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Tuesday, 11 June, 2024
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मणिपुर कमांडो का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा, ‘अनऑफिशियल’ कमांडो की निंदा और प्रशंसा क्यों हो रही है

मणिपुर कमांडो को 'मजबूत' करने के लिए कर्नल नेक्टर संजेनबम (सेवानिवृत्त) की नियुक्ति ने कुकी समूहों को नाराज कर दिया है, जो चाहते हैं कि आतंकवाद विरोधी यूनिट को 'खत्म' कर दिया जाए.

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नई दिल्ली: पिछले चार महीनों से हिंसा से जूझ रहे मणिपुर की कहानी में एक नया मोड़ आया, एक विशेष उग्रवाद विरोधी (सीआई) इकाई मणिपुर कमांडो को “मजबूत बनाने और निगरानी” करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (लड़ाकू) के रूप में कर्नल नेक्टर संजेनबम (सेवानिवृत्त) की नियुक्ति की गई. हालांकि, इस कदम की कुकी समूहों ने तीखी आलोचना की है, जिनका कहना है कि कमांडो इकाइयों को मजबूत करने के बजाय भंग कर दिया जाना चाहिए.

सरकारी सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि संजेबम, जो 2015 में म्यांमार सीमा पर विद्रोहियों के खिलाफ सेना के ऑपरेशन में एक प्रमुख व्यक्ति थे, को पिछले महीने बीरेन सिंह सरकार ने मुख्य रूप से “युद्ध में कर्मियों को प्रशिक्षित करने” के लिए पांच साल के कार्यकाल के लिए अनुबंधित किया था.

हालांकि, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि नियमों को दरकिनार कर यह नियुक्ति की गई है. “एक सेवानिवृत्त अधिकारी को एसएसपी का स्वीकृत पद कैसे दिया जा सकता है, जब इतने सारे कार्यालय पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं? यह नियुक्ति सरकार को ज्ञात कारणों से नियमों को दरकिनार करके की गई है.”

एक अन्य पुलिस सूत्र ने कहा कि कमांडो का चयन सीएम कार्यालय द्वारा किया जाता है, लेकिन अनौपचारिक रूप से. सूत्र ने कहा, यह “राज्य के लिए निजी सेना” की तरह है.

पुलिस सूत्रों ने कहा कि विशेष रूप से, ‘मणिपुर कमांडो’ शब्द आधिकारिक तौर पर राज्य की कानून प्रवर्तन संरचना में शामिल नहीं है. इसके बजाय, यह विशेष इकाइयों को संदर्भित करता है जो मणिपुर राइफल्स, स्थानीय पुलिस और भारतीय रिजर्व बटालियन से कुशल युवा कर्मियों की भर्ती करके बनाई जाती हैं.

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दूसरे अधिकारी ने कहा, “पांच से छह व्यक्तियों की छोटी टीमें बनाई गई हैं और उन्हें यूजी (अंडरग्राउंड आतंकवादी) के खिलाफ विशेष अभियानों के लिए घाटी में तैनात किया गया है. अत्याधुनिक हथियारों और बुलेटप्रूफ वाहनों से लैस, वे बिना किसी अधिकार क्षेत्र की बाधा के राज्य भर में काम करते हैं.”

कमांडो के समर्थक, जिनमें असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस के सदस्य भी शामिल हैं, उनकी “हाइली इफेक्टिव यूनिट” के रूप में सराहना करते हैं, जिसने राज्य से उग्रवाद को खत्म करने में प्रमुख भूमिका निभाई है. हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि कमांडो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने और फर्जी मुठभेड़ों में शामिल होने के लिए जाने जाते हैं.

मैतेई जातीय समूह और कुकी जनजातियों के बीच चल रहे संघर्ष में, मणिपुर कमांडो का उपयोग चुनिंदा अभियानों में किया जा रहा है, और राज्य में शांति बनाए रखने में मदद करने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा उन्हें श्रेय दिया गया है. लेकिन कुकी समूहों ने लगातार यह कहा है कि कुकीयों पर अत्याचार करते समय यूनिट ने केवल मैतेई पक्ष की रक्षा की हैं.

ऐसे समय में जब कर्नल संजेनबम की नियुक्ति ने एक बार फिर मणिपुर कमांडो को लेकर बहस शुरू कर दी है, दिप्रिंट इस विशेष यूनिट, इसकी संरचना, भूमिका और इससे जुड़े विवाद पर बारीकी से नज़र डाल रहा है.


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‘विशेष टीमें’

मणिपुर कमांडो की उत्पत्ति 1981-82 में हुई थी. सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि यह तब की बात है जब पुलिस की सशस्त्र शाखा, मणिपुर राइफल्स के युवा कर्मियों की भर्ती करके राज्य में कमांडो (सीडीओ) की एक प्लाटून की स्थापना की गई थी.

सूत्र ने कहा, “उन्हें हथियारों और रणनीति का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था. वे निहत्थे युद्ध, घात, घेरा और तलाशी में भी पारंगत थे.”

1994 में, मणिपुर पुलिस को 200 से अधिक कमांडो की मंजूरी दी गई थी, जिन्हें उग्रवाद विरोधी अभियानों को अंजाम देने के लिए इंफाल घाटी में तैनात किया गया था.

मणिपुर पुलिस के दूसरे सूत्र ने कहा, “80 के दशक में लाए गए कमांडो प्रभावी साबित हुए क्योंकि वे तेज़ थे, भाषा जानते थे, स्थानीय थे और इलाके से परिचित थे. उनकी सफलता दर किसी अन्य की तुलना में अधिक थी. ये विशेष टीमें थीं जिन्हें आवश्यकता के अनुसार किसी भी स्थिति में शामिल किया जा सकता था.”

पुलिस सूत्रों ने बताया कि आज, विभिन्न रैंकों के 2,500 से अधिक मणिपुर कमांडो पूरी घाटी के जिलों में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं.

“ये लड़के मजबूत, निपुण और बहुत तेज़ हैं, जो कि उग्रवाद विरोधी अभियानों में आवश्यक है. उन्हें अपने बुलेट-प्रूफ वाहनों के साथ राज्य भर में घूमने की भी छूट दी गई है. दूसरे पुलिस अधिकारी ने कहा, जहां भी उन्हें जानकारी मिलती है, वे जा सकते हैं और ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं.

उन्होंने आगे कहा, मणिपुर कमांडो को दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है- पुलिस कमांडो और विशेष कमांडो.

जबकि विशेष कमांडो एक महानिरीक्षक (आईजी)-रैंक अधिकारी को रिपोर्ट करते हैं, जो खुफिया जानकारी जुटाने से लेकर संचालन और प्रशिक्षण तक के कार्य करते हैं, पुलिस कमांडो अपने संबंधित क्षेत्रों में जिला पुलिस अधीक्षकों (डीएसपी) को रिपोर्ट करते हैं.

उन्होंने कहा, अधिकांश सीडीओ इंडिया रिजर्व बटालियन (आईआरबी) से लिए जाते हैं, जो एक राज्य बल है जिसे केंद्र सरकार से आंशिक धन मिलता है, लेकिन कई कमांडो मणिपुर राइफल्स और स्थानीय पुलिस से भी भर्ती किए जाते हैं.

उन्होंने बताया कि जहां भी राज्य की विशेष रुचि होती है, वहां इन कमांडो का उपयोग किया जाता है. आतंकवाद विरोधी अभियानों के अलावा, दस्तों का उपयोग म्यांमार सीमा पार से नशीली दवाओं और हथियारों की तस्करी में शामिल जबरन वसूली करने वालों और कार्टेल पर कार्रवाई के लिए भी किया जाता है.

सूत्र ने कहा, “चूंकि मणिपुर में शांति बहाल हो गई थी और विद्रोहियों को वापस म्यांमार भेज दिया गया था, या उन्हें मार दिया गया था या गिरफ्तार कर लिया गया था, इसलिए हमने अन्य प्रमुख अभियानों के लिए इन विशेष इकाइयों का उपयोग करना शुरू कर दिया और उन्होंने इनमें भी अच्छा प्रदर्शन किया.”

‘ब्रिटिश अवधारणा’

मणिपुर में उग्रवाद का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें नागा, मैतेई और कुकी जातीय समुदायों के सशस्त्र समूह अलगाव के लिए लड़ रहे हैं. भारतीय सेना को 1980 में उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए राज्य में तैनात किया गया था, लेकिन स्थिति को स्थिर करने में लगभग तीन दशक लग गए.

एक तीसरे पुलिस सूत्र ने कहा कि दस साल पहले, उग्रवाद के दौरान, मणिपुर कमांडो ने घाटी में विद्रोही बलों को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

सूत्र ने दावा किया, “बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और हत्याएं हुईं और विद्रोही इन टीमों से डर गए थे. ये ऑपरेशन वर्षों तक चले और उनकी वजह से चीजें बेहतर हुईं.”

दूसरे पुलिस अधिकारी ने बताया कि विशेष दस्ते बनाने का कारण यह सुनिश्चित करना था कि वे उग्रवाद विरोधी अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर सकें और दिन-प्रतिदिन के कानून और व्यवस्था कर्तव्यों से परेशान न हों.

अधिकारी ने कहा, “कुछ अच्छे लोगों को चुना जाता है और पांच से छह लोगों की टीमें बनाई और तैनात की जाती हैं.”

उन्होंने कहा कि कमांडो की एक छोटी, विशिष्ट इकाई बनाने की अवधारणा अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई थी.

उन्होंने कहा, “द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, अंग्रेजों ने गुप्त हमलों जैसे विशेष उद्देश्यों के लिए विशेष बलों को तैनात किया था जिन्हें कमांडो के रूप में जाना जाता था. ये अत्यधिक कुशल, प्रशिक्षित लोग थे जो लंबे समय तक मैदान पर रहते थे. ये विशेष सेनानियों का एक समूह था जिनका उपयोग न केवल एक इकाई में किया जाता था, बल्कि समय की आवश्यकता के आधार पर सभी इकाइयों और रेजिमेंटों में किया जाता था. यह विचार यहीं से उत्पन्न हुआ था.”


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कुछ भी आधिकारिक नहीं है?

तीसरे मणिपुर पुलिस अधिकारी ने बताया, कमांडो के दस्तों के गठन और विघटन की प्रक्रिया अत्यधिक लचीली है, “क्योंकि इसके बारे में कुछ भी आधिकारिक नहीं है”.

मणिपुर कमांडो के सदस्य अपनी मूल यूनिट्स से वेतन प्राप्त करते हैं और बिना किसी निश्चित कार्यकाल के इन विशेष टीमों में काम करते हैं. नए रंगरूटों को किसी भी समय लाया जा सकता है, और आवश्यकता के आधार पर टीम के सदस्यों को इच्छानुसार हटाया भी जा सकता है.

इसके अलावा, मणिपुर पुलिस पदानुक्रम के भीतर ऐसी विशिष्ट इकाइयों के लिए कोई आधिकारिक पदनाम नहीं है.

जैसा कि दिप्रिंट ने पहले बताया था, आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि मणिपुर के पुलिस बल की स्वीकृत संख्या 25,080 और वास्तविक संख्या 28,894 है. प्रति 108.98 नागरिकों पर एक पुलिस अधिकारी के साथ, राज्य पुलिस-नागरिक अनुपात में तीसरे स्थान पर है, यह केवल नागालैंड और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से पीछे है.

मणिपुर पुलिस की वेबसाइट के अनुसार, बल की शाखाओं में नागरिक पुलिस, सशस्त्र पुलिस (मणिपुर राइफल्स और भारतीय रिजर्व बटालियन), आपराधिक खुफिया विभाग (सीआईडी), यातायात पुलिस, नशीले पदार्थ, नियंत्रण कक्ष, मणिपुर पुलिस वायरलेस, मणिपुर पुलिस प्रशिक्षण स्कूल (एमपीटीएस), फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), केंद्रीय मोटर परिवहन कार्यशाला (सीएमटीडब्ल्यू), होम गार्ड और सीमा के मामले (एनएबी), डीजी शामिल हैं.

फिर भी, औपचारिक ‘मणिपुर कमांडो’ शीर्षक की अनुपस्थिति के बावजूद, इन इकाइयों को राज्य के भीतर सबसे शक्तिशाली पुलिस दस्तों के रूप में माना जाता है, जो अधिकार क्षेत्र की परवाह किए बिना कहीं भी ऑपरेशन करने के लिए अधिकृत हैं.

‘फर्जी मुठभेड़ और जबरन वसूली’

मणिपुर कमांडो का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसमें फर्जी मुठभेड़ों, यातना और जबरन वसूली के आरोप लगे हैं.

ऑल मणिपुर ट्राइबल यूनियन के महासचिव केल्विन नेहसियाल ने आरोप लगाया कि इन दस्तों को दी गई व्यापक शक्तियों का अक्सर दुरुपयोग किया गया, जिसमें वर्तमान जातीय संघर्ष का संदर्भ भी शामिल है.

उन्होंने दावा किया कि मणिपुर कमांडो कुकियों के खिलाफ भीड़ का नेतृत्व कर रहे हैं और उनके गांवों को जला रहे हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, “ये कमांडो वर्दीधारी उग्रवादी हैं जो राज्य के लिए सभी कुकियों को मारने और ख़त्म करने, उनके घरों को नष्ट करने के लिए काम कर रहे हैं. इस यूनिट को खत्म करने की जरूरत है, मजबूत करने की नहीं.”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि “उन्होंने पहले वीरता पुरस्कारों और पदोन्नति के लिए हत्याएं कीं और फिर उन्होंने मैतेई उग्रवादियों, अरामबाई टेंगोल और मैतेई लेपून (दो कट्टरपंथी मैतेई संगठन) का समर्थन करना शुरू कर दिया. उन्होंने हम कुकियों के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें युद्ध प्रशिक्षण दिया.”

आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, पहले उद्धृत दूसरे मणिपुर पुलिस अधिकारी ने कहा कि हर इकाई में “कुछ सड़े हुए सेब” होते ही हैं.

अधिकारी ने कहा, “चूंकि उनके पास ऐसी शक्तियां हैं, इसलिए उनमें से कुछ लोग उनका दुरुपयोग करते हैं. हम इस तथ्य को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि वे उग्रवाद से निपटने के लिए सबसे प्रभावी इकाई रहे हैं.”

2012 में, कथित न्यायेतर मुठभेड़ पीड़ितों के परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि मई 1979 और मई 2012 के बीच, असम राइफल्स, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और मणिपुर के लिए सामूहिक रूप से 1,528 मौतें दर्ज की गईं.

जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) के तहत आने वाले क्षेत्रों में भी सशस्त्र बल अत्यधिक बल का उपयोग नहीं कर सकते हैं, जो उन्हें व्यापक शक्तियां प्रदान करता है- जिसमें सुरक्षा के लिए ख़तरा मानने वाले किसी भी व्यक्ति को मारने के लिए गोली चलाना शामिल था. अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि पिछले 20 वर्षों में मणिपुर में कथित फर्जी मुठभेड़ों के 1,500 से अधिक मामलों की जांच की जानी चाहिए.

2013 में, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में कथित फर्जी मुठभेड़ों के छह “मामलों” की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की.

समिति ने पाया कि उन्होंने जिन मुठभेड़ों की जांच की उनमें से कोई भी सुरक्षा बलों द्वारा “आत्मरक्षा” में नहीं की गई थी. यह भी पाया गया कि मुठभेड़ “वास्तविक” नहीं थीं और पीड़ितों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले, साथ ही सेना मुख्यालय द्वारा जारी दिशानिर्देश निर्दिष्ट करते हैं कि एएफएसपीए के तहत मुठभेड़ केवल तभी स्वीकार्य है जब जीवन खतरे में हो या आत्मरक्षा में हो.

विशेष रूप से, हवलदार रैंक के पुलिसकर्मी एन नुंगशीबाबू सिंह और तीन अन्य को 2010 की न्यायिक जांच में फर्जी मुठभेड़ की साजिश रचने का दोषी पाया गया था. हालांकि, सिंह को 2013 में वीरता के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक मिला था.

मणिपुर पुलिस के तीसरे सूत्र ने कहा कि मणिपुर कमांडो के खिलाफ आरोपों के बीच, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ने इस साल की शुरुआत में एक आदेश पारित किया था जिसमें कहा गया था कि यूनिट को सभी ऑपरेशनों में असम राइफल्स द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी. उन्होंने कहा, यह कुछ जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए था.

सूत्र ने आगे स्पष्ट किया कि कमांडो को मुख्य रूप से घाटी के जिलों में तैनात किया गया था क्योंकि पहाड़ियों में उनकी तैनाती से संबंधित आपत्तियां थीं, जहां कुकी समुदाय केंद्रित है.

सूत्र ने कहा, “मोरेह को छोड़कर, जो म्यांमार की सीमा पर पड़ता है, किसी भी पहाड़ी जिले में कमांडो इकाइयों को तैनात नहीं किया गया है. उनके अभियानों पर नज़र रखी जा रही है और स्पष्ट आदेश थे कि असम राइफल्स उनकी सहायता करेगी.”

हालांकि, सूत्र ने स्वीकार किया कि “कई मामलों में, इसका पालन नहीं किया गया”.

(संपादन: अलमिना खातून)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़नें यहां क्लिक करें)


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