साभार: पेरेंट सर्कल की वेबसाइट
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नई दिल्ली: तीन चरण के लॉकडाउन का स्कूली बच्चों के परिजनों पर काफ़ी असर पड़ा है. असर ऐसा है कि अगर स्कूल खुलते हैं तो ये परिजन अपने बच्चों को तुरंत पढ़ने नहीं भेजेंगे. स्कूल खुलने के बाद बच्चों को तुरंत पढ़ने नहीं भेजने वाले परिजनों की संख्या 92 प्रतिशत है, वहीं 56 प्रतिशत कम से कम एक महीने तक हालात का जायज़ा लेने के बाद फ़ैसला करेंगे.

ये बातें पेरेंट सर्कल द्वारा किए गए एक सर्वे में निकलकर सामने आई हैं. इस देशव्यापी सर्वे में बच्चों के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर परिजनों की राय ली गई है. जिन पहलुओं पर राय ली गई है उनमें बच्चों को स्कूल भेजना, दूसरों के साथ खेलने देना, बर्थडे पार्टी मनाना, मॉल-फिल्म या फैमिली वोकेशन पर जाना जैसी बातें शामिल हैं.

ज़्यादातर सवालों के जवाब में परिजन काफ़ी आशंकाओं से घिरे नज़र आए. मार्च में ज़्यादातर शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया गया था. लंबा समय बीत जाने के बाद भी परिजन बच्चों को दोबारा से पढ़ने भेजने को लेकर ज्यादा उत्सुक नहीं हैं. बच्चों को स्कूल भेजने से पहले वो इसे लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं कि कोविड को लेकर स्थिति पूरे कंट्रोल में है.

इस सर्वे में देश भर के जिन 12000 परिजनों ने हिस्सा लिया है उनमें से 92 प्रतिशत अपने बच्चों को तुरंत स्कूल नहीं भेजना चाहते हैं. महज़ 8 प्रतिशत ऐसे परिजन हैं जो स्कूल खुलते ही अपने बच्चों को पढ़ने भेजने को तैयार हैं.


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होम स्कूलिंग को भारत में कोई बेहतर विकल्प नहीं माना जाता. लेकिन सर्वे के मुताबिक 15 प्रतिशत परिजन इसे नए विकल्प के तौर पर देख रहे हैं.

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2020 में कोई बर्थडे पार्टी नहीं, मॉल-मूवी को भी ना

बच्चों के जीवन से जुड़े जिन पहलुओं का इस सर्वे में पता लगाने की कोशिश की गई है उनमें बर्थडे पार्टी को लेकर भी परिजनों की राय ली गई है. 64 प्रतिशत का कहना है कि वो अपने बच्चों को 2020 में किसी बर्थडे पार्टी में नहीं जाने देंगे. इसकी इजाज़त सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करने की स्थिति में भी नहीं दी जाएगी.

ना सिर्फ बर्थडे पार्टी बल्कि 1 प्रतिशत से अधिक परिजन इसके लिए भी नहीं तैयार कि लॉकडाउन खुलने के बाद वो अपने बच्चों को तुरंत मॉल घुमाने या मूवी दिखाने ले जाएं. 50 प्रतिशत तो पूरे साल के लिए किसी मॉल या मूवी को सिरे से अपने जीवन से दूर रखने की तैयारी में हैं.

बाहर खाने जाने को लेकर राय बंटी हुई है. परिजनों का कहना है कि अगर साफ़ सफ़ाई और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का ठीक से पालन किया जाता है तो वो बाहर खाने जाने को तैयार हैं. हालांकि, यहां भी पूरे साल ऐसा नहीं करने वाले परिजनों का औसत 49 प्रतिशत है, वहीं 33 प्रतिशत ऐसे हैं जो शुरुआती 3 महीने के बाद बाहर खाने की सोच सकते हैं.

बच्चों की दोस्ती और खेल पर भी पड़ेगा असर

बच्चों के जीवन में दोस्ती और खेल बेहद अहम होते हैं. लेकिन कोरोनावायरस के प्रकोप ने ऐसी चीज़ों को भी नहीं बख़्शा है. परिजनों के ज़ेहन में ऐसा संशय है कि अगर लॉकडाउन के नियमों में ढील दे दी जाती है तो भी वो ना तो तुरंत अपने बच्चों को दोस्तों से ही मिलने देेंगे, ना ही उन्हें तुरंत खेलने भेजेंगे.

50 प्रतिशत ऐसे परिजन हैं जो अपने बच्चों को लॉकडाउन खुलने के बाद भी एहतियातन घर में रखेंगे. हालांकि, 35 प्रतिशत ऐसे भी हैं जो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किए जाने की स्थिति में बच्चों को पार्क में खेलने भेजने को तैयार हैं.


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सर्वे में शामिल 45 प्रतिशत परिजन कम से कम 6 महीने के लिए अपने बच्चों को किसी स्पोर्ट्स में हिस्सा न लेने की बात कहते हैं. हालांकि, 25 प्रतिशत अपने बच्चों को ऐसे स्पोर्ट्स में हिस्सा लेने देंगे जिसमें टीम के बजाए अकेले खेलना होता है.

परिवार के साथ हॉलीडे

इस एक और पहलू को कोरोनावायरस और लॉकडाउन की वजह से दोहरा झटका लगा है. एक तरफ तो सफर के दौरान वायरस से संक्रमण का खतरा है, वहीं दूसरी तरफ लॉकडाउन से जो आर्थिक भूचाल आया है उससे लोगों के पॉकेट पर काफी असर पड़ा है. ये असर परिवारों के हॉलीडे पर भी पड़ेगा.

सर्वे में हिस्सा लेने वाले महज 1 प्रतिशत लोगों ने कहा कि लॉकडाउन खुलने के तुरंत बाद वो उसी तरह से हॉलीडे पर जाएंगे जैसे वो कोविड के जमाने से पहले जाते थे. 57 प्रतिशत लंबे समय तक इससे दूर रहेंगे. वहीं, 30 प्रतिशत ऐसे भी हैं जो हॉलीडे पर जाने के बजाए आने वाले समय के लिए पैसों की बचत करना चाहते हैं.

आलम ये है कि 43 प्रतिशत परिजन अपने बच्चों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दूर रखने की तैयारी में हैं और 70 प्रतिशत को लगता है कि भले ही लॉकडाउन हट जाए लेकिन एक-दूसरे से हाथ मिलाना भी सुरक्षित नहीं होगा.

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