नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) ने मृत्युदंड और उम्रकैद की सजा प्राप्त उन आदिवासी कैदियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए कार्यसमूह बनाने का फैसला किया है जो 14 साल तक कैद में रहने के बाद भी जेलों में बंद हैं।
आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भी पत्र लिखकर ऐसे कैदियों के बारे में जानकारी देने को कहा है।
आयोग ने एक याचिका पर ये निर्देश दिये हैं जिसमें दलील दी गयी थी कि आदिवासी समुदायों के अधिकतर दोषी ‘गरीब और निरक्षर’ हैं तथा अदालतों में सुनवाई के दौरान उन्हें उचित कानूनी सहायता नहीं मिल पाती या वे पैरोल और माफी के लिए अपील दायर नहीं कर पाते।
भारत में जो दोषी उम्रकैद या मृत्युदंड की सजा सुनाये जाने के बाद जेल में बंद होते हैं, उन्हें 14 साल तक कैद में रहने के बाद छूट मिल जाती है। अर्थात उन्हें शेष बची सजा काटने की जरूरत नहीं है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता और उच्चतम न्यायालय के वकील राधाकांत त्रिपाठी ने आयोग में याचिका दाखिल की है। उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है जिसमें इस तरह के कैदियों के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 161 (राज्यपाल के माफी के अधिकार और कुछ मामलों में सजा को निलंबित, माफ या कम करने से संबंधित) के तहत माफी के लिए स्वत: विचार किया जाए।
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