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Friday, 19 July, 2024
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प्राण प्रतिष्ठा में महिलाएं कहां हैं? दुर्गा वाहिनी ने कहा- पुरुषों का एकाधिकार है, हमें दरकिनार किया गया

राम जन्मभूमि आंदोलन के अंतिम चरण में अयोध्या में संघ की महिला पैदल सैनिक लगभग अदृश्य रही हैं. उनका दावा है कि पुरुषों ने उन्हें किनारे कर दिया है और सारे काम पर अपना एकाधिकार जमा लिया है.

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अयोध्या: कड़ी सर्दी में घने कोहरे का सामना करते हुए, एक दर्जन महिलाएं अयोध्या के जालपा देवी मंदिर में एकत्र हुई हैं. इस बैठक का मुद्दा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि 22 जनवरी को राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले और उसके दौरान महिलाओं की भूमिका क्या होगी?

यह सवाल थोड़ा मुश्किल है.

लंबे समय से, अयोध्या में हिंदू महिला समूह मांग कर रहे थे और मंदिर के उद्घाटन के लिए उन्हें काम सौंपे जाने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. अंत में, कार्यक्रम के केंद्रीय आयोजक, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने अपनी महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी को केवल एक काम सौंपा है – अयोध्या में हर घर का दौरा करना और परिवारों को बताना कि 22 जनवरी को क्या करना है. लेकिन असल में दुर्गा वाहिनी को खुद नहीं पता कि उस दिन क्या करना है.

अयोध्या में दुर्गा वाहिनी की अध्यक्ष वर्तिका बसु कहती हैं, “कोई भी हमारे पास नहीं आया है. यह अपमानजनक है. 90 के दशक में राम मंदिर का निर्माण सुनिश्चित करने के लिए महिलाएं सबसे आगे थीं. हमें गिरफ्तार कर लिया गया था. हमने अपने घर कारसेवकों के लिए खोल दिए. और आज, हमें भुला दिया गया है.”

अयोध्या में दुर्गा वाहिनी की सचिव सुनीता श्रीवास्तव ने कहा, “अगर वे हमें अनुमति देते हैं तो हम उद्घाटन के दिन जूते की व्यवस्था करने के लिए भी तैयार हैं.”

अयोध्या के किनारों पर स्थित छोटे, साधारण जालपा देवी मंदिर में, महिलाएं फर्श पर बैठ जाती हैं और बसु के विस्तृत निर्देशों को ध्यान से सुनती हैं कि जब वे घर घर जाती हैं तो परिवारों को क्या कहना है.

बसु ने अपना दाहिना हाथ बढ़ाते हुए घोषणा की, “उन्हें बताएं कि राम 500 साल बाद अयोध्या में अपने मंदिर में आ रहे हैं.” जैसे ही महिलाएं अपना सिर हिलाती हैं और निर्देश लिखने लगती हैं, बसु इधर-उधर टहलती हैं, कभी-कभी उनकी डायरियों पर नज़र डालते हुए कहती हैं “उन्हें अपने टीवी पर उद्घाटन समारोह देखते हुए दीये जलाने और प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करें.”

दुर्गा वाहिनी की अयोध्या शाखा की अध्यक्ष वर्तिका बसु | फोटो: उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

फिलहाल, जालपा देवी मंदिर उनका मुख्यालय है क्योंकि दुर्गा वाहिनी का अयोध्या में कोई कार्यालय नहीं है. राम जन्मभूमि आंदोलन के इस अंतिम चरण में महिलाओं की भूमिका नगण्य रही है. 1990 के दशक के विपरीत, राम मंदिर निर्माण की तैयारी में कोई स्पष्ट और मुखर उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा नहीं हैं. आरएसएस की महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी और राष्ट्रीय सेविका समिति दोनों के सदस्यों का कहना है कि उन्हें उन पुरुषों द्वारा दरकिनार कर दिया गया है जिन्होंने सभी कार्यों पर एकाधिकार कर लिया है.

दुर्गा वाहिनी सचिव सुनीता श्रीवास्तव, बसु के एक निर्देश को लिखते हुए कहती हैं, “अगर वे हमें अनुमति देते हैं तो हम अभिषेक के दिन जूते की व्यवस्था करने के लिए भी तैयार हैं. हम कोई भी काम करने को तैयार हैं.”

जहां पुरुष वीवीआईपी निमंत्रण, तम्बू निर्माण, जलपान और मेहमानों की सुरक्षा का प्रबंधन करते हैं, वहीं दुर्गा वाहिनी को दिसंबर 2023 में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के ट्रस्टियों के साथ एक बैठक के दौरान अपने वर्तमान कार्यभार के लिए संघर्ष करना पड़ा. दुर्गा वाहिनी के कई सदस्यों के लिए ‘देवी दुर्गा की बटालियन’, युद्ध में प्रशिक्षित और हिंदू महिलाओं में “कटर” (कट्टरपंथी) रुख पैदा करने के लिए है, जो एक पदावनति के समान है.

फिर भी, श्रीवास्तव समर्पण के साथ अयोध्या में निमंत्रण अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, जो 1 जनवरी को शुरू हुआ. वह कहती हैं, “2019 में राम मंदिर की तैयारी शुरू होने के बाद महिलाओं को दिया गया यह पहला काम है. बैठक के दौरान, चंपत राय (राम मंदिर ट्रस्ट महासचिव) ने कहा कि महिलाएं संचार कार्य बेहतर ढंग से संभालती हैं.”

प्राण प्रतिष्ठा के दिन भगवाधारी दुर्गा वाहिनी सदस्यों द्वारा अयोध्या की सड़कों पर कतार लगाते हुए, गणमान्य व्यक्तियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करने का महिलाओं का सपना धूमिल होता जा रहा है.


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महिलाओं की भागीदारी

यहां तक कि जालपा मंदिर की दर्जनों महिलाएं भी आसानी से एक साथ नहीं आईं.

बसु याद करती हैं कि आउटरीच मिशन से पहले प्रशिक्षण सत्र के लिए महिलाओं को इकट्ठा करना उनके लिए कितना कठिन था. बैठक स्थल की कमी के कारण कोई भी आने को तैयार नहीं था.

वह कहती हैं, ”आपस में कई दौर की चर्चा के बाद यह तय हुआ कि हमें राम मंदिर के लिए जालपा देवी मंदिर में मिलना चाहिए.”

मंदिर में एकत्र हुई महिलाओं ने बसु की हताशा को दोहराते हुए दावा किया कि उन्होंने बार-बार विहिप उपाध्यक्ष चंपत राय और अन्य संघ नेताओं से राम जन्मभूमि मिशन में अपनी भागीदारी के लिए एक स्पष्ट रोडमैप का अनुरोध किया था, लेकिन बदले में उन्हें केवल अस्पष्ट आश्वासन मिला. वे इस बात से सहमत हैं कि जिस बात ने उन्हें सबसे ज्यादा आहत किया, वह यह थी कि राम मंदिर उद्घाटन की तैयारियों के दौरान उन्हें हाशिए पर रखे जाना.

1992 में जब बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था तब कई दुर्गा वाहिनी सदस्य बच्चे थे या उनका जन्म भी नहीं हुआ था, लेकिन उन सभी ने अपनी मां, चाची, दादी और पड़ोसियों से आंदोलन की ‘नायिकाओं’ के बारे में सुना है. जब वे इसके बारे में बात करते हैं, तो ऐसा लगता है, माने वे खुद वहां मौजूद थे.

Sadhvi Ritambhara
दुर्गा वाहिनी की संस्थापक साध्वी ऋतंभरा | फोटो: फेसबुक/@Sadhvi Ritambhara

अपना नाम न छापने का अनुरोध करते हुए एक युवा महिला कहती है, “वह उमा भारती थीं जिन्होंने मंच से ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगाया था.”

श्रीवास्तव, जो उस समय केवल 11 वर्ष की थी, घटनाओं को स्पष्ट रूप से याद रखने का दावा करती हैं. वह कहती हैं, “साध्वी ऋतंभरा ने हमारे संगठन दुर्गा वाहिनी की स्थापना की. मुझे याद है कि उन्होंने हमसे दुर्गा का रूप धारण करने और मस्जिद विध्वंस में निडर होकर भाग लेने के लिए कहा था.” बसु भी मंदिर और उसके इंतजार के अलावा कुछ और याद नहीं कर पाती है. यहां तक कि उनकी हैलो ट्यून भी ‘युगों युगों का सपना था‘ पर सेट है, जो पीढ़ियों पुराने राम मंदिर के सपने के बारे में एक गाना है.

हालांकि, जब 2019 में हिंदुओं के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर निर्माण की बात आई, तो महिलाएं तस्वीर से गायब हो गईं. यहां तक कि आवश्यक ईंट-गारे के काम में भी, अयोध्या की महिलाओं को पत्थर गढ़ने और सिर पर सीमेंट की बोरियां ढोने जैसे कार्यों में धकेल दिया गया.

दिप्रिंट ने राम मंदिर के निर्माण और अभिषेक में महिलाओं की भागीदारी के बारे में पूछने के लिए उमा भरती से फोन पर संपर्क किया, लेकिन उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

नरेंद्र मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बीजेपी नेता और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती | फोटो: फेसबुक/@Uma Bharti

‘मेल ईगो’ आहत होता है

स्वाति सिंह 25 साल की थीं जब वह दुर्गा वाहिनी में शामिल हुईं. अयोध्या के एक सरकारी कॉलेज में सामाजिक विज्ञान की प्रोफेसर, वह एक खेल प्रेमी हैं और उन्हें निशानेबाजी, घुड़सवारी और तलवारबाजी में विशेष रुचि है. इसलिए, महिलाओं के लिए आत्मरक्षा और युद्ध कौशल पर दुर्गा वाहिनी का जोर उन्हें पसंद आया. सिंह कहती हैं, “इससे मुझे लगा कि अगर मैं ये सभी तकनीकें सीख लूं, तो मुझे अपनी सुरक्षा के लिए पुरुषों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. मैं अपनी सुरक्षा खुद कर सकती हूं.”

एक अन्य सदस्य, 29 वर्षीय दिव्यांका राठौड़ भी दुर्गा वाहिनी की तेजतर्रार छवि से आकर्षित थीं. वह अपने माता-पिता की अस्वीकृति के बावजूद संगठन की गतिविधियों में विवेकपूर्वक भाग लेती है. राठौड़ कहती हैं, ”ऐसी धारणा है कि दुर्गा वाहिनी लक्ष्यहीन महिलाएं हैं जिनके पास कोई वास्तविक काम नहीं है.”

दुर्गा वाहिनी सदस्य दिव्यांका राठौड़ ने कहा, “जब एबीवीपी, आरएसएस और वीएचपी के कार्यालय हो सकते हैं तो हमारे क्यों नहीं? उनका (पुरुषों का) अहंकार हमसे आहत होता है और यही कारण है कि वे महिलाओं को दरकिनार कर देते हैं.”

दिसंबर की शाम जैसे ही अयोध्या में अंधेरा छाता था, सिंह और राठौड़ वर्तिका बसु के साथ उनके दो मंजिला घर में आ जाते थे. बसु उन्हें दुर्गा वाहिनी के महत्व और 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान इसकी भूमिका को समझाने की कोशिश करते हैं.

बसु ने दो अन्य महिलाओं को भी उत्साहवर्धक बातचीत के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन वे नहीं आईं. वह कहती है कि वह सुबह 4 बजे उठती है, अपने परिवार के लिए खाना बनाती है, अखबार पढ़ती है और ठीक 10 बजे तक अपना आउटरीच काम शुरू कर देती है. लेकिन उसी समर्पण के साथ अन्य कार्यकर्ताओं को भर्ती करना मुश्किल है, यहां तक ​​कि उन 25 सदस्यों के बीच भी जिन्हें उन्होंने पिछले दो वर्षों में एक साथ इकट्ठा किया है.

अयोध्या में दुर्गा वाहिनी की महिलाएं निवासियों को ‘निमंत्रण’ के रूप में चावल और राम मंदिर की तस्वीरें वितरित करती हैं। वे निवासियों से टीवी पर समारोह देखने और ऐसा करते समय प्रार्थना करने के लिए कह रही हैं | फोटो: विशेष व्यवस्था द्वारा

बसु कहती हैं, “आग कहां गई? तुम दुर्गा हो. दुर्गा बनें और अपनी क्षमताओं को जानें.”

राठौड़ उन्हें घूरती है. वह तर्क देती हैं, “लेकिन इन दुर्गाओं को पैसा चाहिए तभी वो इससे जुड़ी रहेंगी और काम करेंगी. आखिर हमें अपने परिवार को भी तो पालना हैं.”

बसु रुकती है और निराशा में अपना सिर पकड़कर तेजी से कुर्सी पर बैठ जाती है.

वह कहती हैं, ”मैं आपके समर्थन के बिना अकेले दुर्गा वाहिनी नहीं चला सकती.” साथ ही वह यह भी स्वीकार करती हैं कि महिलाओं को कुछ प्रतिपूर्ति और सराहना की आवश्यकता है.

राठौड़ तीन साल पहले दुर्गा वाहिनी में शामिल हुई थी. वह बताती हैं कि वह एक समय उत्साह से भरी हुई थीं, लेकिन अब उनका मोहभंग हो गया है. काम मंदिर उद्घाटन पर भगवाधारी दुर्गा वाहिनी के सदस्यों द्वारा अयोध्या की सड़कों पर कतारें लगाते हुए, गणमान्य व्यक्तियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करने का उनका सपना धूमिल होता जा रहा है. वह कहती हैं, ”ऐसा अब कभी नहीं होगा.” उस हॉल से संगीत की धुनें आ रही हैं जहां बसु की बेटी और अन्य गायक उद्घाटन से पहले अयोध्या महोत्सव कार्यक्रम के लिए गाने का अभ्यास कर रहे हैं.

वीएचपी के वरिष्ठ नेता शरद शर्मा ने कहा, “महिलाओं को वही काम दिया गया जो वरिष्ठों को उनके लिए उपयुक्त लगा. वे हमारी माताएं और बहनें हैं और पूरे प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम का संचालन कर रही हैं.”

राठौड़ कहती हैं, “वर्तिका और सुनीता जैसे हमारे नेताओं को उद्घाटन के बाद महिला प्रतिभागियों की देखभाल करने के लिए कहा गया है. लेकिन हम अदृश्य रहेंगे, दूसरों की तरह ही टीवी पर देखेंगे.” वह कहती हैं, एकमात्र चीजें जो अब उनकी रुचि को पुनर्जीवित कर सकती हैं, वे हैं बुनियादी प्रतिपूर्ति, एक कार्यालय और वीएचपी से उचित स्वीकृति.

राठौड़ जाने के लिए अपना बैग उठाते हुए और उनका भाई अपनी मोटरसाइकिल का हॉर्न बजाता है, कहती हैं कि “जब एबीवीपी, आरएसएस और वीएचपी के कार्यालय हो सकते हैं, तो हमारे क्यों नहीं? उनका (पुरुषों का) अहंकार हमसे आहत होता है और यही कारण है कि वे महिलाओं को दरकिनार कर देते हैं.”

वीएचपी के कारसेवकपुरम के 10 एकड़ परिसर के भीतर, पुरुष साधुओं, वीएचपी सदस्यों और आरएसएस कैडरों के रहने के लिए कई अस्थायी टिन-छत वाले आश्रय स्थल बनाए गए हैं. लेकिन महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है, न ही कोई पोर्ट्रेट हैं.


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महिलाएं पहले परिवार संभाले, फिर समाज के लिए काम करें

जालपा देवी मंदिर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कारसेवकपुरम. एक समय यह कारसेवकों के लिए मिलन स्थल था, अब यह विहिप और उसके प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के लिए एक विशाल कार्यालय के रूप में खड़ा है. राम जन्मभूमि आंदोलन के नेताओं में से एक, दिवंगत पूर्व विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल के बड़े-बड़े पोर्ट्रेट प्रवेश स्तंभों पर हावी हैं.

10 एकड़ के परिसर के भीतर, पुरुष साधुओं, वीएचपी सदस्यों और आरएसएस कार्यकर्ताओं के रहने के लिए कई अस्थायी टिन-छत वाले आश्रय स्थल बनाए गए हैं. लेकिन महिलाओं के लिए कोई समर्पित स्थान नहीं है, न ही कोई पोर्ट्रेट हैं. दुर्गा वाहिनी के सदस्यों का दावा है कि कारसेवकपुरम में एक छोटे से कार्यालय के उनके अनुरोध को लगातार अस्वीकार कर दिया गया है.

अयोध्या में कारसेवकपुरम का प्रवेश द्वार | फोटो: उर्जिता भारद्वाज | दिप्रिंट

दुर्गा वाहिनी के एक सदस्य ने नाम न छापने का अनुरोध करते हुए कहा, “बैठकों के दौरान हमें बताया जाता है कि महिलाओं को पहले अपने परिवार की देखभाल करनी चाहिए और फिर समाज के लिए काम करना चाहिए.”

कारसेवकपुरम में वीएचपी सदस्य इसका श्रेय अपने वैचारिक रुख को देते हैं.

एक विहिप पदाधिकारी ने अपनी पहचान उजागर न करने के आग्रह पर कहा, “हमारी संस्कृति और हमारे द्वारा प्रदान की जाने वाली विचारधारा में, महिला और पुरुष एक ही परिसर में काम नहीं कर सकते हैं. हम उनके कार्यालय के लिए एक जगह की तलाश कर रहे हैं.”

हालांकि, विडंबना यह है कि कारसेवकपुरम वह जगह है जहां वीएचपी महिलाओं के लिए हथियार प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित करती है. ये शौर्य प्रशिक्षण शिविर, या ‘वीरता प्रशिक्षण शिविर’, पूरे भारत में आरएसएस और वीएचपी के विभिन्न परिसरों में होते हैं.

अयोध्या में दुर्गा वाहिनी की अध्यक्ष वर्तिका बसु ने कहा, “महिलाएं VHP परिसर में रहती हैं और उन्हें लाठी, तलवार और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है.”

बसु ने कहा, “हर साल, हमारे पास 10 दिनों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम होता है. 2022 में ये गुजरात में था. 2023 में कारसेवकपुरम में था. महिलाएं वीएचपी परिसर में रहती हैं और उन्हें लाठी, तलवार और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. उन्हें धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है और अन्य हिंदू महिलाओं को भी “कट्टर” बनाने का कौशल दिया जाता है.”

श्रीवास्तव ने सवाल किया, “जब महिलाओं को पुरुषों की तरह समाज में बुराइयों से लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. फिर उन्हें अलग क्यों किया जाता है?”

पिछले 30 वर्षों में उन्हें उस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला है.

राम जन्मभूमि क्षेत्र ट्रस्ट के प्रमुख चंपत राय के करीबी सहयोगी, वरिष्ठ विहिप नेता शरद शर्मा का कहना है कि महिलाओं को प्राण प्रतिष्ठा से संबंधित कार्य दिए गए हैं जो उनके कौशल से मेल खाते हैं.

शर्मा बताते हैं, ”महिलाओं को वह काम दिया गया है जो वरिष्ठों ने उनके लिए उपयुक्त समझा था. हालांकि उन्हें दुर्गा वाहिनी अध्यक्ष का नाम याद करने में कठिनाई हो रही है, वे कहते हैं, “वे हमारी माताएं और बहनें हैं और पूरे अभिषेक कार्यक्रम का संचालन कर रही हैं.”

‘पुरुष इसे बेहतर तरीके से कर सकते हैं’

वर्तिका बसु को 2021 में दुर्गा वाहिनी का अयोध्या अध्यक्ष बनाया गया था. इससे पहले, वह संगठन के ग्रामीण (ग्राम) विभाग की प्रमुख थीं, जो मंदिरों में युवा महिलाओं से जुड़ती थीं और उन्हें हिंदू नारीत्व पर मार्गदर्शन करती थीं. वह भर्ती के प्रति उत्साही थी. एक नोटबुक के साथ, बसु उन लड़कियों के नाम और फोन नंबर लिखती थी जिनसे वह मिलती थी और यहां तक कि उनके माता-पिता से संपर्क करके उन्हें दुर्गा वाहिनी में शामिल होने के लाभों के बारे में समझाती थी.

बसु याद करती हैं, “मैं माता-पिता से कहती थी कि दुर्गा वाहिनी उनकी बेटियों को धार्मिक, मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाएगी. मैं उन्हें अपने फ़ोन पर सदस्यों के वीडियो दिखाती थी.”

उस समय, बसु अयोध्या से सटे गांवों में काफी प्रसिद्ध थी और संघ नेतृत्व ने भी इस पर ध्यान दिया था. लेकिन अयोध्या नगरी में जो पदोन्नति मानी जा रही थी, वह गहरी निराशा साबित हुई. विहिप नेतृत्व ने उनकी उपेक्षा की और उन्हें बैठकों की मेज पर अपनी जगह के लिए संघर्ष करना पड़ा.

बसु और श्रीवास्तव ने भी अयोध्या में दुर्गा वाहिनी में नई जान फूंकने का बीड़ा उठाया. बसु ने कहा, ”हमने महसूस किया कि यहां महिलाओं में उत्साह की कमी है और उनके लिए कोई रास्ता नहीं है.”

हालांकि, उनके ठोस प्रयासों के बावजूद बहुत कम बदलाव आया है. सुनीता कहती हैं, ”जब भी हमें जरूरत होती है, वीएचपी हमें बैठक के लिए बुलाती है और तभी हम महिलाएं मिलती हैं और एक-दूसरे का अभिवादन करती हैं.” वह कहती हैं, कार्यालय के लिए उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिए जाने और ऐसी ही एक बैठक में पूरे कमरे में सन्नाटा छा जाने की याद आज भी चुभती है.

सुनीता दूसरे परिवार को आमंत्रित करने के लिए निकलते हुए कहती हैं, “ऐसा महसूस होता है जैसे हमारा अस्तित्व ही नहीं है. राम जन्मभूमि आंदोलन में हमारी भूमिका पर कोई इतिहास की किताबें नहीं हैं.”

आरएसएस की राष्ट्र सेविका समिति की भी ऐसी ही कहानी है. अयोध्या में संगठन की एक प्रमुख सदस्य सोनाली गौड़ कहती हैं कि महिलाएं निराश थीं कि उन्हें कोई महत्वपूर्ण काम नहीं दिया गया, लेकिन वह तुरंत कहती हैं कि वे बड़ी ज़िम्मेदारियां संभालने में भी सक्षम नहीं थीं. वह बताती हैं कि राम मंदिर भक्तों के लिए खुलने के बाद, संघ की महिलाएं अयोध्या आने वाली महिला साध्वियों की देखभाल करेंगी.

गौर कहती हैं, “शिकायत करने का कोई मतलब नहीं है. यह राम का काम है. यह निराशाजनक है लेकिन मेरा मानना है कि पुरुष इसे बेहतर कर सकते हैं. और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए.”

(संपादन: अलमिना खातून)
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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