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Saturday, 22 August, 2026
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90% जलने के बावजूद कोई आरोप नहीं: 28 साल बाद HC ने महिला के बयान के आधार पर पति को क्यों किया बरी

ट्रायल कोर्ट ने ससुर की ओर से दर्ज कराई गई दहेज की शिकायत पर आरोपी को सज़ा सुनाई थी, इसमें एक विवादित सुसाइड नोट पर भरोसा किया गया था.

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गुरुग्राम: गीतिका शर्मा जब पीजीआई चंडीगढ़ लाई गईं, तब उनका शरीर 90 प्रतिशत जल चुका था. वह इतनी होश में थीं कि बोल सकती थीं. उन्होंने एक डॉक्टर और न्यायिक मजिस्ट्रेट को सिर्फ इतना बताया कि वह रसोई की दीवार पर पेंट कर रही थीं और ब्रश को मिट्टी के तेल में डुबो रही थीं. तभी बोतल जलते हुए गैस चूल्हे के पास गिर गई और उनके कपड़ों में आग लग गई.

28 साल बाद, ट्रायल कोर्ट की सज़ा और सात साल की सज़ा सुनाए जाने के बाद पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा कि उनके परिवार के अस्पताल पहुंचने से पहले दिया गया यह बयान उनके पति भानु प्रकाश को बरी करने के लिए पर्याप्त होना चाहिए था.

दोनों की शादी फरवरी 1993 में हुई थी. 4 अगस्त 1998 को यमुनानगर स्थित अपने घर में वह बुरी तरह जल गईं. उनके पति और पड़ोसी पहले उन्हें रेलवे अस्पताल ले गए और फिर पीजीआई चंडीगढ़ ले गए. उसी शाम एक मजिस्ट्रेट ने उनका बयान दर्ज किया—आग दुर्घटनावश लगी थी, उन्होंने किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया.

पांच दिन बाद, 9 अगस्त को उनकी मौत हो गई. उसी दोपहर उनके पिता साकेश मणि शर्मा ने भानु के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी. इसमें दहेज के लिए परेशान करने का आरोप लगाया गया था. शिकायत में कहा गया कि शादी में 1 लाख रुपये का ड्राफ्ट, एक फ्रिज, एक Yamaha मोटरसाइकिल और 10 तोला सोना दिया गया था, लेकिन कथित तौर पर इतना भी काफी नहीं था. उन्होंने भानु के पिता और बड़े भाई का नाम भी शिकायत में लिया.

ट्रायल कोर्ट ने पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-B (दहेज हत्या) के तहत भानु को दोषी ठहराया और सात साल की जेल की सज़ा सुनाई.

वह चिट्ठी जिसने दोनों तरफ असर डाला

अभियोजन पक्ष के मामले में एक चिट्ठी सबसे अहम थी. कथित तौर पर यह चिट्ठी गीतिका ने 3 मई 1998 को लिखी थी. इसमें उन्होंने अपने पति और ससुराल वालों का नाम लिया था और चेतावनी दी थी कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो वे इसके लिए जिम्मेदार होंगे. फोरेंसिक लैब ने पुष्टि की कि चिट्ठी उनकी ही लिखावट में थी.

लेकिन शुरुआत से ही इस चिट्ठी को लेकर सबूतों की कड़ी कमज़ोर थी—पुलिस रिकॉर्ड में बताया गया कि चिट्ठी पति के घर से बरामद नहीं हुई थी, जैसा दावा किया गया था, बल्कि बाद में उनके पिता ने इसे पेश किया था. जब बचाव पक्ष के वकील ने दूसरी फोरेंसिक जांच की मांग की और इस चिट्ठी की तुलना उन चिट्ठियों से की, जिन्हें मृतका की मां ने उसकी असली लिखावट वाली चिट्ठियां माना था, तो नतीजे उलटे आए: लिखावट मेल नहीं खाती थी.

एक ही दस्तावेज़ को लेकर दो अलग-अलग विशेषज्ञों की राय होने पर जस्टिस मंदीप पन्नू ने पाया कि सिर्फ इस चिट्ठी के आधार पर दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं होगा.

फैसले में उन घटनाओं का पूरा क्रम बताया गया है, जिसने बेंच को अपने निष्कर्ष तक पहुंचाया: गीतिका ने डॉक्टर को वह बयान दिया था, इससे पहले कि कोई उन्हें कुछ सिखा या समझा सकता; उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने भी औपचारिक बयान दिया; पीजीआई में उनकी मां पांच दिन तक उनके पास रहीं, लेकिन इस दौरान उन्होंने एक बार भी अपने पति का नाम नहीं लिया; और एफआईआर उनकी मौत के बाद ही दर्ज हुई.

अदालत ने कहा, “अगर मृतका के साथ वास्तव में दहेज से जुड़ी क्रूरता की गई थी और जैसा अब आरोप लगाया जा रहा है, अगर अपीलकर्ता ने जानबूझकर उसे आग लगाई थी, तो मृतका के पास अपनी मां या परिवार के दूसरे सदस्यों को यह बताने का पर्याप्त मौका था.” अदालत ने कहा कि गीतिका के जिंदा रहते ऐसी कोई शिकायत नहीं की गई थी.

अदालत ने पति के व्यवहार को भी ध्यान में रखा—आग लगने के समय वह घर में नहीं था. वह अपने बेटे को स्कूल बस से लेने गया था और कुछ ही मिनट में वापस आकर उसे अस्पताल ले गया, न कि वहां से भाग गया.

अदालत ने शिकायतकर्ता के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि पति का घर से बाहर जाना और फिर वापस आना पहले से की गई योजना का हिस्सा था.

‘अनुमान का इस्तेमाल बिना सोचे-समझे नहीं किया जा सकता’

अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-B पर भरोसा किया था. यह धारा दहेज हत्या के मामलों में उकसावे को लेकर अनुमान से जुड़ी है, लेकिन अदालत ने कहा कि यह अनुमान तभी लगाया जा सकता है जब मामले के ज़रूरी शुरुआती तथ्य उचित संदेह से परे साबित हो जाएं और इस मामले में ऐसा नहीं हुआ.

सुप्रीम कोर्ट के 2024 के शूर सिंह बनाम उत्तराखंड फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि किसी सबूत का अदालत में स्वीकार किया जाना ही उसकी विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है. उसे स्वीकार करने से पहले अदालतों को आसपास की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उसकी जांच करनी होगी.

आदेश में कहा गया, “जब तक अभियोजन पक्ष अपराध के जरूरी शुरुआती तथ्यों को पहले साबित नहीं करता, तब तक आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने की जिम्मेदारी नहीं आती.”

18 अगस्त को हाई कोर्ट ने भानु प्रकाश की दोषसिद्धि और सात साल की सजा को रद्द कर दिया. गीतिका के पिता की ओर से सजा बढ़ाने की मांग को लेकर दायर संबंधित रिवीजन याचिका भी खारिज कर दी गई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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