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Monday, 27 May, 2024
होमदेशक्या अदालतें अधिक मृत्युदंड देने लगी हैं? 2022 में 539 को फांसी की सजा मिली, 17 सालों में सबसे अधिक

क्या अदालतें अधिक मृत्युदंड देने लगी हैं? 2022 में 539 को फांसी की सजा मिली, 17 सालों में सबसे अधिक

फैसलों पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि निचली अदालतें अक्सर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और नजीरों को ध्यान में रखे बिना ही मौत की सजा सुना देती हैं, और यह भी कि ‘दुलर्भतम’ श्रेणी के मानदंड को सही ढंग से नहीं समझा जा रहा है.

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नई दिल्ली: वर्ष 2000 में देश में कुल 165 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जो किसी एक साल में सबसे ज्यादा संख्या थी. अब, 2022 में मृत्युदंड सुनाए जाने में भारी उछाल दिखा है. इस साल मौत की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या 539 रही, जो 17 वर्षों में सबसे अधिक है.

भारत में कई तरह के अपराधों में मौत की सजा का प्रावधान है, और इनमें उम्रकैद देना भी एक विकल्प होता है. इस बारे में कोई फैसला करना निचली कोर्ट के न्यायाधीशों पर निर्भर करता है. सुप्रीम कोर्ट ने 1989 में बचन सिंह मामले में सुनाए अपने ऐतिहासिक फैसले में मौत की सजा की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन साथ ही जोड़ा था कि ऐसा केवल ‘दुर्लभतम’ मामलों में ही किया जा सकता है.

बहरहाल, आखिर ‘दुर्लभतम’ श्रेणी का मतलब क्या होता है और क्या निचली अदालतों के न्यायाधीश केवल ऐसे ही मामलों में मौत की सजा सुना रहे हैं?

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू) दिल्ली के क्रिमिनल जस्टिस प्रोग्राम प्रोजेक्ट 39ए के तहत 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है, 2000 से 2015 के बीच निचली अदालतों की तरफ से सुनाई गई मौत की सजाओं में से केवल पांच प्रतिशत पर अपीली न्यायालयों ने मुहर लगाई और लगभग 30 फीसदी मामलों में अपील के बाद दोषियों को बरी कर दिया गया.

मृत्युदंड से जुड़े निचली अदालतों के फैसलों और संबंधित आंकड़ों पर एक नजर डालने से पता चलता है कि अक्सर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और नजीरों को ध्यान में रखे बिना ही मौत की सजा सुना दी जाती है.

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इससे यह भी पता चलता है कि बचन सिंह फैसले में निर्धारित ढांचे को सही ढंग से लागू किए बिना और परिस्थितियों या सुधार की संभावना पर विचार किए बिना ही मौत की सजा दी जा रही हैय

ये फैसले दर्शाते हैं कि ‘दुर्लभतम’ श्रेणी का अर्थ ठीक से समझा नहीं गया है, जो कि मृत्युदंड सुनाए जाने का एकमात्र ठोस आधार है.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अन्य बातों के अलावा, यह भी हो सकता है कि या तो निचली अदालतें इस बात से अनभिज्ञ हैं कि मृत्युदंड की सजा पर कानून आखिर क्या कहता है, या फिर जागरूक होने के बावजूद इसकी अनदेखी करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में मृत्युदंड को ही ‘न्याय’ का पर्याय माना जाने लगा है.

क्या होती है ‘दुर्लभतम’ श्रेणी

बचन सिंह मामले में शीर्ष कोर्ट ने ‘दुर्लभतम’ सिद्धांत निर्धारित किया. हालांकि, 213 पैरा वाले फैसले में केवल एक बार इस वाक्यांश का उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया कि मौत की सजा केवल ‘दुर्लभतम मामलों में ही दी जा सकती है, जब अन्य सभी विकल्प निर्विवाद रूप से खत्म हो चुके हों.’

कुल मिलाकर, बचन सिंह मामले में व्यापक आधार निर्धारित करते हुए कोर्ट ने इस पर जोर दिया कि अदालतें फैसला सुनाते समय अपराध की प्रकृति और अपराधी की परिस्थिति दोनों का गंभीरता से आकलन करें. इसके साथ सुधार की संभावना और बतौर विकल्प आजीवन कारावास की उपयुक्तता पर भी विचार किया जाए.

हालांकि, इसमें स्पष्ट तौर पर यह पता नहीं चलता है कि कौन-सा मामला ‘दुर्लभतम’ की श्रेणी में आएगा.

बाद में कुछ फैसलों में इसे आम लोगों की राय से जोड़ा गया या ‘सबके विवेक’ को झकझोरकर रख देने वाला माना गया, जबकि अन्य ने कहा कि ‘दुर्लभतम नीति…अनिवार्य रूप से जनता की राय के अनुरूप नहीं हो सकती.’

हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि इस पर कोई आमराय नहीं है कि मामला कब ‘दुर्लभतम’ श्रेणी में आएगा, इसलिए अदालतें इस प्रक्रिया में अपने विवेक के आधार फैसले सुनाती हैं.

निचली अदालतों ने किस आधार पर मृत्युदंड सुनाया, इस बारे में 2018 से 2022 के बीच 306 मामलों में सुनाई गई मौत की सजा पर एनएलयू दिल्ली के प्रोजेक्ट 39ए के तहत एक स्टडी रिपोर्ट से पता चलता है कि करीब 10 फीसदी फैसलों में यह उल्लेख ही नहीं किया गया कि मामला ‘दुर्लभतम’ श्रेणी में क्यों आता है.

इनमें से लगभग 70 प्रतिशत फैसलों ने केवल अपराध से संबंधित विकट परिस्थितियों के आधार पर मामले को ‘दुर्लभतम’ माना.

कई निचली अदालतें इसी तरह से मौत की सजा सुनाती रही हैं.

उदाहरण के तौर पर, इस साल जनवरी में लखनऊ के एक विशेष न्यायाधीश ने आईआईटी बॉम्बे से ग्रेजुएट 31 वर्षीय अहमद मुर्तजा अब्बासी को पिछले साल यूपी के गोरखपुर जिले स्थित गोरखनाथ मंदिर में पुलिसकर्मियों पर हमले के लिए मौत की सजा सुनाई.

कोर्ट ने अपने 15 पन्नों के आदेश में बचन सिंह मामले में फैसले का हवाला दिया और सुधार की संभावना और गंभीर परिस्थितियों के विश्लेषण की जरूरत पर बात की लेकिन इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा कि यह मामला ‘दुर्लभतम’ श्रेणी की कसौटी पर कैसे खरा उतरता है.

पिछले साल नवंबर में पारित एक अन्य फैसले में, उत्तर प्रदेश में यौन अपराधों से बच्चों के विशेष संरक्षण (पोक्सो) अदालत ने दो दोषियों हलीम और रिजवान को एक नाबालिग के अपहरण और गैंगरेप के लिए मौत की सजा सुनाई थी.

यद्यपि, 10 पन्नों के अपने आदेश में अदालत ने दो बार ‘दुर्लभतम’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए खुद ही यह स्पष्ट किया कि हत्या के मामले में मौत की सजा तब तक नहीं दी जा सकती जब तक कि अपराध ‘निर्मम या जघन्य तरीके’ से न किया गया हो.

हालांकि, इससे परे, अदालत ने यह उल्लेख नहीं किया कि यह मामला ‘दुर्लभतम’ श्रेणी में कैसे आता है. इसके बजाय, फैसले मेंएक महिला के शरीर की तुलना ‘मंदिर’ से की गई है, और इसे विडंबना ही करार दिया गया कि ऐसी घटना ‘भारत जैसे देश में हुई जो शक्ति के लिए दुर्गा और ज्ञान के लिए सरस्वती जैसी देवियों की पूजा करती है.’


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‘मौत की सजा मतलब न्याय’

ऐसा लगता है कि निचली अदालतें अक्सर ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन कर मौत की सजा सुनाती रहती हैं.

एनएलयू दिल्ली में लॉ के प्रोफेसर और प्रोजेक्ट 39ए के कार्यकारी निदेशक अनूप सुरेंद्रनाथ का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और जो कुछ निचली अदालतें कर रही हैं, उसमें ‘हमेशा एक बड़ा अंतर दिखाई देता है.’

उनके मुताबिक, ट्रायल कोर्ट की तरफे से दोषियों को मौत की सजा सुनाने के फैसले ‘त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया अपनाने, गलत कानून लागू किए जाने और मनमानी’ से भरे हैं. हालांकि, उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि इसके लिए दिया जाना वाला कोई भी स्पष्टीकरण ‘जिला अदालतों की अच्छी छवि पेश नहीं करता है.’

सुरेंद्रनाथ ने कहा, ‘या तो वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि मृत्युदंड की सजा देने के मामले में कानून किस तरह काम करता है या फिर वे जागरूक होने के बावजूद इसकी अनदेखा करती हैं क्योंकि इसके लिए कुछ ठोस प्रक्रियाएं अपनाने की जरूरत होती है.’

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी. लोकुर का मानना है कि ‘अपराधों की जघन्य और क्रूरतम प्रकृति, और मीडिया में उनकी रिपोर्टिंग दोनों ही चीजें पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ी नजर आती है.’ वह कहते हैं, इसका कारण ‘जैसा स्वाभाविक है, पीड़ित परिवार की तीखी प्रतिक्रिया के अलावा समाज की तरफ से भी कड़ी प्रतिक्रिया जताया जाना है.’

उन्होंने कहा, ‘पहले केवल न्याय की मांग की जाती थी. लेकिन अब मृत्युदंड की गुहार लगाई जाती है, और इसे ही असल न्याय माना जाता है.’ उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि, हालांकि उनके पास इसके लिए कोई सबूत नहीं है, उनका मानना है कि ‘सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों की अवहेलना कर मौत की सजा सुनाने के लिए ट्रायल जजों पर शायद कोई अचेतन दबाव होता है.’

सुरेंद्रनाथ को लगता है कि कानून में बदलाव करने के अलावा और भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

उन्होंने आगे कहा, ‘न्यायाधीशों को कानूनी जरूरतों के बारे में जागरूक करने के लिए न्यायिक अकादमियां अपने प्रशिक्षण कैसे डिजाइन करें? यह देखते हुए कि कानून समाज में अंतर्निहित है, क्या न्यायिक अकादमियों की तरफ से न्यायाधीशों को निर्णय लेने से अपने पूर्वाग्रहों को दूर रखने के लिए संवेदनशील बनाने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाते हैं? क्या ट्रायल कोर्ट औपचारिक कानून की मांगों को पूरा करने के लिए संसाधनों से सुसज्जित हैं? ये कुछ ऐसे कई सवाल हैं, जिन्हें हमें पूछने की जरूरत है.’

‘सामूहिक राय को कैसे तय करते हैं न्यायाधीश?’

उम्रकैद की जगह मौत की सजा सुनाने का फैसला करते समय अदालतें क्या कारण बता रही हैं?

पिछले साल अक्टूबर में प्रकाशित प्रोजेक्ट 39ए की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच 282 मामलों में मौत की सजा दी गई, जिनमें से 77 प्रतिशत से अधिक फैसलों में ‘समाज की राय’ या ‘समाज की तरफ से न्याय की गुहार’ का उल्लेख किया गया.

यह इस तथ्य के बावजूद है कि बचन सिंह फैसले में जोर देकर कहा गया था कि न्यायाधीशों को ‘जनमत की आवाज या प्रवक्ता’ नहीं बनना चाहिए.

हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसे फैसले—जिनमें धनंजय चटर्जी को मौत की सजा को बरकरार रखना शामिल है, जिसे अगस्त 2004 में फांसी दी गई थी—सुनाए जिसमें ‘सामूहिक विवेक’ या ‘समाज की तरफ से न्याय की गुहार’ को वैध औचित्य माना गया है.

गोरखनाथ मंदिर हमले के मामले में लखनऊ कोर्ट के फैसले में धनंजय चटर्जी मामले का भी जिक्र किया गया है. ट्रायल कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में कानून को कुछ इस तरह निर्धारित किया कि ‘अदालतों को अपराध के अनुपात में उचित सजा देनी चाहिए ताकि अदालती फैसले को देखकर लोग अपराध करने से डरें.’

भारत में मौत की सजा सुनाए जाने में ‘सामूहिक विवेक’ एक फैक्टर होने के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए जस्टिस लोकुर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ‘सामूहिक विवेक’ जैसा कुछ होता है.

उन्होंने कहा, ‘यह कुछ और नहीं बल्कि एक पत्रकारीय मुहावरा है. कोई न्यायाधीश कैसे तय कर सकता है कि सामूहिक विवेक क्या है और वह क्या चाहता है.’

सुरेंद्रनाथ ने यह भी बताया कि निचली अदालतें मौत की सजा सुनाते समय पूरा ध्यान ‘अपराध की प्रकृति’ पर केंद्रित रखती हैं.

उन्होंने कहा, ‘कोई भी आम व्यक्ति यह नजरिया अपना सकता है कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए सजा सुनाई जानी चाहिए. लेकिन कानून के तहत ऐसा करना उचित नहीं है. अंतत: हमारे न्यायाधीशों को यह महसूस करना चाहिए कि उनका कर्तव्य कानून को प्रभावी बनाना है न कि सामूहिक विवेक या जनमत को तरजीह देना.’

उकसावे और सुधार की संभावना वाली परिस्थितियां

सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि उचित सजा निर्धारित करने से पहले न्यायाधीशों को इसका गंभीरता से आकलन करना चाहिए कि अपराध और अपराधी दोनों की प्रकृति क्या है और परिस्थितियों को देखते हुए उसमें सुधार की गुंजाइश कितनी है.

बचाव पक्ष के वकील, राज्य और न्यायाधीश सभी का यह कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि सुधार की संभावनाएं बताने वाली हर सामग्री अदालत के समक्ष उपलब्ध हो.

इसके बाद निचली अदालतों को अन्य बातों के अलावा अभियुक्तों की पृष्ठभूमि, उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियां, मानसिक अवस्था और उम्र आदि पता लगाने की आवश्यकता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्या मामला मौत की सजा के लिए उपयुक्त है और यह भी निर्धारित हो सके कि क्या ‘निर्विवाद रूप से’ आजीवन कारावास एक विकल्प हो सकता है.

पिछले साल मई में सुनाए एक अहम फैसले (मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य) में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के प्रावधान में सुधार की अहमियत को रेखांकित किया, और सुधार पर मूल्यांकन के दौरान अदालत की सहायता के लिए अपराधी के जेल आचरण, मनोवैज्ञानिक और मनोरोग मूल्यांकन रिपोर्ट को अनिवार्य कर दिया. इसके लिए कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा संबंधित सामग्री के संग्रह के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए.

हालांकि, प्रोजेक्ट 39ए रिपोर्ट के अनुसार, 2018 से 2020 तक सुनाए गए कुल 306 मृत्युदंड में से 66 प्रतिशत से अधिक मामलों में सजा इस पर विचार किए बिना ही सुनाई गई कि क्या परिस्थितियों को देखते हुए सजा को घटाया जा सकता है. कुल फैसलों में से 40 फीसदी में किसी भी ऐसी परिस्थिति का जिक्र तक नहीं था जो सजा कम होने का आधार बन सके.

इसके विपरीत, कुल 274 (90 प्रतिशत फैसलों में) मामलों में अपराध की क्रूरता को मौत की सजा सुनाने के लिए एक गंभीर परिस्थिति के तौर पर उद्धृत किया गया. रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि 40 प्रतिशत से अधिक फैसलों में सजा सुनाने के पीछे अपने तर्क का उल्लेख तक नहीं किया गया.

यह प्रवृत्ति हालिया फैसलों में भी नजर आई है.

ऊपर उद्धृत उत्तर प्रदेश पोक्सो कोर्ट की तरफ से सुनाए गए मौत की सजा संबंधी आदेश में कोर्ट ने पूछा था कि दो आरोपियों को मौत की सजा क्यों दी जानी चाहिए. इसके जवाब में उसने अपराध और अपराधी से संबंधित विभिन्न परिस्थितियों के विश्लेषण पर ध्यान देने के बजाये इन दलीलों पर ज्यादा दिया कि लड़की के शरीर पर किस कदर चोटें लगी थीं.

सजा संबंधी अपने 10 पन्नों के आदेश में चार पंक्तियां हैं जो दोनों अभियुक्तों के संदर्भ में परिस्थितियों का जिक्र करती हैं.


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2 दिन से भी कम समय में मौत की सजा सुनाई

सितंबर 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा सुनाए जाने में कम अंतराल को स्वीकार किया और पांच जजों की बेंच को मृत्युदंड पाए दोषियों की सजा घटाने की संभावनाओं पर सुनवाई करते समय अदालतों के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को कहा.

बेंच जिस एक और मुद्दे पर विचार करने वाली है, वो यह है कि सजा सुनाए जाने में कितना अंतराल होना चाहिए. यानी दोषी करार देने के बाद सजा पर सुनवाई से पहले प्रासंगिक सामग्री पेश करने के लिए कितना समय दिया जाना चाहिए. अपने आदेश में, शीर्ष अदालत ने स्वीकार किया कि इस पर कोई स्पष्टता नहीं है कि यह सामग्री जुटाने और सुनवाई से पहले वास्तव में कितना समय देने की जरूरत है.

सुरेंद्रनाथ ने समझाया कि अपराध से पहले अपराधी के जीवन इतिहास और जेल में बिताए समय के बारे में जानकारी न्यायाधीशों के लिए जीवन और मौत की सजा के बीच अपना निर्णय लेने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

हालांकि, उन्होंने बताया कि यह जानकारी केस रिकॉर्ड में मौजूद नहीं होगी, और इसे एक साथ रखने के लिए समय और कौशल की आवश्यकता होती है जिसे एक वकील ही अंजाम दे सकता है. उन्होंने कहा, ‘मौत की सजा के मामले में बचाव पक्ष को यह जानकारी इकट्ठा करने के लिए मनोविज्ञान, सामाजिक कार्य और समाजशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञानों में प्रशिक्षित कर्मियों की विशेषज्ञता की भी आवश्यकता होती है.’

प्रोजेक्ट 39ए की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 और 2020 के बीच दी गई 304 मौत की सजाओं में से 166 मामलों (54.6 फीसदी) में सजा की सुनवाई दो दिनों से भी कम समय में हुई. कम से कम 108 मृत्युदंड (35.53 प्रतिशत) दो से सात दिनों के भीतर सजा की सुनवाई का परिणाम थे, और 30 (9.87 प्रतिशत) मामलों में को एक सप्ताह से अधिक समय बाद सजा सुनाई गई.

गोरखनाथ मंदिर हमले के मामले में अब्बासी को इसी साल 27 जनवरी को दोषी ठहराया गया था और दो दिन बाद 30 जनवरी को सजा सुनाई गई.

सुरेंद्रनाथ ने दिप्रिंट को बताया कि सजा सुनाए जाने से पहले बचाव पक्ष को जिस तरह की पड़ताल करनी होती है, उसे देखते हुए ‘यह समझना मुश्किल नहीं है कि सजा की तारीख और सजा की सुनवाई के बीच पर्याप्त समय क्यों जरूरी है.’

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सूचना की गुणवत्ता यह सुनिश्चित करने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है कि न्यायाधीश उस व्यक्ति को सही मायने में समझने में सक्षम हो पाएं, जिसे वे सजा सुनाने वाले हैं.

जस्टिस लोकुर को लगता है कि इसके अतिरिक्त, दोषी करार देने और सजा सुनाने के समय के बीच ‘काफी अंतर’ होना चाहिए, ‘ताकि इसे लेकर भावनात्मक उबाल शांत हो सके और पीड़ित परिवार और अभियुक्तों के अधिकारों को सही मायने में संरक्षित किया जा सके.’

नए सिरे से विचार

दिप्रिंट से बातचीत में सुरेंद्रनाथ ने कहा कि बचन सिंह फ्रेमवर्क की परिकल्पना हत्या के मामलों के साथ की गई थी, क्योंकि उस समय मौत की सजा का प्रावधान केवल इसी तरह के अपराधों में था. हालांकि, उसके बाद से अन्य अपराधों पर भी यह प्रावधान लागू कर दिया गया है, जिसमें यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम, 2012 भी शामिल है.

इसलिए उनका मानना है कि न केवल दुर्लभतम श्रेणी निर्धारित करने को लेकर विभिन्न तत्वों को और बेहतर ढंग से स्पष्ट करने की जरूरत है बल्कि इस पर भी गंभीरता से पुनर्विचार आवश्यक है कि हत्या से इतर किन मामलों में मानवीय आधार पर मृत्युदंड को बहाल रखा जा सकता है.

अब जबकि सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ मृत्युदंड पाए दोषियों की सजा घटाने की संभावना पर विचार करते समय अदालतों की तरफ से अपनाए जाने वाले दिशानिर्देश तैयार करने पर विचार कर रही है, सुरेंद्रनाथ को उम्मीद है कि इससे कुछ स्पष्टता अवश्य आएगी.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि ‘स्पष्ट तौर पर यह कहा जाना चाहिए कि अदालत किसी व्यक्ति के जीवन का इतिहास और जेल के जीवन को ध्यान में रखे बिना मौत की सजा नहीं दे सकती.’

उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके लिए जरूरी है कि बेंच सजा सुनाने में गुणवत्तापूर्ण कानूनी प्रतिनिधित्व सहित कई अहम फैक्टर ध्यान में रखे; सजा और सजा की सुनवाई के बीच पर्याप्त समय का अंतर हो; संभावित परिस्थितियों पर विचार करते हुए अभियोजन पक्ष के कर्तव्यों और न्यायिक मानकों का पूरी तरह पालन हो, अपराधी में सुधार की संभावनाओं को देखते हुए आजीवन कारावास के विकल्प पर विचार किया जाए.

सुरेंद्रनाथ ने कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि पीठ इन दिशानिर्देशों को तैयार करते समय उन सभी अपराधों पर भी विचार करे जिसमें अब मृत्युदंड दिया जा सकता है.

जस्टिस लोकुर को लगता है कि संविधान पीठ को पूरे मामले पर विस्तार से विचार करना चाहिए और दिशा-निर्देश तय करने चाहिए. वह कहते हैं, ‘हालांकि, इस तरह के मामलों ‘दुर्लभतम’ सिद्धांत पर अमल आदि को लेकर हमेशा मतभेद बना रहेगा, लेकिन निश्चित तौर पर कुछ स्पष्टता तो आएगी.’

उन्होंने कहा, ‘अंतत:, सर्वोच्च न्यायालय को यह तय करना पड़ सकता है कि क्या मृत्युदंड को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और यदि नहीं, तो किस श्रेणी के मामलों के लिए इसे बरकरार रखा जाना चाहिए.’

(अनुवाद: रावी द्विवेदी | संपादन: ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़नें के लिए यहां क्लिक करें)


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