नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार को उच्च न्यायालय को बताया कि इस महीने की शुरुआत में गिरफ्तार किए गए कुछ छात्रों को हिरासत में रखकर प्रताड़ित किए जाने के आरोप मनगढ़ंत हैं, ताकि माओवादी संबंधी उनकी गतिविधियों की जांच को भटकाया जा सके।
ये दलीलें न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की पीठ के सामने पेश की गईं, जो लक्षिता राजौरा की छोटी बहन की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
लक्षिता ने आरोप लगाया था कि उन्हें और अन्य छात्रों को अगवा करके न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में एक अज्ञात इमारत में ले जाया गया।
पुलिस ने एक हलफनामे में कहा, ‘वर्तमान रिट याचिका और लक्षिता राजौरा उर्फ बादल द्वारा दाखिल हलफ़नामे में किए गए दावे झूठे और मनगढ़ंत हैं। ये आरोप बुरी मंशा से लगाए गए हैं, ताकि गंभीर अपराधों से संबंधित कानूनी जांच में बाधा डाली जा सके और जांच अधिकारी को बदनाम किया जा सके।”
हलफनामे में कहा गया है कि आंदोलनकारियों को जुलाई 2025 में दर्ज प्राथमिकी के संबंध में केवल ‘कानूनी पूछताछ’ के लिए बुलाया गया था।
पुलिस ने दावा किया कि ये कार्यकर्ता भगत सिंह छात्र एकता मंच (बीएससीईएम) जैसे संगठनों से जुड़े हैं, जिसका संबंध देशविरोधी तत्वों और नक्सलियों से है।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 अप्रैल की तारीख तय की।
याचिका में दावा किया गया है कि 12 से 14 मार्च के बीच राष्ट्रीय राजधानी के अलग-अलग कॉलेजों के छह छात्रों समेत कुल 10 लोगों, दो श्रम अधिकार कार्यकर्ताओं और दो विस्थापन-विरोधी कार्यकर्ताओं को दिल्ली पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया।
इसके बाद, पुलिस ने उनकी कथित हिरासत के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
कुछ छात्रों के खिलाफ पिछले साल बढ़ते वायु प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन के दौरान इंडिया गेट पर माओवाद समर्थक नारे लगाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।
भाषा जोहेब दिलीप
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