Tuesday, 5 July, 2022
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संसदीय पैनल ने कहा- धीमी टेस्टिंग और ख़राब कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग से कोविड मामलों में आया उछाल

पैनल ने ‘कम-विश्वसनीय’ एंटिजेन टेस्टों पर ज़रूरत से अधिक निर्भरता को लेकर भी आशंका जताई, और कहा कि इससे कोविड के खिलाफ लड़ाई पटरी से उतर सकती है.

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नई दिल्ली: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में कोविड-19 महामारी के शुरुआती दिनों में, कम टेस्टिंग और ख़राब कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग की वजह से, देश में कोविड मामलों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली.

शनिवार को उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू को पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया कि विशेष कैडर का भी, जिन पर ऐसे प्रकोप से निपटने का ज़िम्मा होता है पूरी तरह उपयोग नहीं किया गया.

पैनल ने ‘कम-विश्वसनीय’ एंटिजेन टेस्टों पर ज़रूरत से अधिक निर्भरता को लेकर भी आशंका जताई और कहा कि इससे सार्स-सीओवी-2 वायरस के खिलाफ लड़ाई, पटरी से उतर सकती है.

अपनी 123वीं रिपोर्ट में स्थाई समिति ने कहा, ‘समिति का मानना है कि देश में कोविड मामलों में हुए बेतहाशा इज़ाफे की वजह, ख़राब कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग और कम टेस्टिंग हो सकती है. समिति कम भरोसेमंद डायग्नोस्टिक टेस्टों के इस्तेमाल को लेकर भी चिंतित है, जिनसे ग़लत निगेटिव रिपोर्ट्स की संभावना बढ़ सकती है. हालांकि रैपिड एंटिजेन टेस्ट के जल्दी मिल सकते हैं, लेकिन ये गोल्ड स्टैंडर्ड आरटी-पीसीआर जितने भरोसेमंद नहीं हैं. ऐसे टेस्टों के बड़े पैमानों पर इस्तेमाल से, जिनकी ठोसता और संवेदनशीलता कम होती है, ग़लत निगेटिव नतीजे सामने आ सकते हैं, जिससे आगे चलकर कोविड-19 को रोकने की रणनीति, पटरी से उतर सकती है’.

समिति ने सरकार से आग्रह भी किया कि ‘आरटी-पीसीआर और किए जा रहे दूसरे डायग्नोस्टिक टेस्टों के मुक़ाबले, रैपिड एंटिजेन की सत्यता का मूल्यांकन किया जाए, ताकि देश में टेस्टिंग क्षमता की सही तस्वीर सामने लाई जा सके’.

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पैनल ने कहा कि उसकी ज़ोरदार सिफारिश है कि ‘ज़्यादा सही जांच के लिए, मंत्रालय देश में टेस्टिंग सुविधाओं में इज़ाफा करे’, और ‘अधिक भरोसेमंद आरटी-पीसीआर जांच के ज़रिए टेस्टिंग रेट में भी सुधार करे’.

स्थाई समिति के अध्यक्ष समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव हैं.


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‘कई ख़ामियां’

संसदीय समिति की रिपोर्ट सदन में रखी जाती है, लेकिन चूंकि महामारी के कारण इस साल, संसद का शीतकालीन सत्र बुलाए जाने की संभावना नहीं है, इसलिए इस रिपोर्ट को ऊपरी सदन के अध्यक्ष को सौंपा गया, ताकि आगे की कार्रवाई के लिए इसे सरकार को भेजा जा सके.

समिति ने शुरू में ही लॉकडाउन घोषित करने के लिए सरकार की सराहना की, और कहा कि इससे लोगों की ज़िंदगियां बचीं, लेकिन साथ ही उसने कहा कि ‘महामारी के खिलाफ लड़ाई में कई ख़ामियां थीं, जैसे कि इमर्जेंसी सप्लाई की चीज़ों में कमी, लालफीताशाही, टेस्टिंग किट्स की कमी और उनकी क्वालिटी, घरेलू उत्पादन में देरी वग़ैरह’.

लेकिन, रिपोर्ट में 25 मार्च को देशव्यापी कोविड-19 लॉकडाउन के बाद पैदा हुए संकट पर, उसने कोई ख़ास टिप्पणियां या सुझाव नहीं दिए, जिसमें हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को मजबूरन पैदल घर लौटना पड़ा था.

लेकिन इसमें महिला श्रमिकों समेत सभी प्रवासियों को पेश आईं, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं और आमदनी बंद होने का उल्लेख ज़रूर है.

स्वास्थ्य मंत्रालय की खिंचाई

पैनल ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से भी कहा कि वो एक नोट पेश करे कि महामारी के शुरुआती दिनों में दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में, कोविड मरीज़ों के लिए इतने कम बिस्तर क्यों आरक्षित किए गए.

राम मनोहर लोहिया अस्पताल में, 1,572 बिस्तरों में से केवल 242 बिस्तर कोविड के लिए समर्पित थे, जबकि सफदरजंग अस्पताल में 2,873 में से, सिर्फ 289 बेड्स कोविड-19 मरीज़ों के लिए आरक्षित थे.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘समिति की समझ से बाहर है कि केंद्र सरकार के अस्पतालों में, कोविड मरीज़ों के लिए इतनी कम बेड्स आरक्षित करने के पीछे क्या औचित्य था, ख़ासकर ऐसे समय में, जब राजधानी में कोविड मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी’.

समिति ने ये भी कहा कि उसे दिल्ली में, विशेष रूप से कोविड मरीज़ों के लिए, आरक्षित बेड्स की स्थिति से अवगत कराया जाए.

समिति ने रेल डिब्बों के कम उपयोग का भी उल्लेख किया, जिन्हें कोविड केयर सेंटर्स में तब्दील किया गया था, जबकि लोगों को अस्पताल में बेड्स लेने में मुश्किलें आ रहीं थीं. भारतीय रेलवे के पास 813 डिब्बे हैं, जिनमें 12,472 बेड्स हैं. लेकिन 21 जुलाई तक, इन कोविड केयर सेंटर्स में केवल 454 मरीज़ भर्ती हुए थे.

आईडीएसपी का कम उपयोग

समिति ने ये भी कहा कि महामारी के खिलाफ कार्रवाई में, नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल (एनसीडीसी), और इंटीग्रेटेड डिज़ीज़ सर्वेलेंस प्रोग्राम (आईडीएसपी) का भी, पूरी तरह उपयोग नहीं किया गया, हालांकि आईडीएसपी का काम ही, संक्रामक बीमारियों के प्रकोप पर नज़र रखना है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘समिति को लगता है कि एनसीडीसी-आईडीएसपी का, ज़्यादा कारगर ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए था, ख़ासकर इसलिए भी कि आईडीएसपी का एकमात्र लक्ष्य ही, प्रशिक्षित रैपिड रेस्पॉन्स टीमों (आरआरटीज़) के ज़रिए, किसी भी महामारी का उसके शुरुआती चरण में ही पता लगाना और उससे निपटना है. इसलिए समिति मज़बूती के साथ सिफारिश करती है कि बीमारी पर कारगर ढंग से क़ाबू पाने के लिए, एनसीडीसी की भूमिका और ज़िम्मेदारी में फिर से जान फूंकी जाए, और साथ ही केंद्रीय निगरानी इकाई (सीएसयू), राज्य निगरानी इकाइयों (एसएसयू), और ज़िला निगरानी इकाइयों (डीएसयू) को भी मज़बूत किया जाए’.

समिति ने स्वास्थ्य मंत्रालय से कहा कि आईडीएसपी को, मौजूदा नौ राज्यों- तमिलनाडु, कर्नाटक, गुजरात, पंजाब, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और राजस्थान- के बाहर भी शुरू किया जाए.

समिति ने सरकारी अस्पतालों में ओपीडी बंद होने की वजह से, कोविड के अलावा दूसरी बीमारियों से ग्रसित मरीज़ों को, हो रहीं परेशानियों पर भी चिंता ज़ाहिर की. समिति ने कहा कि महिला मरीज़ और पुरानी व जानलेवा बीमारियों के मरीज़ सबसे ज़्यादा परेशान हैं.

पैनल ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा गठित करने की हिमायत की

महामारी के संदर्भ में, समिति ने हेल्थकेयर डिलीवरी को सुगम बनाने के लिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज़ पर, भारतीय स्वास्थ्य सेवा के गठन की पुरज़ोर सिफारिश की. इसकी परिकल्पना राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य नीति 2017 में की गई थी, लेकिन ये कभी परवान नहीं चढ़ सकी.

पैनल ने ये भी कहा कि वैज्ञानिक शोध में लगे विभागों का बजट आवंटन बेहद कम है, और उसे तुरंत बढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

समिति ने कहा, ‘समिति को ये देखकर चिंता होती है कि वैज्ञानिक शोध में लगे दूसरे विभागों की अपेक्षा, स्वास्थ्य शोध विभाग का बजट आवंटन 2019-20 में सबसे कम- 1900 करोड़ रुपए रहा है. 2020-21 के लिए ये बजट थोड़ा सा बढ़कर 2,100 रुपए हो गया है. समिति ने अपनी 119वीं रिपोर्ट में, वर्ष 2020-21 के लिए स्वास्थ्य शोध विभाग के कम बजट आवंटन पर गहरी चिंता ज़ाहिर की थी, जो डीएचआर/आईसीएमआर की स्कीमों के अलग अलग हिस्सों के लिए, मांगी गई रक़म से काफी कम था. समिति ने इस बात पर रोशनी डाली थी कि इन स्कीमों के तहत आवंटन में कमी का, नई वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैबोरेटरीज़ स्थापित करने पर असर पड़ेगा’.

समिति ने इम्यूनिटी बढ़ाने का दावा करने वाले, आयुष उत्पादों के भ्रामक विज्ञापनों पर भी चिंता का इज़हार किया, और आयुष मंत्रालय को ऐसे विज्ञापनों पर नज़र रखने के लिए कहा.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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