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रांची में विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं ने भारत बंद का समर्थन किया | पीटीआई
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नयी दिल्ली : केंद्रीय ट्रेड यूनियन ने मंगलवार और बुधवार को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा एकतरफा श्रमिक कार्य सुधार कानून लाने के विरोध को लेकर भारत बंद का ऐलान किया है. कर्नाटक में हो रहे भारत बंद प्रदर्शन के दौरान एक महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत हो गई है.

बंद का असर

देशव्यापी हड़ताल की शुरुआत सोमवार की आधी रात से हो चुकी है. भारत बंद का असर कर्नाटक, केरल, बंगाल, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में देखा जा सकता है. कर्नाटक में एक महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की मौत हो गई. वहीं मुंबई के बस सर्विस बेस्ट के भारत बंद का समर्थन करने के चलते वहां की यातायात व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है. इसके अलावा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और सीपीआई(एम) के कार्यकर्ताओं में झड़प की भी घटनाएं हुई है. ओडिशा में दो दिन के लिए स्कूल बंद करा दिया गया है.

ट्रेड यूनियनों को देश के लगभग सभी केंद्रीय कर्मचारियों, राज्य कर्मचारियों, बैंककर्मियों, बीमा कर्मियों, टेलीकॉम कर्मचारियों और अन्य कर्मचारियों के स्वतंत्र महासंगठनों का समर्थन मिल चुका है.

क्यों है हड़ताल

हड़ताल की प्रमुख वजह ट्रेड यूनियन कानून 1926 का विरोध है. ट्रेड यूनियन के जनरल सेक्रेटरी तपन सेन के मुताबिक भारत सरकार ट्रेड यूनियन कानून 1926 का संशोधन करके उसमें तथाकथित पारदर्शिता लाना चाहती है. इस संशोधित बिल से श्रमिकों को बंधुआ मजदूर बनाने का माहौल तैयार किया जा रहा है. वर्तमान मोदी सरकार अपनी सुविधा के हिसाब से ट्रेड यूनियनों के लिए मान्यता देकर, उनके लिए नियम कानून बनाकर उन पर लगाम कसना चाहती है.

आपको बताते चलें बीते 2 जनवरी को भारत सरकार ने ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 को संशोधन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. इस संशोधन का उद्देश्य ट्रेड यूनियन को मान्यता प्रदान करना था. मौजूदा कानून में ट्रेड यूनियनों को केवल पंजीकरण कराने का अधिकार है.

आरएसएस से संबधित संगठन ने रखा खुद को दूर

देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन और आरएसएस से संबधित भारतीय मजदूर संघ ने इस देशव्यापी आंदोलन से खुद को दूर रखा है. दिप्रिंट से बातचीत में संघ के उपाध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया, ‘यह जो स्ट्राइक है वो राजनैतिक है. इनके पोस्टर पर मांगे कुछ और हैं और सरकार के सामने प्रस्तुत की गई मांग अलग है.’

उन्होंने आगे बताया कि 2 सितंबर 2015 में भी एक देशव्यापी हड़ताल हुई थी. हमने मांगों का समर्थन किया था. हमारी मांग थी कि कर्मचारियों के बोनस में बढ़ोत्तरी की जाए. संविदा कर्मचारियों की दिहाड़ी बढ़ाई जाए. इसके बाद मजदूर संगठनों और सरकार की मीटिंग हुई जिसमें लगभग सभी संगठन के लोग मौजूद थे. सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर हमारी असहमति थी. उस मीटिंग में अंतिम राय यही बनी कि सरकार को तीन-चार महीने का समय दिया जाए और समस्या का निदान हो जाएगा. लेकिन जो ट्रेड यूनियन के लोग आज आंदोलन कर रहे हैं, वे मीडिया के सामने आकर पलट गए. अंदर सहमति जताने के बाद बाहर आकर कहा कि कोई सहमति नहीं बनी और सरकार का विरोध जारी है. जब सयुंक्त वार्ता में सहमति नहीं बन पा रही है तो हम आगे कैसे साथ आ पाएंगे.

महेंद्र आगे कहते हैं, ‘जहां तक मांगों की बात है तो बोनस में बढ़ोत्तरी की गई है और उसे 3500 से बढ़ाकर 7000 कर दिया गया है. संविदा कर्मचारियों का भी वेतन 120 रुपये से बढ़ाकर 348 रुपये कर दिया गया है. ’

मोदी सरकार द्वारा ट्रेड यूनियन एक्ट के संशोधन पर महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि इसमें जो मजदूर संगठन जितना ज्यादा बड़ा होगा उसको वेरिफिकेशन के बाद उसी अनुपात में सीटें मिलेंगी.

यहां ध्यान देनी वाली बात है कि भारतीय मजदूर संघ संख्या के लिहाज से देश का सबसे बड़ा संगठन है. उसके बाद अखिल भारतीय मजदूर कांग्रेस संघ और अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन का नंबर आता है.

 ममता बनर्जी ने नहीं किया समर्थन

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दो दिन के इस देशव्यापी आंदोलन में समर्थन नहीं देने का फैसला किया है. ममता बनर्जी ने कहा कि मैं इस मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोलना चाहती हूं और हमने किसी भी बंद के समर्थन का फैसला नहीं किया है. उन्होंने वामदलों पर आरोप लगाते हुए कहा कि बंगाल में पिछले 34 साल के शासन में वामदलों ने लगातार बंद का आह्वाहन करके पूरे राज्य को बर्बाद कर दिया है.


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