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Tuesday, 17 March, 2026
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भारत में 9 साल में सीवर और सेप्टिक टैंक में 622 सफाईकर्मियों की मौत; 52 परिवारों को 0 मुआवजा

सरकार ने यह डेटा मंगलवार को लोकसभा में पेश किया. सबसे ज्यादा मौतें यूपी में 86, इसके बाद महाराष्ट्र 82, तमिलनाडु 77, हरियाणा 76, गुजरात 73 और दिल्ली 62.

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नई दिल्ली: 2017 से अब तक भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक हादसों में कम से कम 622 सफाईकर्मियों की मौत हुई, लेकिन इनमें से 52 परिवारों को आज तक कोई मुआवजा नहीं मिला. यह जानकारी सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में दी. छह मामलों को बिना समाधान के बंद कर दिया गया.

ये आंकड़े समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा चौधरी के सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने दिए, जिसमें सीवर में मौत और मैनुअल स्कैवेंजर के पुनर्वास से जुड़ा सवाल पूछा गया था.

सरकार के दिए डेटा के अनुसार, 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई 622 मौतों में से 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला, 25 को आंशिक मिला और 52 को कुछ भी नहीं मिला. छह मामले बंद कर दिए गए.

राज्यों में सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में 86 हुईं, इसके बाद महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 मौतें दर्ज की गईं.

मौतों और मुआवजा पाने वाले परिवारों के बीच सबसे बड़ा अंतर उत्तर प्रदेश में देखा गया, जहां 86 में से 13 परिवारों को कोई आर्थिक मदद नहीं मिली और दो को सिर्फ आंशिक भुगतान मिला.

दिल्ली में 62 में से 9 परिवारों को कुछ नहीं मिला. गुजरात में दो परिवारों को अब तक मुआवजा नहीं मिला और एक मामला बंद हो गया. महाराष्ट्र में 9 परिवारों को कोई भुगतान नहीं मिला.

उत्तर प्रदेश के जिला स्तर के डेटा में चंदौली में चार मौतें हुईं, लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. आंबेडकर नगर में दो मौतें हुईं और दोनों को कोई मुआवजा नहीं मिला. गौतम बुद्ध नगर में 16 मौतें हुईं—आठ मामलों में पूरा मुआवजा मिला, छह में कुछ नहीं मिला और दो मामले बंद कर दिए गए.

सरकार ने कहा कि 2023 में “Prohibition of Employment as Manual Scavengers and Their Rehabilitation Act, 2013” के तहत हुए सर्वे में देश के किसी भी जिले में मैनुअल स्कैवेंजर नहीं पाए गए.

हालांकि, 2013 और 2018 के दो पहले सर्वे में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर पहचाने गए थे, जिनमें से सिर्फ उत्तर प्रदेश में 32,473 थे, जो कुल का आधे से ज्यादा है.

इन सभी 58,098 लोगों और उनके परिवारों को 40,000 रुपये की एकमुश्त नकद सहायता दी गई. 27,928 लोगों को स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग दी गई. 2,679 लोगों को खुद का काम शुरू करने के लिए 5 लाख रुपये तक की सब्सिडी दी गई.

NAMASTE योजना कवरेज

सरकार ने 2023-24 में “National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem (NAMASTE)” शुरू किया, जिसका मकसद सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को मशीन से कराकर मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म करना है. इस योजना में सफाईकर्मियों को ट्रेनिंग, आर्थिक मदद और सुरक्षा उपकरण देने का लक्ष्य है.

31 दिसंबर 2025 तक देशभर में 89,114 सीवर और सेप्टिक टैंक वर्कर्स (SSWs) की पहचान की गई. इसमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 12,418, महाराष्ट्र में 8,595, गुजरात में 7,634, पश्चिम बंगाल में 7,630 और तमिलनाडु में 6,981 हैं.

12 मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 89,248 हो गई. 2024-25 में वेस्ट पिकर्स को भी योजना में जोड़ा गया, जिनकी संख्या देशभर में 2,34,425 है, जिसमें 35,641 उत्तर प्रदेश में हैं.

पिछले साल दिसंबर तक पहचाने गए कुल SSWs में से 73,864 (82.88 प्रतिशत) को आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना या राज्य की स्वास्थ्य योजनाओं में जोड़ा गया.

मंत्रालय ने संसद को बताया कि मशीनों के इस्तेमाल के बाद सफाईकर्मियों की आय में औसत बढ़ोतरी का कोई डेटा नहीं रखा जाता. साथ ही, मशीनों से काम में कितनी दक्षता या उत्पादकता बढ़ी, इसे मापने के लिए भी कोई ठोस मापदंड तय नहीं किए गए हैं.

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग को 2025 में 842 शिकायतें मिलीं, जिनमें वेतन न मिलने, सुरक्षा उपकरण न देने और जाति के आधार पर भेदभाव जैसे मामले शामिल हैं.

सबसे ज्यादा शिकायतें दिल्ली से 140 आईं, इसके बाद उत्तर प्रदेश से 130 और महाराष्ट्र से 95 शिकायतें दर्ज हुईं.

ठेकेदारों या नगर निकायों पर कार्रवाई के बारे में मंत्रालय ने कहा कि इसका डेटा केंद्र स्तर पर नहीं रखा जाता, क्योंकि सफाई का विषय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्यों के अधिकार में आता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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