नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र से कहा कि राजद्रोह के संबंध में औपनिवेशिक युग के कानून पर किसी उपयुक्त मंच द्वारा पुनर्विचार किए जाने तक नागरिकों के हितों की सुरक्षा के मुद्दे पर वह अपने विचारों से अवगत कराए।
उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर सहमति जतायी कि इस प्रावधान पर पुनर्विचार केंद्र पर छोड़ दिया जाए जिसने इस संबंध में एक हलफनामा दायर किया है।
हालांकि न्यायालय ने प्रावधान के लगातार दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की और यह सुझाव भी दिया कि दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं या कानून पर पुनर्विचार की कवायद पूरी होने तक इसे स्थगित रखने का फैसला किया जा सकता है।
न्यायालय को यह तय करना था कि राजद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई तीन या पांच-न्यायाधीशों की पीठ को करनी चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने सरकार के नए रुख पर गौर किया कि वह इसकी ‘पुन: जांच और पुनर्विचार’ करना चाहती है।
प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र के हालिया हलफनामे का हवाला देते हुए कहा, ‘हमें लगता है कि राज्य ने कहा है कि वे कुछ करना चाहते हैं…हमें अनुचित नहीं होना चाहिए।’’ केंद्र के हलफनामे में कहा गया है कि उसका निर्णय औपनिवेशिक चीजों से छुटकारा पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों के अनुरूप है और वह नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के सम्मान के पक्षधर रहे हैं।
पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी शामिल हैं। पीठ ने कहा, “हमारे विशिष्ट सवाल दो मुद्दों को लेकर हूं। पहला लंबित मामलों के बारे में और दूसरा, यह कि सरकार भविष्य के मामलों पर कैसे गौर करेगी। ये दो मुद्दे हैं। और कुछ नहीं।’’
पीठ ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह बुधवार को केंद्र के रुख से अवगत कराएं। बुधवार को पीठ कुछ आदेश पारित कर सकती है।
कानून के संभावित ‘दुरुपयोग’ का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि यहां तक कि अटॉर्नी जनरल ने भी कहा था कि हनुमान चालीसा का पाठ करने पर भी किस प्रकार यह कानून लागू किया गया था। पीठ ने केंद्र से सवाल किया कि कानून पर पुनर्विचार करने में सरकार को कितना समय लगेगा।
इस पर, सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वह कोई सटीक समय नहीं बता सकते लेकिन प्रक्रिया शुरू की गई है।
सुनवाई की शुरुआत में, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने केंद्र की प्रतिक्रिया का विरोध करते हुए कहा कि अदालत को संवैधानिक चुनौती की सुनवाई रोकने के लिए नहीं कहा जा सकता है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दायर एक हलफनामे में कहा कि उसका निर्णय औपनिवेशिक चीजों से छुटकारा पाने के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचारों के अनुरूप है और वह नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के सम्मान के पक्षधर रहे हैं। हलफनामे में कहा गया है कि इसी भावना से 1,500 से अधिक अप्रचलित हो चुके कानूनों को समाप्त कर दिया गया है।
सर्वोच्च अदालत राजद्रोह संबंधी कानून की वैधता को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
भाषा
अविनाश माधव
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