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Thursday, 29 January, 2026
होमहेल्थइकोनॉमिक सर्वे 2026 : भारत के युवाओं में डिजिटल लत का खतरा, बैन नहीं बल्कि बैलेंस की ज़रूरत पर जोर

इकोनॉमिक सर्वे 2026 : भारत के युवाओं में डिजिटल लत का खतरा, बैन नहीं बल्कि बैलेंस की ज़रूरत पर जोर

सर्वे में कहा गया है कि डिजिटल लत पढ़ाई और कामकाज को नुकसान पहुंचा रही है और ध्यान भटकने, नींद की कमी और फोकस घटने के कारण युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही है.

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नई दिल्ली: संसद में गुरुवार को पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 में कहा गया है कि तेज़ी से ऑनलाइन होती दुनिया में रहने वाले भारत के युवाओं के लिए डिजिटल लत एक बड़ी और बढ़ती समस्या बन रही है. सर्वे में कहा गया है कि भारत को सिर्फ डिजिटल सुविधा देने पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार से जुड़ी सेहत की समस्याओं जैसे डिजिटल लत, कंटेंट की क्वालिटी, लोगों की भलाई पर पड़ने वाले असर और डिजिटल साफ-सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए.

सर्वे में कहा गया है, “जहां मोटापा और सही पोषण की कमी युवाओं के शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, वहीं डिजिटल लत उनके मानसिक और सामाजिक विकास को कमजोर करती है. ये सभी एक-दूसरे से जुड़ी समस्याएं हैं और अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य और मानव संसाधन को बचाने के लिए पॉलिसी की ज़रूरत को दिखाती हैं.”

सर्वे में यह भी कहा गया है कि डिजिटल सुविधा जहां पढ़ाई, नौकरी और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देती है, वहीं “बहुत ज्यादा और मजबूरी में किया गया इस्तेमाल आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी पहुंचा सकता है.” इसमें पढ़ाई के समय का नुकसान, काम की क्षमता में कमी, स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ना और जोखिम भरे ऑनलाइन व्यवहार से होने वाला आर्थिक नुकसान शामिल है.

सर्वे में डिजिटल लत को डिजिटल टूल्स से जुड़ा नशे जैसा व्यवहार बताया गया है. इसमें स्मार्टफोन, इंटरनेट, गेमिंग और सोशल मीडिया शामिल हैं.

इसे ज़रूरत से ज्यादा या मजबूरी में किए जाने वाले इस्तेमाल की आदत बताया गया है, जिससे परेशानी होती है और रोज़मर्रा के काम प्रभावित होते हैं. इसकी पहचान “लगातार, बहुत ज्यादा या जुनूनी तरीके से कंप्यूटर और इंटरनेट इस्तेमाल करने” से होती है.

यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब भारत में डिजिटल इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है और आर्थिक विकास को मजबूती दे रहा है. सर्वे के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में डिजिटल अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीय आय में योगदान 11.74 प्रतिशत था, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 13.42 प्रतिशत होने का अनुमान है.

सर्वे के अनुसार, भारत में इंटरनेट कनेक्शन की संख्या 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर 2024 में 96.96 करोड़ हो गई है. इसमें 5G की शुरुआत और भारतनेट फाइबर के जरिए 2.18 लाख ग्राम पंचायतों तक इंटरनेट पहुंचने का बड़ा योगदान है.

सर्वे के मुताबिक, 2025 तक 85.5 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन होगा, जिससे डिजिटल सुविधा लगभग हर घर तक पहुंच जाएगी.

इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि इंटरनेट का इस्तेमाल भी बहुत ज्यादा है. 2024 में 48 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स ऑनलाइन वीडियो देखते थे, 43 प्रतिशत सोशल मीडिया चलाते थे, 40 प्रतिशत ईमेल या म्यूजिक का इस्तेमाल करते थे और 26 प्रतिशत डिजिटल पेमेंट करते थे. संख्या के हिसाब से यह ओटीटी वीडियो और फूड डिलीवरी के करीब 40 करोड़ यूजर्स और सोशल मीडिया के करीब 35 करोड़ यूजर्स बनते हैं.

इतनी बड़ी डिजिटल पहुंच की एक कीमत भी है.

इसके अनुसार, डिजिटल लत ध्यान भटकने, नींद कम होने और फोकस घटने के कारण पढ़ाई और काम की क्षमता को नुकसान पहुंचाती है.

यह डिजिटल निर्भरता खास तौर पर 15 से 24 साल के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है. कई स्टडीज़ में सोशल मीडिया की लत के ज्यादा मामलों की पुष्टि हुई है.

सर्वे में कहा गया है कि यह समस्या चिंता, डिप्रेशन, कम आत्मविश्वास और साइबर बुलिंग के तनाव के रूप में सामने आती है. मजबूरी में फोन इस्तेमाल करना और गेमिंग डिसऑर्डर इस स्थिति को और खराब करते हैं. इसके कारण युवाओं को नींद की गंभीर दिक्कतें, गुस्से की समस्या और समाज से कटाव का सामना करना पड़ता है.

ग्लोबल प्रतिक्रिया

सर्वे में यह भी बताया गया है कि अलग-अलग देश डिजिटल लत से कैसे निपट रहे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गेमिंग डिसऑर्डर को अंतरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण (ICD-11) के तहत मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारी के रूप में माना है. इसका इस्तेमाल बीमारियों, स्वास्थ्य स्थितियों और मौत के कारणों को दर्ज करने और देशों के बीच आंकड़ों की तुलना के लिए किया जाता है.

ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट पर रोक लगा दी है. चीन ने असली नाम वाले सिस्टम के जरिए बच्चों के ऑनलाइन गेम खेलने के समय को सीमित किया है. सिंगापुर मीडिया की समझ और साइबर वेलनेस पर ध्यान देता है, जबकि ब्रिटेन में स्कूलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए डिजिटल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क है. कई देशों में कक्षा के अंदर स्मार्टफोन इस्तेमाल करने पर रोक है.

भारत ने क्या कदम उठाए

भारत में सुरक्षित इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर सीबीएसई के दिशा-निर्देश, शिक्षा में स्क्रीन टाइम के लिए प्रज्ञाता फ्रेमवर्क और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े नियम लागू किए गए हैं.

सर्वे के मुताबिक, 2022 में शुरू की गई राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन टेली-मानस (Tele-MANAS) को अब तक 32 लाख से ज्यादा कॉल मिल चुकी हैं. ऑनलाइन गेमिंग (नियमन) अधिनियम, 2025 के तहत पैसे लगाकर खेले जाने वाले ऑनलाइन गेम पर रोक लगाई गई है और ऐसे विज्ञापनों को भी सीमित किया गया है.

राज्य स्तर पर भी कुछ सरकारों ने स्कूल और समुदाय स्तर पर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं.

उदाहरण के तौर पर, केरल ने ‘डी-डैड’ (डिजिटल डी-एडिक्शन सेंटर) परियोजना शुरू की है, जिसका मकसद बच्चों में मोबाइल, सोशल मीडिया और गेमिंग की ज्यादा लत से निपटना है. इसके तहत मुफ्त काउंसलिंग, थेरेपी और विशेषज्ञों की मदद दी जाती है.

कर्नाटक ने भी मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल इस्तेमाल में संतुलन को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल डिटॉक्स सेंटर (DDC) – ‘बियॉन्ड स्क्रीन’ पहल शुरू की है.

आगे की राह

आगे की दिशा पर बात करते हुए सर्वे में कहा गया है कि भारत में डिजिटल लत को लेकर कोई पूरा राष्ट्रीय डेटा मौजूद नहीं है, जिससे सही और लक्ष्य आधारित कदम उठाने में परेशानी होती है. आने वाला राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे इस कमी को पूरा कर सकता है. इसमें स्क्रीन टाइम, नींद, चिंता, पढ़ाई के नतीजे और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े साफ संकेतकों की ज़रूरत बताई गई है.

रिपोर्ट में प्रतिबंध लगाने के बजाय संतुलन बनाने पर जोर दिया गया है. इसमें कहा गया है, “भारत की चुनौती यह है कि युवाओं की भागीदारी को दोबारा संतुलित किया जाए, जहां सुरक्षा से जुड़े नियम भी हों और ऑफलाइन सकारात्मक मौके भी मिलें, न कि तकनीक को पूरी तरह गलत बताया जाए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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