Thursday, 8 December, 2022
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कोविड पीक में आर्थिक अपराधों में 40% भारतीय कंपनियों ने 50 हजार से एक लाख तक अमेरिकी डॉलर गंवाए- PwC रिपोर्ट

सर्वेक्षण के मुताबिक, अच्छी बात यही है कि प्रबंधन की तरफ से उठाए गए सुरक्षा उपायों के कारण धोखाधड़ी में गिरावट आई है. 112 भारतीय कंपनियां इस सर्वेक्षण का हिस्सा थीं.

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नई दिल्ली: प्राइसवाटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) का एक सर्वेक्षण बताता है कि कोविड महामारी पीक पर होने के दौरान तमाम तरह के फर्जीवाड़े और आर्थिक अपराधों की वजह से 40 फीसदी भारतीय कंपनियों को 100,000 अमेरिकी डॉलर तक का नुकसान उठाना पड़ा.

पीडब्ल्यूसी की तरफ से 15 नवंबर को जारी ‘ग्लोबल इकोनॉमिक क्राइम एंड फ्रॉड सर्वे 2022 : इंडिया इनसाइट्स’ से पता चलता है कि पिछले 24 महीनों में 40 प्रतिशत भारतीय कंपनियों को 50,000 अमेरिकी डॉलर से 100,000 अमेरिकी डॉलर के बीच नुकसान उठाना पड़ा.

रिपोर्ट बताती है कि 17 प्रतिशत भारतीय कंपनियों को 1 मिलियन डॉलर से 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच नुकसान हुआ, जबकि उनमें से 5 प्रतिशत को 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का नुकसान झेलना पड़ा.

रिपोर्ट दुनियाभर के 1,296 संगठनों के सर्वेक्षण पर आधारित है. इनमें भारत की प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवा, स्वास्थ्य सेवा से लेकर औद्योगिक निर्माण, ऊर्जा क्षेत्र तक की 112 कंपनियां शामिल हैं.

सर्वेक्षण बहुविकल्पीय प्रश्नों पर आधारित था, जिसमें उत्तरदाताओं को एक प्रश्न के लिए एक से अधिक जवाब चुनने थे.

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हालांकि, एक अच्छी बात यह है कि रिपोर्ट दर्शाती है धोखाधड़ी के मामलों में गिरावट आई है और इसमें फ्रॉड रोकने के लिए अपनाए जाने वाले उपायों का बड़ा हाथ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, ‘पिछले 24 महीनों में 52 प्रतिशत भारतीय संगठन धोखाधड़ी या आर्थिक अपराध के शिकार बने, जबकि 2020 के सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 69 प्रतिशत रहा था.’


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कदाचार- सबसे बड़ा खतरा बना

रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी शुरू होने के बाद से कंपनियों में नई तरह की धोखाधड़ी सामने आई है, जिसमें कदाचार यानी मिसकंडक्ट रिस्क, लीगल रिस्क, साइबर क्राइम, इनसाइडर ट्रेडिंग और प्लेटफॉर्म रिस्क आदि शामिल हैं.

इसमें यह भी बताया गया है, ‘भारत में धोखाधड़ी झेलने वाली 95 प्रतिशत कंपनियों ने अनुभव किया कि उन्हें कोविड-19 के कारण व्यवधानों की वजह से धोखाधड़ी की नई तरह की घटनाओं का सामना करना पड़ा.’

कदाचार संबंधी खतरों में कस्टमर फ्रॉड, एकाउंटिंग/फाइनेंशियल स्टेटमेंट फ्रॉड और रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार शामिल हैं. वहीं लीगल रिस्क का मतलब है कि प्रतिस्पर्धा को बाधित करने वाला व्यवहार और बौद्धिक संपदा की चोरी.

पीडब्ल्यूसी एंड लीडर ऑफ फोरेंसिक सर्विसेज में पार्टनर पुनीत गारखेल ने दिप्रिंट को बताया कि प्लेटफॉर्म रिस्क मुख्यत: वित्तीय सेवाओं से जुड़ा एक शब्द है, जिसमें फाइनेंसियल सिस्टम को एक प्लेटफॉर्म माना जाता है.

गारखेल ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग एक प्लेटफॉर्म रिस्क का उदाहरण है क्योंकि इसमें पैसों को इधर-उधर करने के लिए प्लेटफॉर्म में हेरफेर की जाती है जिससे कंपनी को नुकसान पहुंचता है.

सर्वेक्षण बताता है कि 67 प्रतिशत के साथ कदाचार (मिसकंडक्ट) कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहा. फिर, नंबर आता है प्लेटफॉर्म रिस्क (38 फीसदी), साइबर क्राइम (31 फीसदी), इनसाइडर ट्रेडिंग (19 फीसदी) और लीगल रिस्क (16 फीसदी) का.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कदाचार संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहा क्योंकि बुरे लोगों ने उनके साथ काम करना और महामारी से संबंधित अनिश्चितता और अस्थिरता का फायदा उठाना शुरू कर दिया था.’

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘धोखाधड़ी के शिकार संगठनों में आचरण संबंधी जोखिम (या फर्म में शामिल लोगों या वेंडर्स, एजेंटों और ग्राहकों से जुड़े जोखिम) सबसे बड़ा खतरा रहे.’

(अनुवाद: रावी द्विवेदी | संपादन: कृष्ण मुरारी)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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