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Wednesday, 17 July, 2024
होमदेश‘41 ज़िंदगियां दांव पर’, उत्तरकाशी में मज़दूरों के रेस्क्यू में टीम जल्दबाजी क्यों नहीं करना चाहती

‘41 ज़िंदगियां दांव पर’, उत्तरकाशी में मज़दूरों के रेस्क्यू में टीम जल्दबाजी क्यों नहीं करना चाहती

बचावकर्मियों के लिए मलबे के बीच हॉरिजोंटल ड्रिलिंग के लिए तैनात की गई ऑगर मशीन के फिर से खराब हो जाने के बाद अब राड़ी टॉप से वर्टिकल ड्रिलिंग शुरू की गई है, जिसका मंगलवार तक 46 मीटर तक काम पूरा हो चुका है.

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उत्तरकाशी: उत्तराखंड में निर्माणाधीन सिल्क्यारा सुरंग के एक हिस्से के ढहने से 41 मजदूरों के फंसने की घटना को अब 17 दिन बीत चुके हैं.

दो हफ्ते से अधिक समय से मज़दूरों के परिजन रेस्क्यू ऑपरेशन को देखने के लिए साइट पर आ रहे हैं. हर दिन नई उम्मीद और नए एहसास के बीच मानसिक रस्साकशी होती है कि शायद अभी वक्त नहीं आया है. आजकल-आजकल की उहापोह में सुरंग में फंसे अपनों के हर दिन सुरक्षित बाहर निकलने या उन्हें कुछ होने की आस से प्रशासन और टीवी के बीच के सच और झूठ में फंस गए हैं, जिससे परिजनों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ रहा है.

एक ओर, परिजनों का कहना है, 24×7 टीवी समाचार कवरेज है, जिसमें बेदम पत्रकार अपने दर्शकों को बता रहे हैं कि मज़दूर बस “कुछ ही घंटों में” बाहर आ जाएंगे. दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत है, जहां लोगों को वापस लाने की किसी भी जल्दबाजी के खिलाफ सावधानी बरतने का आग्रह किया जा रहा है.

ऑस्ट्रेलियाई सुरंग विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स, जो रेस्क्यू ऑपरेशन में भारतीय एजेंसियों की मदद कर रहे हैं, ने जल्दबाजी की संभावित लागत के बारे में बात की, जबकि उन्होंने वादा किया है कि मज़दूर क्रिसमस से पहले अपने घर पहुंचे जाएंगे, जो कि फिलहाल एक महीने दूर है.

डिक्स ने दिप्रिंट को बताया, “उन्हें सुरक्षित बाहर लाना मेरा काम है. ये कोई खेल नहीं है. अगर हम जल्दबाजी करेंगे तो हम उन्हें खो भी सकते हैं.”

डिक्स ने कहा कि उन्होंने कभी यह वादा नहीं किया कि रेस्क्यू ऑपरेशन इतना आसान होगा और जल्दी खत्म हो जाएगा.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने शनिवार को कहा कि उन्होंने कभी कोई समयसीमा नहीं बताई. एनडीएमए के सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने कहा, “पहले, इतनी जटिलताएं नहीं थीं और इसीलिए मीडिया में कुछ लोग समयसीमा को मान रहे थे.”

लेकिन, ये अनिश्चितताएं अब भारी पड़ रही हैं.

41 मज़दूरों में से एक वीरेंद्र किस्कू की पत्नी रजनी ने कहा कि परिवार उम्मीदों के खिलाफ रोज़ एक नई लड़ाई लड़ता है. बांका, बिहार की मूल निवासी ने कहा, “हम हर दिन उम्मीद करते हैं कि वो आज बाहर आएंगे, यहां तक कि टीवी भी इसे दिखाता रहता है, लेकिन अब डर लग रहा है.”

रजनी ने कहा, “जैसे ही वह बाहर आएंगे, मैं उन्हें घर ले जाऊंगी, चार पैसा कम कमाएंगे, लेकिन सुरक्षित रहेंगे.”

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के खेतिहर मजदूर चौधरी भी इसी तरह सोचते हैं. मुंबई में किसी हादसे में अपने एक बेटे को खोने वाले चौधरी दूसरे बेटे को खोने के विचार से भी कांपने लगते हैं.

उन्होंने कहा, एक बार जब उनका बेटा मंजीत बाहर आ जाएगा, तो वह “उसे फिर कभी यहां काम नहीं करने देंगे.”

उन्होंने कहा, “मैं अपने दूसरे बेटे को खोना नहीं चाहता.”

हर दिन रेस्क्यू ऑपरेशन और आगे बढ़ता है, लेकिन चिंताएं उसके साथ-साथ चलती हैं. चौधरी ने कहा, “मंजीत मेरा इकलौता बेटा है, अगर उसे कुछ हो गया तो मैं और मेरी पत्नी कैसे जिएंगे?”

मज़दूरों को बचाने के लिए मलबे में हॉरिजोंटल ड्रिलिंग के लिए तैनात की गई अमेरिकी ऑगर मशीन के फिर से खराब हो जाने के बाद राड़ी टॉप पर वर्टिकल ड्रिलिंग शुरू हो गई है. सोमवार तक, 86 मीटर के लक्ष्य के मुकाबले 36 मीटर का काम पूरा कर लिया गया था.

Workers arrive for horizontal manual digging | Suraj Singh Bisht | ThePrint
हॉरिजोंटल मैन्युअल ड्रिलिंग के लिए दिल्ली से पहुंचे मज़दूर | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

हालांकि, “युवा हिमालय” की नाज़ुक संरचनाओं के कारण, जियोलॉजिस्ट ने वर्टिकल ड्रिलिंग को एक खतरनाक तकनीक बताया है.

ड्रिलिंग दो अन्य तरीकों से भी चल रही है – उसी रास्ते पर हॉरिजोंटल मैन्युअल ड्रिलिंग जहां ऑगर मशीन थी और सुरंग के बड़कोट छोर से विस्फोटों के जरिए बचाव सुरंग का निर्माण, जिसका काम अब दो दिनों के बाद फिर से शुरू होगा और इसमें 12-13 दिन लगने की उम्मीद है.

रेस्क्यू ऑपरेशन तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी), बिजली कंपनियों एसजेवीएन और टीएचडीसी, रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल), और राष्ट्रीय राजमार्ग और बुनियादी ढांचा विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) द्वारा संयुक्त रूप से चलाया जा रहा है.

21 नवंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने टेलीविजन चैनलों को जारी रेस्क्यू ऑपरेशन को सनसनीखेज बनाने और सुरंग के पास से कोई भी लाइव पोस्ट या वीडियो बनाने से बचने के लिए एक सलाह जारी की थी.


यह भी पढ़ें: उत्तरकाशी सुरंग हादसा: ऑगर मशीन खराब होने के कारण बचाव अभियान रुका, अब सारा ध्यान वर्टिकल ड्रिलिंग पर


प्रार्थनाएं और चिंताएं

मज़दूरों की सुरक्षित घर वापसी के लिए साइट पर हर दिन प्रार्थनाएं चल रही हैं. सुरंग के बाहर एक अस्थायी मंदिर स्थापित किया गया है, जहां स्थानीय निवासियों ने सोमवार को हवन किया. सुरंग के प्रवेश द्वार पर पानी के रिसाव के कारण बनी एक ऑकृति को लोग हिंदू देवता शिव का स्वरूप बता रहे हैं.

The temple at the entrance of the collapsed tunnel | Suraj Singh Bisht | ThePrint
सिल्क्यारा छोर से सुरंग के प्रवेश द्वार पर मंदिर | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

उत्तरकाशी के ब्रह्मखाल में ढाबा चलाने वाले दीपक सिंह रावत और उनकी पत्नी योगिता रावत ने कहा कि टीवी कवरेज हर दिन उन्हें और डराती है. उनके पारिवारिक मंदिर में कुछ स्थानीय लोगों ने सोमवार को मज़दूरों के लिए गायत्री मंत्र जप का आयोजन किया.

स्थानीय देवता बौखनाग (शेषनाग का अवतार) को समर्पित एक मेला वर्तमान में उत्तरकाशी में चल रहा है, जिसके मंगलवार तक समाप्त होने की उम्मीद है.

स्थानीय निवासियों ने दिप्रिंट को बताया कि, एक बार मेला समाप्त होने के बाद, वे साइट पर जाने और विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं और फंसे हुए मज़दूरों को जल्द बचाने का आग्रह करेंगे.

इस बीच मज़दूरों के परिवार प्रशासन द्वारा सुरंग के बाहर स्थापित एक कैंप में रह रहे हैं और उनकी रोज़ाना फंसे हुए मज़दूरों से बात कराई जा रही है.

दिन-ब-दिन, वे बचाव स्थल से 500 मीटर दूर एक मिट्टी के टीले पर इकट्ठा होते हैं और ऑपरेशन को टकटकी निगाह से देखते हैं.

वर्टिकल ड्रिलिंग रविवार दोपहर से शुरू हो गई थी.

साइट के पास एक संवाददाता सम्मेलन में केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव, महमूद अहमद ने कहा, “सिल्क्यारा सुरंग के अंदर फंसे 41 मज़दूरों के लिए निकलने का रास्ता बनाने के लिए वर्टिकल ड्रिलिंग शुरू हो गई है…कुल 86 मीटर के इस काम के दो दिनों में पूरा होने की उम्मीद है.”

अहमद राष्ट्रीय राजमार्ग और बुनियादी ढांचा विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के प्रबंध निदेशक भी हैं.

पर्यावरण और भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ इस ऑपरेशन को घबराहट के साथ देख रहे हैं, यह देखते हुए कि गहन शोध के बिना क्षेत्र में विकास कार्य आग से खेलने जैसा है, यह इंगित किया कि शायद यही कारण है कि सुरंग ढह गई होगी.

माउंट एवरेस्ट के 86 सेंटीमीटर तक बढ़ने की खबरों का ज़िक्र करते हुए भूविज्ञानी वाई.पी. सुंद्रियाल ने कहा, “हिमालय बहुत युवा पहाड़ हैं और उनकी टेक्टोनिक प्लेटें अभी भी हिल रही हैं और तिब्बती प्लेटों के नीचे धंस रही हैं.”

उन्होंने कहा, “पूरी तरह से ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रिपोर्ट (जीपीआर) के बिना कोई भी काम करना जोखिम को बुलावा देने जैसा होगा.”

सुंद्रियाल ने कहा, एक दुर्घटना अगली के लिए खतरे की घंटी हो सकती है.

डिक्स ने पहले दिप्रिंट को “इस सुरंग और चट्टानों की नाज़ुक प्रकृति के बारे में बताते हुए कहा था कि सुरंगों का निर्माण सावधानी से किया जाना चाहिए और यही कारण है कि ये सुरंग ढह गई.”

यही कारण है कि समाधान के रूप में वर्टिकल ड्रिलिंग पर भी सवाल उठते हैं.

‘युद्ध जैसे हालात’

मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल अधिकारियों ने वर्टिकल ड्रिलिंग के दौरान पहाड़ों में कंपन की संभावना को स्वीकार किया है, जिसके कारण ऑपरेशन को बीच-बीच में रोकना पड़ रहा है.

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक पी.सी. नवानी ने कहा, “वर्टिकल ड्रिलिंग से पहाड़ हिलेगा, जिससे कंपन होगा और मलबा संभावित रूप से मज़दूरों पर गिर सकता है और बचावकर्मी भी घायल हो सकते हैं.”

भूविज्ञानी हर्ष वत्स ने कहा कि वर्टिकल ड्रिलिंग पहाड़ों के लिए “बड़ा खतरा” हो सकती है. उन्होंने कहा, “आने वाले दिनों में उत्तरकाशी में बारिश होगी, जिससे कीचड़ बढ़ेगा. चूंकि, यह बर्फ प्रभावित क्षेत्र है, इसलिए, काम जितनी जल्दी हो सके किया जाना चाहिए, क्योंकि उसके बाद, यह और अधिक कठिन हो जाएगा.”

भारत मौसम विज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक आर.के. जेनामणि ने दिप्रिंट से पुष्टि की कि अगले तीन दिनों में राज्य में बारिश का अनुमान है. उन्होंने राज्य के लिए ऑरेंज अलर्ट भी जारी किया है.

सुंद्रियाल ने कहा, “जिस क्षेत्र में सुरंग का निर्माण किया जा रहा है, वहां फिलाइट, फ्लिंटस्टोन और मिट्टी के खनिज जैसी चट्टानें हैं जो पानी के संपर्क में आने पर टूट जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं.”

सिल्क्यारा में सुरंग बनाने का काम शुरू होने से पहले हुए शोध को लेकर भी कई सवाल उठते रहे हैं.

भूविज्ञानी एस.पी. सती ने कहा, “इस पूरे क्षेत्र की चट्टानें नाज़ुक हैं और यहां काम करने से पहले गहन अध्ययन की ज़रूरत है.”

सुंद्रियाल ने कहा कि सुरंग ढहना एक “मानव निर्मित आपदा” थी. परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “जो कुछ भी लिखा था वह ज़मीनी हकीकत नहीं था और कंपनी के पास कोई पूर्णकालिक खनिक और भूविज्ञान विशेषज्ञ नहीं था”.

उन्होंने पहले आरोप लगाया था कि यह एनएचआईडीसीएल की ओर से लापरवाही के कारण हुआ था.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “सुरंग निर्माण में ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) की अनुपस्थिति, इमरजेंसी एक्जिट की कमी और 2-3 फीट के अंतराल पर स्टील पाइप या बार की अनुपस्थिति घटना के कारणों में से थी.” ऐसे मामलों में जवाबदेही की कमी थी.

नवानी ने कहा, “सामान्य तौर पर इमरजेंसी में रेस्क्यू को सुविधाजनक बनाने के लिए ऐसी लंबी सुरंगों में एक्जिट गेट होने चाहिए.”

एक्जिट गेट के बारे में पूछे जाने पर उत्तरकाशी के जिला मजिस्ट्रेट अभिषेक रुहेला ने दिप्रिंट के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि “यह फैसला डिज़ाइनरों को लेना है”.

उन्होंने कहा, “तकनीकी फैसले बहुत अध्ययन के बाद लिए जाते हैं. इसमें विशेषज्ञ भी शामिल होते हैं.”

सुरंग के लिए निर्माण फर्म नवयुगा इंजीनियरिंग कंपनी को डिजाइन सेवाएं प्रदान करने वाली यूरोपीय कंपनी बर्नार्ड ग्रुप ने कहा, “सुरंग की शुरुआत के बाद से भूगर्भीय स्थितियां निविदा दस्तावेजों में भविष्यवाणी की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हुईं”.

इस घटना ने केंद्र सरकार को देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्माणाधीन सभी 29 सुरंगों की सुरक्षा ऑडिट का आदेश देने के लिए प्रेरित किया है.

अधिकारियों का कहना है कि उत्तरकाशी में रेस्क्यू ऑपरेशन जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है.

रेस्क्यू ऑपरेशन में NDRF की टीम भी शामिल | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

एनडीएमए सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) ने शनिवार को कहा कि इस “ऑपरेशन में लंबा समय लग सकता है”.

हसनैन ने कहा, “आप देख रहे हैं कि यह ऑपरेशन तकनीकी रूप से जटिल होता जा रहा है. हम पहाड़ियों पर बचाव अभियान चला रहे हैं. हम अप्रत्याशितता के माहौल में काम कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा, “मैंने महसूस किया है कि जब आप पहाड़ों के साथ कुछ करते हैं, तो आप कुछ भी तय नहीं कर सकते. यह बिल्कुल युद्ध जैसी स्थिति है”.

(संपादन: अलमिना खातून)
(इस ग्राऊंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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