News on Sewage Workers Protes
जंतर मंतर पर सीवर कर्मचारियों के धरना प्रदर्शन के दौरान लगे पोस्टर | शुभम सिंह
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‘एक शाम की बात है. मैं सीवर की सफाई करने के लिए गटर में घुसा था. तीन से चार घंटे बीत चुके थे. जहरीली गैस की वजह से मुझे घुटन होने लगी. और अचानक ही मेरी हालत खराब हो गई. मेरे साथ एक सहायक कर्मचारी था, लेकिन वो मौके से नदारद था. मैं छटपटाने लगा. और कुछ ही देर में मैं बेहोश हो गया.’

फिर?

‘मेरे साथ काम कर रहा व्यक्ति वापस आया, और समय रहते मुझे वहां से निकाल लिया गया. वो मुझे काफी मशक्कत के बाद अस्पताल ले गया. संयोगवश मैं बच गया. लेकिन मुझे उस घुटन से अभी तक निजात नहीं मिली है. मैं ‘बच’ नहीं पाया हूं.’

पंजाब के कलेर गांव के राहुल लंकेश की यह आपबीती महज एक कहानी नहीं है. बल्कि यहां हर दिन हजारों की संख्या में सीवर में उतर कर सफाई करने वाले कर्मचारी दो-चार होते हैं. राहुल लंकेश की यह कहानी महज बानगी भर है.

राहुल आगे बताते हैं कि उन्हें हर दिन उस घुटन में जीना पड़ता है. वह इससे निकलना तो चाहते हैं, लेकिन मजबूर हैं.

राहुल एक सीवर कर्मी हैं. हमारे घर की गंदगी, जिसमें हमारे मल-मूत्र आदि शामिल होते हैं, वे सीवर में जाते हैं. कई दफा ऐसा भी होता है कि राहुल के पास मुंह ढंकने के लिए मास्क नहीं होता. हाथों को सुरक्षित करने के लिए दस्ताने भी नहीं मिलते, लेकिन वो अपना काम पूरी निष्ठा से करते हैं. ताकि गटर में जाने वाली वो गंदगी सड़कों पर न आ जाए. वो हमारे नालियों को जाम न कर दे.

वेतन कितना मिलता है?

‘वेतन का क्या है. ऐसे तो बोला गया था साढ़े सात हज़ार मिलेगा, लेकिन कभी साढ़े चार हज़ार तो कभी साढ़े पांच हज़ार. उससे ज्यादा कभी नहीं.’

मैं राहुल की कहानी सुन ही रहा था कि इतने में आवाज आती है,

‘बच्चा-बच्चा भीम का,

रावण जी की टीम का’

‘भीम का तात्पर्य बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से है, लेकिन यह रावण कौन है.’

मेरे इस सवाल का जवाब पास में ही खड़े राजस्थान से आए कृपाल देते हैं.

‘रावण, हमारे आदि धर्म समाज के गुरु दर्शन ‘रत्न’ रावण जी हैं. वो लुधियाना से हैं और आदि धर्म समाज के प्रमुख हैं.’

बता दें, आदि धर्म समाज की वेबसाइट के अनुसार यह एक संगठन नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आदिवासी के बीच दबे-कुचले लोगों का आंदोलन है, जो कि भारत में आर्यों के आगमन से पहले भारत के मूलनिवासी थे. आदि धर्म समाज एक क्रांतिकारी आंदोलन है, यह 24 सितंबर 1994 को अस्तित्व में आया और अब यह उत्तर से दक्षिण, जम्मू और कश्मीर से आंध्र प्रदेश तक और राजस्थान से (पश्चिम में) पश्चिम बंगाल तक एक व्यापक नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है.

जंतर मंतर पर सोमवार को देशभर के सफाईकर्मी और सीवर कर्मचारी प्रदर्शन कर रहे थे. सफाईकर्मी और सीवर कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर बहुत ही स्पष्ट हैं. उनका मानना था कि जब सीमाओं और दंगा-ग्रस्त क्षेत्रों में सुरक्षा के लिए सेना जोखिम का काम करती है. मगर कहीं अगर बम की सूचना मिल जाए तो फिर विशेष रूप से बनाए गए बम निरोधक दस्ते को बुलाया जाता है. सीवर भी किसी साइलेंट बम से कम नहीं है. उसके लिए सीवर मैन को बुलाया जाता है. लेकिन जितना जोखिम भरा यह काम है, हमारी सरकारें सफाई कर्मचारियों के प्रति उतनी ही उदासीन हैं.

प्रदर्शन में आए वाल्मीकि समाज के अशोक टोंक बताते हैं, ‘हमारे साथ मूलभूत समस्याओं के अलावा भी कई दिक्कतें हैं, जिसका हल करना बहुत जरूरी है.’

जैसे?

‘हम कितना भी पढ़-लिख लें, हमें काम सफाईकर्मचारी वाला ही करना पड़ता है. जैसे अगर हमने ग्रैजुएशन कर लिया तो हमें उस पढ़ाई के आधार पर नौकरी नहीं मिलती. हमें काम तो वही सफाई का करना होता है.’

कार्यक्रम में आए लोगों के हाथ में पोस्टर थे.

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जंतर मंतर पर वाल्मीकि समाज के लोगों के हाथों में पोस्टर | शुभम सिंह

इसके अलावा

सीवर में होने वाली मृत्यु एक साजिश है, इसलिए मौजूदा अधिकारी पर हो हत्या का मामला दर्ज.’

धरना प्रदर्शन को समर्थन देने आए स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव से हमने पूछा ,’आपको नहीं लगता राजनीति से इतर  यह सामाजिक चेतना की लड़ाई है, जिसके लिए पहले देश के हर एक नागरिक को जागरूक करना होगा’?

योगेंद्र यादव ने कहा, ‘देखिए सीवर का जो मुद्दा है, वो सीमित संख्या के लोगों का मुद्दा है. यह सबसे घिनौना है, लेकिन सबसे कम संख्या के लोगों का है. उससे बड़ा है, मैला उठाने वाले लोगों का. उसके अलावा है जो सरकारी कर्मचारी काम करते हैं, उनकी वर्किंग कंडिशन का और उससे बड़ा है सफाई कर्मचारियों को आरक्षण के तहत एक विशेष अवसर देने का. पहले तीन के बारे में तो कानून है, लेकिन लागू नहीं होते हैं. लेकिन ऐसा क्यों होता है. ऐसा केवल राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण होता है.’

लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी के पीछे जिम्मेदार कौन है?

‘इसके पीछे, हमारे अंदर का मैल है. और यह किसी एक पार्टी का मामला नहीं है. तमाम पार्टियां, जब हमारे बच्चों से संबधित कुछ बातें होती हैं तो अचानक से वो एक्टिव हो जाती हैं. रातों रात सब कुछ बदल जाता है. लेकिन जब ‘उनके’ लोगों की बात आती है, जो हमारे नहीं है, ये लोग, वो लोग, यानी दलित, महादलित, (हमारे समाज के लोग उनके लिए इतने गंदे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो कि असंवैधानिक है,) जब उनकी बात आती है तो हमारा माइंडसेट बदल जाता है. इसलिए हमारे समाज से एक मन का मैल निकालने की जरूरत है.’

इसी बीच मंच से एक वक्ता बोलते हैं,’ मोदी जी, सफाईकर्मियों के पैर धोने का नाटक बंद करो. हमारी मांगें पूरी करो.’

बता दें, प्रधानमंत्री रविवार को प्रयागराज में थे. वहां उन्होंने कुंभ में डुबकी लगाई. इसके बाद उन्होंने स्वच्छ कुंभ आभार कार्यक्रम में भाग लिया. वहां प्रधानमंत्री मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोए और अंग वस्त्र देकर उनका सम्मान किया.

प्रधानमंत्री की इस हलचल पर जब हमने जंतर मंतर में मौजूद सीवर कर्मियों से पूछा तो, यूपी से आए शैलेश कहते हैं, ‘ यह मोदी जी का केवल षडयंत्र है. उन्होंने पांच साल खाली दिखावा किया है और झूठ बोला है. हमारे समाज की हालत सुधारने के लिए कुछ भी नहीं किया. पैर धोने से पुण्य नहीं मिलेगा. इसलिए पहले हमें इंसान समझो और हमें जीने का अधिकार दो.’

कार्यक्रम के केंद्र बिंदु में रहे दर्शन ‘रत्न’ रावण से जब हमने पूछा,

‘2019 के लोकसभा चुनाव में सफाईकर्मी किस पार्टी से उम्मीद करें?’

वो कहते हैं, ‘सभी (पार्टियां) हमारे वाल्मीकि समाज के 11 लाख वोटरों को बेवकूफ बनाने में लगी हैं. हम यही चाहते हैं कि वो हमारी मांगों को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करें और जो पार्टी हमारी मांगों को पूरा करने की इच्छा शक्ति दिखाएगी, हमारा समाज उसके साथ खड़ा होगा.’

तो आपकी मांगें क्या है?

सीवर साफ करने के लिए जहां तक संभव हो किसी भी आदमी को सीवर में न उतारा जाए. सीवर कर्मचारियों की न्यूनतम शैक्षणिक योगयता निर्धारित कर, उन्हें सीवर में पाए जाने वाले गैसों की जानकारी और उनके बचाव संबंधित प्रशिक्षण दिया जाए. सीवर मैन का सर्विस पीरियड सैनिक की तरह कम करके पेंशन के साथ अन्य विभागों में एक्स-सर्विस में की तर्ज पर आरक्षण होना चाहिए. इसके अलावा सीवर मैन की काम करते समय मृत्यु हो जाने पर परिवार को योग्यता अनुसार पक्की नौकरी और 50 लाख का मुआवजा दिया जाए.


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