Saturday, 25 June, 2022
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4 साल, 4 चार्जशीट और फिर 17 गिरफ्तारियां लेकिन अब तक गौरी लंकेश हत्याकांड में शुरू नहीं हो पाया ट्रायल

फिलहाल इस केस में कोई प्रगति गौरी लंकेश की बहन कविता की तरफ से दायर उस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगी जिसमें एक आरोपी के खिलाफ केकोका रद्द करने के कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है.

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बेंगलुरू: चार साल, 18 आरोपी, 10,000 से अधिक पन्नों में समाहित चार चार्जशीट और फिर बाद में 17 गिरफ्तारियां होने के बावजूद पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के मामले में मुकदमा शुरू होना अभी बाकी है.

लंकेश की 5 सितंबर, 2017 को उनके बेंगलुरू स्थित आवास के बाहर हत्या कर दी गई थी. एसआईटी सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि अभी दो अहम सुराग हत्याकांड की जांच कर रहे विशेष जांच दल (एसआईटी) की पहुंच से बाहर हैं, हत्या में इस्तेमाल किया गया हथियार और इस मामले के 18 आरोपियों में से एक निहाल उर्फ दादा- जो फिलहाल फरार है.

इस मामले में विशेष लोक अभियोजक एस. बालन ने दिप्रिंट को बताया कि बेंगलुरू सेशन कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश की पीठ के समक्ष मसौदा आरोपपत्र दायर किए दो साल से अधिक समय हो गया है लेकिन मुकदमा अभी शुरू नहीं हो पाया है. अभियुक्तों की तरफ से निचली अदालत में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिसमें जमानत देने, आरोप मुक्त करने और इन्हें रद्द किए जाने जैसी अपीलें की गई हैं. अभियोजन पक्ष इसे मुकदमा शुरू करने में देरी की रणनीति करार दे रहा है.

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 4 सितंबर, 2018 से 5 जून, 2021 के बीच आरोपियों की तरफ से अकेले कर्नाटक हाई कोर्ट में 14 याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें से पांच खारिज कर दी गई हैं, एक पर आंशिक रूप से अनुमति दी गई है जबकि बाकी स्थगित हो गई हैं.

विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच और अभियोजन पक्ष के पूरे मामले पर आगे की कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करती है. शीर्ष कोर्ट लंकेश की बहन कविता की तरफ से दायर एक याचिका पर 8 सितंबर को सुनवाई करने को तैयार है, जिसमें एक आरोपी मोहन नायक के खिलाफ कर्नाटक संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (केकोका) के तहत दायर आरोपों को रद्द करने के कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है.

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एसआईटी के सूत्रों के मुताबिक, आरोपपत्र में नायक पर परशुराम वाघमोर व अन्य आरोपियों को पनाह देने का आरोप लगाया गया है, जिन्होंने कथित तौर पर पूर्व पत्रकार को गोली मारी थी.

इस मामले में सभी आरोपियों के खिलाफ केकोका लगाया गया है लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट की एकल जज पीठ ने गत 22 अप्रैल को नायक के खिलाफ केकोका के आरोपों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरोपी पहले किसी भी तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल नहीं रहा है, जैसा अधिनियम के तहत परिभाषित किया गया है.

केकोका, जिसे 22 दिसंबर 2001 को राष्ट्रपति का अनुमोदन मिला था, को संगठित अपराध सिंडिकेट या गिरोहों की आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम और नियंत्रण और उनसे निपटने के लिए विशेष प्रावधान करने के उद्देश्य से लागू किया गया था.

एसआईटी अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि लंकेश मामले में अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं. एसआईटी सूत्रों के मुताबिक, जांच टीम ने हत्या के कथित मास्टरमाइंड अमोल काले के पास से एक डायरी भी बरामद की है जिसमें निशाना बनाए जाने के लिए कर्नाटक के नौ और अन्य राज्यों के 26 लोगों के नाम शामिल हैं और साथ में कोड वर्ड में टीम के सदस्यों के नाम, लॉजिस्टिक, संसाधनों आदि का भी जिक्र है.

एसआईटी सूत्रों ने कहा कि मामले में हर आरोपी की भूमिका को परिभाषित करने के लिए चार्जशीट में डायरी से मिले विवरण का भी उल्लेख किया गया है.

एसआईटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा कि हथियार को छोड़कर लंकेश की हत्या पर करीब 30,000 रुपये का खर्च किया गया था. अधिकारी ने बताया कि इसमें आरोपियों के प्रशिक्षण पर खर्च, उनके लिए रहने-खाने की व्यवस्था आदि पर हुआ खर्च शामिल है जिसकी व्यवस्था काले ने की थी.

ऊपर उद्धृत अधिकारी ने कहा, ‘आरोपियों को ध्यान, एकाग्रता आदि में इस हद तक प्रशिक्षित किया गया था कि वाघमोरे ने अपने इकबालिया बयान तक में कहा है कि गौरी के घर पर पहुंचकर उसे गोली मारने से पहले खुद को शांतचित्त बनाए रखने के लिए बाइक पर यात्रा के दौरान भी ध्यान कर रहा था. जांच के दौरान भी वह ध्यानमग्न हो जाता था और हमें फिर से शुरुआत के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था.’


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इस केस में केकोका अहम क्यों है?

अभियोजन पक्ष ने दिप्रिंट को बताया कि कविता लंकेश की याचिका पर शीर्ष अदालत का फैसले न केवल उनकी बहन के मामले को प्रभावित करेगा बल्कि उन सभी मामलों को प्रभावित करेगा जिनमें केकोका और महाराष्ट्र में इसके समकक्ष मकोका लागू किया गया है.

हाल ही में जिन प्रमुख मामलों में विवादास्पद कोका के प्रावधान लागू किए गए हैं, उनमें गैंगस्टर रवि पुजारी शामिल हैं, जो 2016 की गोलीबारी की घटना सहित कई मामलों में गिरफ्तारी से बचता रहा है. वह आखिरकार 2019 में पकड़ा गया और शूटआउट मामले में कोका के तहत आरोपित किया गया.

मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी के प्रमुख जांच अधिकारी एम.एन. अनुचेत का कहना है, ‘गौरी के मामले में केकोका बेहद महत्वपूर्ण है. अधिनियम के तहत विशेष प्रावधान हैं, जैसे जांच अधिकारी के सामने स्वीकारोक्ति अदालत में स्वीकार्य है, जो अदालत में साक्ष्य के तौर पर पेश किए जाने और उसे साबित करने के लिहाज से अहम है.’

गौरी लंकेश मामले की जांच के दौरान एसआईटी स्कॉलर एम.एम. कलबुर्गी की हत्या और लेखक के.एस. भगवान की हत्या की साजिश का भी खुलासा कर पाई. कलबुर्गी की 20 अगस्त, 2015 को धारवाड़ में उनके घर के सामने गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. एसआईटी को भगवान की हत्या की साजिश का पता चला था, जिसके कारण ही गौरी लंकेश हत्याकांड के कथित मास्टरमाइंड अमोल काले की गिरफ्तारी हो पाई.

एसआईटी के मुख्य जांच अधिकारी के मुताबिक, के.एस. भगवान का केस जहां ट्रायल के चरण में है, वहीं एम.एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश के मामले में आरोप तय होना बाकी है.

चूंकि एम.एम. कलबुर्गी मामले में प्रत्यक्षदर्शी का मजबूत साक्ष्य है, इसलिए अभियोजन पक्ष की स्थिति दमदार मानी जा रही है. अभियोजन पक्ष के अधिवक्ताओं का कहना है कि हालांकि, गौरी लंकेश मामले में एसआईटी को काफी हद तक परिस्थितिजन्य साक्ष्य, गेट विश्लेषण, फोरेंसिक बैलिस्टिक रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज आदि पर निर्भर रहना पड़ेगा.

गौरी लंकेश हत्याकांड में अमोल काले समेत आठ आरोपियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता एन.पी. ने दिप्रिंट को बताया कि इस मामले में केकोका लागू करना ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ के खिलाफ था क्योंकि यह बचाव पक्ष के वकीलों को जांच के बारे में जानकारी दिए जाने की अनुमति नहीं देता है.

उन्होंने कहा, ‘चूंकि मामले में केकोका लगाया गया है, पुलिस हमें गवाहों की सूची भी देने से इनकार कर रही है. वे हमें एकदम अंधेरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं. केकोका केवल उन्हीं लोगों के खिलाफ लगाया जा सकता है जिनके खिलाफ पहले एक से अधिक बार चार्जशीट दायर हो चुकी हो. मोहन नायक का मामला हमारे लिए टेस्ट केस है. यदि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाता है तो हम सभी आरोपियों के खिलाफ केकोका रद्द करने के लिए याचिका दायर करेंगे.’

अप्रैल में नायक के खिलाफ केकोका रद्द करने के कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के कुछ दिनों बाद ही कविता ने इसे चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. कर्नाटक सरकार ने भी 26 जुलाई को हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी.

कविता लंकेश ने दिप्रिंट से कहा, ‘आरोपपत्र बहुत बारीकी से तैयार किया गया है और एसआईटी ने गौरी हत्याकांड और (गोविंद) पानसरे, एम.एम. कलबुर्गी और (नरेंद्र) दाभोलकर मामलों के बीच संबंध पाया है. यदि केकोका के आरोप रद्द कर दिए जाते हैं तो इन सभी मामलों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. इससे बदतर होगा कि यह हत्या के लिए नए लोगों का इस्तेमाल को प्रोत्साहित करेगा क्योंकि पहले अपराध के मामले में केकोका लागू नहीं किया जा सकता. किसी एक व्यक्ति ने नहीं बल्कि एक संगठित अपराध सिंडिकेट ने गौरी की हत्या की है. मैं केवल मुकदमा जल्द शुरू होने की उम्मीद कर सकती हूं.’

गौरतलब है कि तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त, 2013 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जबकि लेखक और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य गोविंद पानसरे की 20 फरवरी, 2015 को हत्या की गई थी.


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प्रक्रिया में तेजी के लिए विशेष अदालत जरूरी

इस मामले में विशेष लोक अभियोजक एस. बालन ने दिप्रिंट को बताया, ‘मुकदमा शुरू किए जाने के आग्रह के साथ मैंने तीन साल में छह ज्ञापन सौंपे हैं. यहां तक कि मसौदा आरोपपत्र भी दो साल पहले फाइल किया जा चुका है और हमें केवल अदालत की तरफ से आरोप तय किए जाने और मुकदमे की कार्यवाही शुरू करने का इंतजार है.’

हाई कोर्ट में विशेष लोक अभियोजक एच.एस. चंद्रमौली बचाव पक्ष की तरफ से दायर अपीलों का विरोध कर रहे हैं. अभियोजन पक्ष के एक वकील ने कहा, ‘सरकार मामले में तेजी लाने के लिए एक विशेष अदालत का गठन कर सकती है. पहले भी कई मामलों में ऐसा हो चुका है.’

दिप्रिंट ने इस केस में विशेष अदालत के गठन पर सरकार का रुख जानने के लिए कर्नाटक के कानून और संसदीय कार्य मंत्री जे.सी. मधुस्वामी से फोन पर संपर्क की कोशिश की लेकिन इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई थी.

यद्यपि किसी विशेष अदालत का गठन करके मुकदमे की प्रक्रिया में तेजी लाना निश्चित होता है लेकिन इसकी कुछ कीमत भी चुकानी पड़ती है. कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे जस्टिस संतोष हेगड़े ने दिप्रिंट को बताया, ‘सरकारों के पास ऐसे मामलों में विशेष अदालतें गठित करने का विशेषाधिकार है जो जनहित से जुड़े हों या फिर मामले का नतीजा अन्य मामलों पर असर डालता हो. लेकिन इसका मतलब यह भी होता है कि अन्य मामलों की सुनवाई में देरी होती है. इसलिए मामलों को केवल मेरिट के आधार पर ही सुना जाना चाहिए.’

एसआईटी ने 2018 से 2020 के बीच गौरी लंकेश हत्याकांड के 18 आरोपियों- अमोल काले, परशुराम वाघमोरे, अमित बद्दी, सुरेश कुमार, गणेश मिस्कीन, राजेश बांगेरा, अमित देगवेकर, मोहन नायक, के.टी. नवीन कुमार, सुजीत कुमार, मनोहर एडवे, भारथ कुर्ने, शरद कालस्कर, श्रीकांत पंगारकर, सुधन्वा गोंडालेकर, ऋषिकेश देवरकर, निहाल उर्फ दादा, वासुदेव सूर्यवंशी- में से 17 को गिरफ्तार कर लिया था. चार्जशीट के मुताबिक, एसआईटी सूत्रों ने आरोप लगाया है कि ये सभी विभिन्न दक्षिणपंथी चरमपंथी संगठनों से जुड़े हैं.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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