Sunday, 16 January, 2022
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‘बर्फीले तूफान’ से आई होगी उत्तराखंड में अचानक से बाढ़- हिमनद विज्ञानी डीपी डोभाल

देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के हिमनद विज्ञानी डोभाल का कहना है कि जमा हुए बर्फ से आए बर्फीले तूफान ने, उस ढीले मलबे को हिला दिया होगा जिसने एक विशाल झील के पानी को रोका हुआ था.

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नई दिल्ली: चमोली ज़िले की गहरी घाटी में भारी हिमपात से बर्फीला तूफान आ गया होगा, जिसने संभवत: उस ढीले मलबे को हिला दिया होगा, जो विशाल मात्रा में पानी को रोके हुए था, जो तेज़ी से आगे बढ़ता हुआ अपने रास्ते में तबाही फैलाता चला गया.

ये उन सिद्धांतों में से एक है, जिसे देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के एक प्रसिद्ध हिमनद विज्ञानी, डीपी डोभाल ने पेश किया है, जिसमें उन्होंने समझाने की कोशिश की है कि 7 फरवरी को उत्तराखंड में आकस्मिक बाढ़ कैसे आई.

डोभाल कई दशकों से, हिमालय के ग्लेशियर्स में आ रहे बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं. वो उस कमेटी में भी थे जिसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने 2013 की उत्तराखंड बाढ़ पर, पनबिजली प्लांट्स के असर का अध्ययन करने के लिए गठित किया था.

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव, आशुतोष शर्मा ने दिप्रिंट को बताया कि वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों की एक टीम उस क्षेत्र में पहुंच गई है, जो एक विस्तृत सर्वेक्षण करेगी और तबाही के प्रमुख कारण का पता लगाने की कोशिश करेगी.

शुरुआती रिपोर्ट्स से पता चलता है कि ये आकस्मिक बाढ़ ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) का परिणाम थी. ग्लेशियल झीलें तब बनती हैं जब बर्फ पिघलकर एक झील का रूप ले लेती है, जो ढीले मलबे से घिरी होती है. लेकिन जब ये मलबा अपनी जगह से हटता है, तो पानी तेज़ी से बाहर आ जाता है.

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भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के बयान के अनुसार, ऋषि गंगा और धौलीगंगा घाटी के ऊपरी हिस्सों में अलग-अलग आकार और किस्म की ऐसी कुल 71 झीलें बताई जाती हैं.

लेकिन, अभी तक कई विशेषज्ञ कह चुके हैं कि सेटेलाइट तस्वीरों में उस इलाके में ऐसी कोई झीलें नज़र नहीं आ रही हैं.

डोभाल ने दिप्रिंट से कहा, ‘उस इलाके में काफी बर्फबारी हुई, जिससे वहां बर्फ की 3-4 फीट मोटी परत जमा हो गई थी’. उन्होंने आगे कहा, ‘हवा की दिशा में बदलाव की वजह से एक बर्फानी तूफान आ गया. इस बर्फानी तूफान ने कुछ ढीले मलबे को हिला दिया होगा जो एक विशाल ग्लेशियल झील को रोके हुए था’.

डोभाल ने कहा कि पानी की मात्रा बहुत विशाल थी, जो 10-15 मिनट में ही आकस्मिक बाढ़ में तब्दील हो गई.

उन्होंने कहा कि ऐसा संभव है कि पानी ग्लेशियर के नीचे ढका हुआ था और ग्लेशियर के किनारों पर जमा मलबे और बर्फ ने उसे रोका हुआ था. जैसे ही वो विक्षुब्ध हुआ, अंदर अटका हुआ पानी बाहर आ गया.

उन्होंने कहा, ‘एक और संभावना ये है कि किसी पुराने हिमस्खलन या भूस्खलन ने, किसी प्रवाह के एक हिस्से को बाधित कर दिया होगा, जिससे वहां पर कुछ समय के लिए पानी एकत्र हो गया होगा. लेकिन जमा हो रहा पानी, जैसे ही एक निश्चित सीमा के पार हुआ, उसने अस्थाई बाधा को तोड़ दिया और अचानक तेज़ी से बहता हुआ घाटी में आ गया’.

सरकार के अनुसार करीब 200 लोग लापता हैं जबकि 20 लोग बाढ़ में अपनी जान गंवा बैठे.


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अगर पानी जमा हो रहा था, तो समय रहते वैज्ञानिकों को वो क्यों नहीं दिखा?

डोभाल ने कहा कि उस जगह जमा हो रहे पानी का पता नहीं चला होगा क्योंकि वहां तक पहुंचना बहुत आसान नहीं है. उन्होंने कहा, ‘वो रास्ता बहुत खतरनाक है और वहां तक आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता’.

डोभाल ने कहा, ‘उस क्षेत्र के बारे में जो थोड़ा बहुत मालूम है, वो रिमोट सेंसिंग डेटा पर आधारित है. उस इलाके में 14 से अधिक ग्लेशियर हैं, जिनमें से दक्षिणी नंदा देवी और उत्तरी नंदा देवी, वहां के कुछ सबसे बड़े ग्लेशियर हैं- जो लगभग 24 किलोमीटर लंबे हैं’.

उन्होंने आगे कहा कि हालांकि उस इलाके में, पहले से ही तबाही के आसार बन रहे थे लेकिन वहां के ग्लेशियर्स की कोई ज़्यादा स्टडीज़ नहीं की गईं हैं.

डोभाल ने कहा कि ऐसे इलाकों में, ग्लेशियर्स का सर्वेक्षण कराया जाना चाहिए, जहां पनबिजली संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं. ऐसे इलाकों में हिमस्खलन की फ्रीक्वेंसीज़, ग्लेशियर्स के आकार, तलछट की मौजूदगी और बाढ़ के संभावित स्रोतों का पता लगाने के लिए अध्ययन कराए जाने चाहिए.

इससे न केवल ऐसी त्रासदियों की संभावना का, पूर्वानुमान लगाने में मदद मिलती है, बल्कि बिजली संयंत्रों को भी फायदा होता है. डोभाल ने कहा, ‘ये पन परियोजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है, चूंकि उन्हें जानने की ज़रूरत होती है कि ग्लेशियर्स से कितना पानी बहकर आएगा’.

उन्होंने आगे कहा, ‘किसी भी विकास परियोजना के, फायदे और नुकसान दोनों होते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि हिमालय पहाड़ बहुत नाज़ुक है लेकिन हम विकास को भी नहीं रोक सकते’. उन्होंने ये भी कहा, ‘अगर आप आंकड़ों की गहराई में जाएं, तो उसमें निश्चित रूप से समाधान मिलेंगे कि ऐसी घटनाओं के लिए कैसे तैयारी की जाए’.

वाडिया इंस्टीट्यूट की ज़मीनी टीम को, उस इलाके का अध्ययन करने में कम से कम एक हफ्ते का समय लगेगा. टीम को भूवैज्ञानिक निशानात और सुराग ढूंढने होंगे ताकि पता चल सके कि तबाही आखिर किस चीज़ से आई.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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