(जयंत भट्टाचार्य)
अगरतला, आठ मई (भाषा) बांग्लादेश के मुक्ति(स्वतंत्रता) संग्राम के कम ज्ञात तथ्यों में से एक तथ्य यह भी है कि भारत के सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने लगभग 51 साल पहले त्रिपुरा सीमा पर मुक्ति वाहिनी (बांग्लादेश लिबरेशन फोर्स) का पहला समूह बनाने में मदद की थी।
बीएसएफ ने पाकिस्तानी सेना द्वारा बांग्लादेश में हमले शुरू करने के एक दिन बाद यह कार्रवाई की थी।
मेजर पी के घोष, जो उस समय पूर्वी पाकिस्तान में चटगांव डिवीजन की सीमा से लगे त्रिपुरा के दक्षिणी भाग में श्रीनगर, अमलीघाट, समरेंद्रगंज और नालुआ में बीएसएफ की चार सीमा चौकियों (बीओपी) की कमान संभाल रहे थे, उन्होंने मुक्ति वाहिनी (बांग्लादेश लिबरेशन फोर्स) का पहला समूह बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मेजर घोष ने 26 मार्च 1971 को भारत-पाक सीमा पर पहली बार सीमा पार करने और पहले मुक्ति वाहिनी समूह के गठन के बारे में पीटीआई-भाषा को विस्तार से बताया।
मेजर घोष के मुताबिक 26 मार्च 1971 की सुबह पाकिस्तानी सेना ने मेजर जियाउर रहमान की सेना का मुकाबला करने के लिए एक ब्रिगेडियर की कमान में कोमिला छावनी से चटगांव के लिए एक इन्फैंट्री बटालियन भेजी और सबरूम में श्रीनगर बीओपी के पास शुभपुर रोड पुल की सुरक्षा के लिए 10-15 लोगों को तैनात किया।
उन्होंने कहा कि शुभपुर रोड पुल एक रणनीतिक बिंदु पर स्थित था, जो चटगांव और ढाका को जोड़ता था और वह सेना के लिए भोजन और अन्य सामग्रियों की मुख्य आपूर्ति लाइन थी।
मेजर घोष ने कहा, ‘‘ अपराह्न करीब दो बजे मेरे पूर्वी पाकिस्तान राइफल्स (ईपीआर) के सहयोगी हवलदार नूरुद्दीन नेशनल असेंबली के सदस्य प्रो ओबैदुल्ला मजूमदार और अवामी लीग के नेता डॉ आमिर हुसैन के साथ श्रीनगर बीओपी आए और उन्होंने हमें इसके बारे में बताया। उन्होंने पाकिस्तान की सेना के जवानों द्वारा महिलाओं और बच्चों सहित अन्य ग्रामीणों पर किए गए अत्याचारों के बारे में बताया और उन्हें हटाने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।’’
हालांकि, घोष ने शुरू में कोई कार्रवाई नहीं की, लेकिन वादा किया कि वे उनके अनुरोध को उच्च अधिकारियों तक पहुंचाएंगे।
उन्होंने कहा, “वे बहुत भावुक हो गए और मुझ पर भावनात्मक दबाव डाला। मैंने प्रो. अली के रूप में एक कवर नाम लिया और जांच के लिए उनके साथ गया। ग्रामीण अपने नेताओं से मिलने निकले और जोय बंगबंधु, जय बांग्लादेश के नारे लगाए। इसी दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने हमारे ऊपर हमला कर दिया, हालांकि इसके कारण कोई नुकसान नहीं हुआ।“
इसके बाद शाम करीब पांच बजे हवलदार नूरुद्दीन की कमान में छह ईपीआर लड़ाकों के साथ मुक्ति वाहिनी का पहला समूह बनाया गया। मुक्ति वाहिनी के जवानों ने तत्काल शपथ ली और पाकिस्तानी सैनिकों को शुभपुर पुल की ओर बढ़ने से रोकने के लिए निकल गए।
भाषा रवि कांत नरेश
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