नयी दिल्ली, 30 जनवरी (भाषा) विधि आयोग की एक शीर्ष पदाधिकारी ने शुक्रवार को कहा कि विवादों का पूर्वानुमान लगाने और उन्हें मुकदमेबाजी में तब्दील होने से बचाने के लिए आंकड़ों, प्रौद्योगिकी और संस्थागत समन्वय का बेहतर उपयोग करने वाली शासन व्यवस्था की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि अब ‘‘प्रतिक्रियात्मक न्यायिक निर्णय से पूर्वानुमानित शासन’’ की ओर बदलाव की आवश्यकता है
विधि आयोग की सदस्य सचिव अंजू राठी राणा की ये टिप्पणियां अदालतों में लंबित मामलों की संख्या पांच करोड़ से अधिक हो जाने की पृष्ठभूमि में आई हैं।
राणा के विचार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सरकार यह ठप्पा हटाने की कोशिश कर रही है कि वह (सरकार) देश में सबसे अधिक मुकदमेबाजी करती है।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’से कहा, ‘‘सुधारों का ध्यान बेहतर शासन पर केंद्रित होना चाहिए जिसमें डेटा, प्रौद्योगिकी और संस्थागत समन्वय का उपयोग कर विवादों का पूर्वानुमान लगाया जाए और उन्हें मुकदमेबाजी में तब्दील होने से पहले ही सुलझा लिया जाए…।’’
पूर्व केंद्रीय विधि सचिव राणा ने कहा कि भारत में न्यायिक मामलों का लंबित होना अब केवल अदालतों तक सीमित समस्या नहीं रह गई है।
उन्होंने कहा,‘‘भारतीय अदालतों में लंबित मामलों की चुनौती ने शासन के उच्चतम स्तरों पर बार-बार ध्यान आकर्षित किया है। यह एक ऐसी चुनौती है जिसका जनता के विश्वास, आर्थिक भरोसे और नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।’’
राणा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बार-बार रेखांकित किया है कि न्याय में देरी से जनता का विश्वास कम होता है और इससे गंभीर आर्थिक और सामाजिक बोझ बढ़ता हैं।
उन्होंने कहा कि मामलों का लंबित होना केवल एक कानूनी या न्यायिक चिंता का विषय नहीं है बल्कि यह एक संरचनात्मक, प्रशासनिक और प्रणालीगत मुद्दा भी है।
राणा ने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, मुकदमेबाजी भूमि विवाद, वाणिज्यिक असहमति आदि मामलों में स्वत: प्रतिक्रिया बनी हुई है।
भारतीय विधि सेवा (आईएलएस) की वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि न्याय व्यवस्था में कई हितधारक शामिल होते हैं जिनमें अदालतें, वकील, जांच एजेंसियां और महत्वपूर्ण रूप से, स्वयं सरकार शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘न्यायिक बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि केवल क्षमता बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। कई अन्य कारक भी इस लंबित मामलों के लिए जिम्मेदार हैं… डेटा विश्लेषण और वास्तविक समय में मुकदमों की स्थिति का प्रबंधन अदालतों पर अत्यधिक बोझ पड़ने से पहले ही देरी के संभावित कारणों, जैसे कि बार-बार की जाने वाली सरकारी अपीलें या नियमित सेवा विवाद, की पहचान करने में मदद कर सकता है।’’
राणा ने सुझाव दिया कि सावधानीपूर्वक तैयार किए गए कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना देरी के ‘पैटर्न’ की पहचान करने, प्रक्रियात्मक अड़चनों को चिह्नित करने, अदालतों को मामलों को प्राथमिकता देने और समय-सीमा को लागू करने में सहायता कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को एक सहायक के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, न कि विकल्प के रूप में। इससे न्यायाधीशों और प्रशासकों को उन मामलों में समय रहते कदम उठाने की सुविधा मिलनी चाहिए जहां देरी का अनुमान लगाया जा सकता है और उसे टाला जा सकता है।
राणा ने कहा कि सरकारी मुकदमेबाजी न्यायिक ढांचे पर दबाव का एक और प्रमुख केंद्र है तथा बार-बार नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद, सरकारें देश में सबसे बड़े मुकदमेबाजों में से एक बनी हुई हैं।
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश
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