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Thursday, 29 January, 2026
होमदेश'अरावली में खनन सिर्फ 0.19% क्षेत्र में होगा, नियम अब और सख्त': पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव

‘अरावली में खनन सिर्फ 0.19% क्षेत्र में होगा, नियम अब और सख्त’: पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आलोचनाओं को खारिज किया और कहा कि अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियां बेहद सीमित इलाके में ही अनुमति होंगी.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को स्वीकार करने और टिकाऊ खनन से जुड़ी सिफारिशों को मंजूरी देने के बाद सरकार की व्यापक आलोचना हुई है. विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार की खनन माफिया से मिलीभगत है.

हालांकि, एक इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आलोचनाओं को खारिज किया और कहा कि अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियां बेहद सीमित इलाके में ही अनुमति होंगी. उन्होंने कहा कि यह पर्वत श्रृंखला मजबूत पारिस्थितिक सुरक्षा के तहत बनी रहेगी.

उन्होंने कहा, “अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधि केवल 0.19 प्रतिशत इलाके में ही संभव होगी, जो एक प्रतिशत से भी कम है, और वहां भी कोई नई खदान नहीं खोली गई है. इस प्रक्रिया को और सख्त किया गया है. अरावली क्षेत्र की मुख्य समस्या अवैध खनन है. अवैध खनन को रोकने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट ने यह परिभाषा दी है और इस पर अभी भी समीक्षा लंबित है. इस व्यापक परिभाषा और सख्त प्रावधानों के तहत 90 प्रतिशत क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित है.”

भूपेंद्र यादव ने यह भी कहा कि शीर्ष अदालत ने सरकार के ग्रीन अरावली आंदोलन की सराहना की है.

उन्होंने कहा, “अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है. हम पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं कि ये पर्वतमालाएं हरी बनी रहें. इसके साथ ही संरक्षण के मानक भी तय किए जाने चाहिए. हमने ग्रीन अरावली वॉल आंदोलन भी शुरू किया. मुद्दा यह है कि अरावली क्षेत्र की परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो बातें कहीं, जिन्हें लोग छिपा रहे हैं. पहली, पहले ही पैराग्राफ में पर्यावरण मंत्रालय के ग्रीन अरावली वॉल आंदोलन की सराहना की गई. दूसरी, यह पूछा गया कि अरावली पहाड़ियां और अरावली रेंज आखिर हैं क्या. दुनिया भर के भूवैज्ञानिक, जो भूविज्ञान में काम करते हैं, रिचर्ड मर्फी की मानक परिभाषा को मानते हैं कि 100 मीटर ऊंची पहाड़ी को पर्वत माना जाता है. केवल ऊंचाई ही इसे पर्वत नहीं बनाती. जमीन के स्तर से लेकर पूरे 100 मीटर क्षेत्र को संरक्षित माना जाता है, जिससे 90 प्रतिशत क्षेत्र सुरक्षित रहता है.”

उन्होंने अस्पष्टता के आरोपों को भी खारिज करते हुए कहा, “कोई ग्रे एरिया नहीं है. अगर कोई ग्रे एरिया है तो मामला अदालत में है, वहां जाकर रखें. आज भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. अगर ऐसा है तो बताइए, आप लोगों में भ्रम क्यों फैला रहे हैं.”

मंत्री ने स्पष्ट किया कि किसी भी नई खनन लीज के लिए वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा और पहले की विसंगतियों को दूर कर दिया गया है.

उन्होंने कहा, “नई खनन के लिए सुप्रीम कोर्ट की योजना यह है कि पहले एक वैज्ञानिक योजना बनेगी, इसमें आईसीएफआरई को शामिल किया जाएगा. उसके बाद ही इस पर विचार होगा. लेकिन मैं साफ कह रहा हूं कि यह 0.19 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र में संभव नहीं होगा. खनन पहले से हो रहा था और उसी आधार पर अनुमति दी जा रही थी. लेकिन वहां विसंगतियां और अवैध खनन हो रहा था. प्रतिबंधित और निषिद्ध क्षेत्रों को साफ तौर पर परिभाषित करके सख्त पालन सुनिश्चित किया जा सकता है.”

उन्होंने आगे कहा, “अब तक अरावली क्षेत्र में स्पष्ट परिभाषा न होने के कारण खनन परमिट में अनियमितताएं थीं. 58 प्रतिशत क्षेत्र कृषि भूमि है. इसके बाद हमारे शहर, गांव और बस्तियां हैं. इसके अलावा करीब 20 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र है. वहां कुछ भी नहीं किया जा सकता.”

मंत्री ने पूरे पारिस्थितिक तंत्र की देखभाल के जरिए अरावली पर्वतमाला की रक्षा के लिए सरकार की पहल पर जोर दिया.

उन्होंने कहा, “कोई विकल्प नहीं है, इसलिए अरावली पर्वतमाला का संरक्षण जरूरी है. सिर्फ चारों ओर पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है. इस पारिस्थितिकी में घास, झाड़ियां और औषधीय पौधे शामिल हैं, जो एक पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं. यही कारण है कि हमारे मंत्रालय ने इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस बनाया. बिग कैट अलायंस का मतलब सिर्फ बाघों का संरक्षण नहीं है. बाघ तभी जीवित रह सकता है जब उसका शिकार और उसे सहारा देने वाला पूरा पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हो. हिरण और अन्य जानवर तभी जीवित रहेंगे जब उनके लिए घास और अन्य वनस्पति होगी. इसी वजह से हमने 29 से ज्यादा नर्सरी स्थापित की हैं और हर जिले में इन्हें बढ़ाने की योजना है. हमने पूरी अरावली पर्वतमाला में, हर जिले में, स्थानीय वनस्पति का अध्ययन किया है. इस पारिस्थितिकी में छोटी घास से लेकर बड़े पेड़ तक सब शामिल हैं. इसलिए मैं सिर्फ पेड़ों की बात नहीं करता, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की बात करता हूं.”

सरकार का साफ कहना है कि अरावली की पारिस्थितिकी पर कोई तात्कालिक खतरा नहीं है. लगातार वनीकरण, इको-सेंसिटिव ज़ोन की अधिसूचनाएं और खनन व शहरी गतिविधियों की सख्त निगरानी यह सुनिश्चित करती है कि अरावली देश की प्राकृतिक विरासत और पारिस्थितिक सुरक्षा कवच बनी रहे.


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