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Monday, 15 July, 2024
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FM सीतारमण का मांग बढ़ाने की जगह पूंजीगत खर्च पर ज़ोर देना अच्छा फैसला

बजट में पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) में भारी वृद्धि करने के साथ-साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर की कई परियोजनाओं की घोषणा की गई है ताकि निजी निवेश को बढ़ावा मिले और आर्थिक ‘रिकवरी’ तेजी से हो.

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वित्तमंत्री निर्मला सीतारामण ने वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट में पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) में भारी वृद्धि करने के साथ-साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर की कई परियोजनाओं की घोषणा की है ताकि निजी निवेश को बढ़ावा मिले और आर्थिक दशा सुधरे यानी उसमें ‘रिकवरी’ तेजी से हो. इसके अलावा उन्होंने कोविड महामारी से बुरी तरह प्रभावित सेक्टरों, मसलन मझोले व लघु मैनुफैक्चरिंग उपक्रमों (एमएसएमई) तथा आतिथ्य व्यवसाय के लिए राहत के उपायों की घोषणा भी की. सस्ते आवास के लिए भी उपाय किए गए हैं, जिनसे निवेश बढ़ाने और सब्सिडीज पर खर्च को कम करने में मदद मिलेगी.

कुल मिलाकर यह कि मांग और कीमतों में वृद्धि करने वाले उपभोग को प्रोत्साहन देने की जगह सरकार ने सप्लाई में सुधार करने पर ज़ोर देना जारी रखा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश से मांग को भी बढ़ावा मिलेगा और सप्लाई में भी सुधार होगा. इससे निजी निवेश में वृद्धि के साथ आर्थिक वृद्धि और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा. सरकार जनकल्याण कार्यक्रमों का विस्तार करने के दबाव के आगे नहीं झुकी, जिससे अल्पकालिक लाभ हो सकता था, बल्कि उसने आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर दिया है.

पूंजीगत खर्च और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर

निजी निवेश में जान न लौटती देख वित्तमंत्री ने पूंजीगत खर्च (कैपेक्स) को 2021-22 के 5.54 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2022-23 में 7.5 लाख करोड़ कर दिया. पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान को जोड़ दें तो प्रभावी ‘कैपेक्स’ 10.68 लाख करोड़ यानी जीडीपी के 4 प्रतिशत के बराबर हो जाएगा. यह अच्छी खबर है, खासकर इस्पात, सीमेंट, सड़क परिवहन और हाइवे, रेलवे और रक्षा जैसे सेक्टरों के लिए.

सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ‘कैपेक्स’ को ‘प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान’ के जरिए इस्तेमाल करना चाहती है. इसका ज़ोर सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों, जलमार्गों, और इंतज़ामों में सुधार पर होगा ताकि लोगों और सामान की आवाजाही में तेजी आए और भारत में कारोबार करने की लागत कम हो.

इसके अलावा, राज्य पूंजीगत खर्च बढ़ाएं, इसके लिए राज्यों को सहायता देने की स्कीम के लिए 2021-22 के बजट अनुमान में 10,000 करोड़ के आवंटन को 2022-23 के लिए 1 लाख करोड़ कर दिया गया है.


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राजस्व उगाही में उछाल, विनिवेश से आय नीची

मोदी सरकार की राजस्व आमद चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान में 17.88 लाख करोड़ थी जो संशोधित अनुमान में उछल कर 20.78 लाख करोड़ पर पहुंच गई. यह मजबूत टैक्स उगाही के कारण हुआ है. सरकार ने अपने बजट अनुमान में टैक्स से 15.45 लाख करोड़ की राजस्व उगाही का लक्ष्य रखा था, अब उसे उम्मीद है कि टैक्स से 17.65 लाख का राजस्व हासिल होगा. कॉर्पोरेट टैक्स के मद में बजट लक्ष्य से 16 फीसदी ज्यादा, और आयकर के मद में लक्ष्य से 10 फीसदी आमद होने की पूरी संभावना है.

सरकार की राजस्व उगाही शानदार रही है लेकिन विनिवेश से आमद जैसी ‘नॉन-डेट’ पूंजीगत प्राप्ति को 1.75 लाख करोड़ के बजट अनुमान से कम करके संशोधित अनुमान 78,000 करोड़ कर दिया गया है. इसका अर्थ यह है कि सरकार चालू वर्ष में विनिवेश का लक्ष्य नहीं हासिल कर पाएगी.

अगले, 2022-23 के वित्त वर्ष के लिए विनिवेश से 65,000 करोड़ की यथार्थपरक आमद का अनुमान है.

सरकारी उधार में वृद्धि

वित्तीय मोर्चे पर वित्तमंत्री ने उतार का अनुमान लगाया है और महामारी के चोट से उबर रही अर्थव्यवस्था को सहारा देने की जरूरत पर ज़ोर दिया है. बजट के मुताबिक वित्तीय घाटा यानी खर्च और आमदनी के बीच अंतर 2021-22 में 6.9 फीसदी से घटकर 2022-23 में 6.4 फीसदी हो जाएगा. इसका अर्थ यह होगा कि वित्तीय घाटा 2025-26 में 4.5 फीसदी पर पहुंचने की राह पर है. चालू वर्ष के लिए इसे 6.8 फीसदी से थोड़ा बढ़ाकर 6.9 फीसदी किया गया है.
राजस्व उगाही तो मजबूत रही लेकिन सरकारी खर्च 34.8 लाख करोड़ से बढ़कर 37.7 लाख करोड़ हो गया. 2.8 लाख करोड़ का ज्यादा खर्च मुख्यतः एअर इंडिया को नकदी के घाटे को पूरा करने के लिए दिए गए कर्ज, खाद्य और खाद सब्सिडी तथा मनरेगा के लिए आवंटन बढ़ाने के कारण हुआ है.

एमएसएमई को और राहत

सबसे ज्यादा झटका खाए सेक्टरों में से एक, एमएसएमई को इस बजट में ज्यादा लाभ देने का प्रस्ताव किया गया है. सरकार ने इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) को मार्च 2023 तक जारी रखने और उसे 50,000 करोड़ की ज्यादा गारंटी देने का फैसला किया है. इसके साथ इस स्कीम की कुल सीमा 4.5 लाख करोड़ से बढ़ाकर 5 लाख करोड़ कर दी गई है. यह महामारी के कारण अनिश्चित हुए आर्थिक माहौल से परेशान लघु कारोबारियों को मदद मिलेगी.

भारतीय स्टेट बैंक की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार, ईसीएलजीएस स्कीम ने 13.5 लाख एमएसएमई खातों को ‘एनपीए’ बनने से रोका. रिपोर्ट ने कहा है कि अगर ये इकाइयां एनपीए हो जातीं तो 1.5 करोड़ कामगार बेरोजगार हो जाते.

सब्सिडी में कमी

सभी तीन तरह की सब्सिडीज—खाद्य, खाद, और पेट्रोलियम—पर खर्च को अगले वित्त वर्ष के बजट अनुमानों में कम किया गया है. 2022-23 के बजट अनुमानों में 2021-22 के संशोधित अनुमानों के हिसाब से खाद्य पर सब्सिडी को 2.8 लाख करोड़ से घटाकर 2.06 करोड़ किया गया है. यानी यह उम्मीद की जा रही है कि परिवारों पर महामारी की जो मार पड़ी है उसका असर कम होगा, और अधिक सब्सिडी की जरूरत कम होगी.

सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और उधार को बढ़ावा देने के बाद सरकार को अब यह व्यवस्था करनी चाहिए कि निजी निवेशकों को सस्ती दरों पर पैसा उपलब्ध हो.

बजट के बाद अब विदेशी पूंजी की आवक को आसान बनाने और ग्लोबल बॉन्ड संकेतकों में समाहित करके, वित्त सेक्टर के साथ बैंकिंग तथा बॉन्ड बाज़ारों में सुधार किया जा सकता है. तब सार्वजनिक निवेश पर वित्तमंत्री द्वारा ज़ोर दिए जाने के साथ निजी ‘कैपेक्स’ में वृद्धि की जा सकती है.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडेय एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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