दशा पर खेद व्यक्त किया।
उन्होंने कहा, ”कई पुरानी इमारतें जो बिहार की पहचान की प्रतीक हैं या जो 1912 में नए प्रांत के निर्माण से पहले बनी थीं, या तो गुम गई हैं या खस्ताहाल हो चुकी हैं। हम सभी को अपने गौरवशाली अतीत, प्राचीन और आधुनिक इतिहास को बचाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।”
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जोहेब सुरेश
सुरेश
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