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Friday, 6 February, 2026
होमफीचरलैब में बना लेदर और भविष्य की फैक्ट्रियां: एक स्टार्टअप जो भारत को बायोसाइंस पावर बनाना चाहता है

लैब में बना लेदर और भविष्य की फैक्ट्रियां: एक स्टार्टअप जो भारत को बायोसाइंस पावर बनाना चाहता है

10 साल की कड़ी रिसर्च के बाद, गुरुग्राम का बायोसाइंस स्टार्टअप एब्सोल्यूट आखिरकार अपनी ज़बरदस्त साइंस को मार्केट में ला रहा है. 'इकोनॉमिक्स, जीनोमिक्स से ज़्यादा ज़रूरी है.'

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गुरुग्राम: अगम खरे मेज़ पर रखी एक खुरदरी, भूरे रंग की शीट उठाते हैं. यह दिखने और छूने में बिल्कुल चमड़े जैसी लगती है. वही चमड़ा, जिससे हैंडबैग, जूते, कार सीट, काठी, बटुए और लगेज बनाए जाते हैं. लेकिन यह चमड़ा किसी जानवर की खाल से नहीं काटा गया है. न ही यह प्लास्टिक या पौधों से बना नकली चमड़ा है.

यह ‘बायो लेदर’ एक बायोटेक्नोलॉजी क्रांति का हिस्सा है, जो खेती से लेकर लग्जरी ब्रांड तक सब कुछ बदलने वाली है. प्रकृति से चीज़ें लेने के बजाय, वैज्ञानिक उसके मॉलिक्यूलर ब्लूप्रिंट को फिर से बना रहे हैं.

“हम इसे उगाते हैं. हम ठीक उसी तरह बायोलॉजी के ज़रिये बनाते हैं, जैसे जानवर की त्वचा बनती है, और उसी से यह लेदर तैयार होता है,” 35 वर्षीय अगम खरे कहते हैं, जो एब्सोल्यूट नाम की बायोटेक कंपनी के संस्थापक हैं. “यह सिंथेटिक नहीं है, क्योंकि इसमें ज़रा भी केमिस्ट्री का इस्तेमाल नहीं हुआ है.”

बायो लेदर बनाने के लिए चुने हुए माइक्रोबियल कल्चर को कंट्रोल्ड लैब माहौल में पाला जाता है, जब तक वे मोटी शीट का रूप न ले लें. इसके बाद इन शीट्स को टैनिंग जैसी प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है, ताकि ये जानवरों के चमड़े की तरह ही व्यवहार करें.

असल में, एब्सोल्यूट एक डीप बायोलॉजी कंपनी है, जो यह समझने की कोशिश कर रही है कि प्रकृति अपने नतीजे कैसे तैयार करती है. एक ही पेड़ पर एक सेब दूसरे से बड़ा, ज़्यादा मीठा या गहरे रंग का कैसे हो जाता है. किसानों के लिए इसका मतलब होता है पैदावार, गुणवत्ता और आखिरकार आमदनी. और अगर बायोलॉजी एक सेब की क्वालिटी तय कर सकती है, तो लेदर की क्यों नहीं.

इन सवालों के जवाब सचमुच खरे के गुरुग्राम ऑफिस की मेज़ पर रखे हैं.

खरे अपनी इस रिसर्च को तीन क्षेत्रों में लागू कर रहे हैं. खेती, प्रोटीन और लंबी उम्र से जुड़ी तकनीक, और मटीरियल. दुनिया भर के अलग-अलग इलाकों से जुटाए गए 50,000 से ज़्यादा प्रकृति-आधारित तत्व, जैसे बैक्टीरिया, फंगस और वनस्पति अर्क, एक डेटाबेस में रखे गए हैं. इसी के ज़रिये उनकी टीम बायोफर्टिलाइज़र से लेकर व्हे प्रोटीन तक के प्रोडक्ट तैयार कर रही है.

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एब्सोल्यूट लैब कंपनी के ऑफिस स्पेस के ठीक पीछे, उसी फ्लोर पर है. वैज्ञानिक ऑपरेशंस और सेल्स के साथ मिलकर काम करते हैं | फोटो: उदित हिंदुजा | दिप्रिंट

ऑफिस के पीछे लैब में प्रयोग पूरी रफ्तार से चल रहे हैं. मेज़ पर रंग-बिरंगे पेट्री डिश रखे हैं, जिनमें से एक में फफूंद रोधी क्षमता की जांच हो रही है. दूसरी मेज़ पर कागज़ के कपों में पौधे उग रहे हैं, जिनमें हर एक को अलग-अलग जैविक तत्व दिए गए हैं. कुछ पौधे सामने रखे कंट्रोल प्लांट से कहीं ज़्यादा लंबे हो चुके हैं.

निवेशकों को नतीजे दिखे हैं, तो फंडिंग भी आने लगी है. पूरा इकोसिस्टम अब बायोटेक्नोलॉजी की अहमियत समझने लगा है. निवेशकों ने एब्सोल्यूट की बौद्धिक संपदा को समझने में चार महीने लगाए और इसकी कीमत करीब आधा अरब डॉलर आंकी. 2022 में कंपनी ने सिकोइया कैपिटल (अब पीक XV पार्टनर्स), अल्फा वेव और टाइगर ग्लोबल जैसी वेंचर कैपिटल फर्मों से 100 मिलियन डॉलर जुटाए.

भारत सरकार का डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नोलॉजी (DBT) इस क्षेत्र में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए पॉलिसी सपोर्ट दे रहा है. 2024 में लॉन्च की गई BioE3 (बायोटेक्नोलॉजी फॉर इकोनॉमी, एनवायरनमेंट, एंड एम्प्लॉयमेंट) पॉलिसी, क्लाइमेट चेंज को कम करने, फूड सिक्योरिटी और इंसानी स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में ‘बायोलॉजी के इंडस्ट्रियलाइज़ेशन’ को प्राथमिकता दे रही है.

“हमारी भूमिका यह है कि इस क्षेत्र की सभी गतिविधियों को एक साथ लाया जाए, ताकि वे मिलकर काम करें,” बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सचिव राजेश एस गोखले कहते हैं. “स्टार्टअप, बड़ी कंपनियां, इनोवेशन हब, रिसर्च संस्थान, ये सब अलग-अलग काम नहीं कर सकते.”

भारत को अपनी 1 लाख करोड़ रुपये की रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड से भी नई खोजें देखने को मिल सकती हैं. यह फंड निजी क्षेत्र को अत्याधुनिक रिसर्च के लिए प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है.

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एब्सोल्यूट द्वारा उगाया गया बायो-लेदर COP28 में पेश किया गया | फोटो: इंस्टाग्राम/@goabsolute

“जब मैं आज देश को देखता हूं, तो मुझे ऐसे बहुत कम खिलाड़ी दिखते हैं जो गहराई से आरएंडडी में लगे हों,” खरे कहते हैं. “एब्सोल्यूट को ट्रायल, रिसर्च और रेगुलेटरी मंज़ूरी पूरी करने में दस साल लगे. इसकी एक वजह यह भी थी कि इकोसिस्टम में ऐसे निवेशक नहीं थे जो साथ देने को तैयार हों. RDIF फंड से बहुत कुछ बदलेगा.”

लैब में प्रकृति की फैक्ट्रियां बनाना

खरे अपनी कंपनी के विज्ञान को समझाने में माहिर हैं. सालों की रिसर्च और निवेशकों को पिच करने का अनुभव इसमें मदद करता है. वे एक काला मार्कर उठाते हैं, व्हाइटबोर्ड टेबल पर ड्रॉ करना शुरू करते हैं और कंपनी के इंजन, यानी नेचर इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म, को समझाते हैं.

“हमारी दुनिया में कई चरम इलाके हैं, जैसे ज्वालामुखी क्षेत्र, ग्लेशियर, मैंग्रोव, समुद्र, जंगल, रेगिस्तान,” खरे कहते हैं और हर एक के लिए एक बॉक्स बनाते हैं. “हम इन जगहों पर जाते हैं, सैंपल इकट्ठा करते हैं और उन्हें डिकोड करते हैं.”

उनकी टीम आर्कटिक से लेकर गंगा नदी घाटी तक से सैंपल ला चुकी है. इनमें वनस्पति अर्क, माइक्रोबियल जीवन रूप जैसे बैक्टीरिया और फंगस, प्रोटीन, पेप्टाइड, एंजाइम और यहां तक कि आरएनए जैसी जेनेटिक सामग्री भी शामिल है. इस जैविक टूलबॉक्स को NIP में डाला जाता है और उसका अध्ययन किया जाता है.

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अगम खरे बताते हैं कि कैसे बैक्टीरिया, फंगस और यीस्ट प्रकृति की माइक्रोफैक्ट्री के तौर पर काम करते हैं | फोटो: उदित हिंदुजा | दिप्रिंट

कंपनी के चीफ साइंस ऑफिसर डॉ. प्रशांत खरे कहते हैं, “हम देखते हैं कि इनमें कौन-से गुण हैं, वे किसके साथ मेल खाते हैं और किसके खिलाफ काम करते हैं.” कुछ अर्क में एंटीबायोटिक या कीट नियंत्रण के गुण होते हैं. कुछ उर्वरक के बेहतर इस्तेमाल में मदद करते हैं या पौधों की बढ़त को तेज़ करते हैं.

आज NIP में 50,000 अनोखे, प्रकृति-आधारित तत्व हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ 35 ही प्रोडक्ट का रूप ले पाए हैं. यह दिखाता है कि बायोटेक्नोलॉजी में कितना ट्रायल-एंड-एरर, गहरी रिसर्च और सख़्त गुणवत्ता जांच लगती है.

खरे धैर्य के साथ समझाते हैं कि ये इनपुट कैसे प्रोडक्ट बनते हैं. वे कहते हैं कि यह गुण उन्हें शायद अपनी मां से मिला है, जो एक शिक्षिका थीं.

“आपके पेट में खरबों माइक्रोब रहते हैं. आपके पेट में जो भी एंजाइम निकलते हैं, वे इसलिए निकलते हैं क्योंकि कोई माइक्रोब तय करता है कि उसे किस तरह काम करना है,” वे कहते हैं.

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फर्मेंटेशन लैब का इस्तेमाल दूसरे प्रोडक्ट्स के अलावा प्रोटीन उगाने के लिए किया जाता था. एब्सोल्यूट ने भारत में कमर्शियली व्हे प्रोटीन सिंथेसाइज़ किया है | फोटो: उदित हिंदुजा | दिप्रिंट

पौधों का भी अपना माइक्रोबायोम होता है. उनके आसपास बैक्टीरिया, फंगस और यीस्ट होते हैं, जो उन्हें कीटों से बचाते हैं, पोषक तत्व सोखने में मदद करते हैं और उनकी बढ़त, रंग और पैदावार तय करते हैं. बड़ी मशीनों की जगह प्रकृति अरबों सूक्ष्म कामगारों का इस्तेमाल करती है.

एब्सोल्यूट ने इसी से सीख ली है. बैक्टीरिया, यीस्ट और फंगस को सूक्ष्म फैक्ट्रियों की तरह इस्तेमाल कर, और उनके काम करने का माहौल दोबारा बनाकर, कंपनी जैविक प्रक्रियाओं को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से दिशा देती है. जब किसी माइक्रोब का काम समझ में आ जाता है, तो उसकी जेनेटिक संरचना में हल्का बदलाव किया जाता है.

“हमें जेनेटिक एडिटिंग में गहरी महारत हासिल है,” प्रशांत लैब का दौरा कराते हुए कहते हैं. “हम उसे ऐसा आउटपुट देने लायक बनाते हैं, जिसकी हमें ज़रूरत होती है.”

ये आउटपुट कीटनाशकों से लेकर प्रोटीन प्रोडक्ट और लेदर तक होते हैं.

बड़ा बाज़ार ब्रेकथ्रू

कॉन्फ्रेंस रूम के एक कोने में खेती से जुड़े कई प्रोडक्ट रखे हैं. बायोपेस्टिसाइड, बायोस्टिमुलेंट, बायोफर्टिलाइज़र. यहीं कंपनी की साइंस सबसे पहले बाज़ार तक पहुंची है, ‘इनेरा’ ब्रांड नाम के तहत.

“हम प्रकृति की समझ का इस्तेमाल करके हानिकारक केमिकल कीटनाशकों के विकल्प बनाते हैं, जो आखिरकार आपके खाने में जाते हैं,” खरे बायोफर्टिलाइज़र का एक पैकेट हाथ में लेते हुए कहते हैं. “हमारा एक बड़ा मिशन यह है कि इस सारी केमिस्ट्री को बायोलॉजी से कैसे बदला जाए?”

खरे को यह गलतफहमी नहीं है कि उनके बायो प्रोडक्ट बाज़ार में आने वाले पहले प्रोडक्ट हैं. लेकिन उनके मुताबिक, कई कंपनियां ‘सस्टेनेबिलिटी’ का लेबल लगाकर यह छुपाती रहीं कि उनके प्रोडक्ट केमिकल विकल्पों जितना अच्छा प्रदर्शन नहीं करते.

“पहले दिन से हमने दो नियम तय किए,” एक अनुभवी फाउंडर के भरोसे के साथ खरे कहते हैं. “पहला, परफॉर्मेंस सस्टेनेबिलिटी जितनी या उससे ज़्यादा अहम है. दूसरा, इकॉनॉमिक्स, जीनोमिक्स से ऊपर है.”

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एब्सोल्यूट के R&D डायरेक्टर डॉ. प्रशांत खरे (बाएं) टेस्टिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली मल्टी-कलर पेट्री डिश दिखा रहे हैं | फोटो: उदित हिंदुजा | दिप्रिंट

कंपनी ने खेती के क्षेत्र में करीब तीन लाख प्रयोग किए, जिनसे आखिरकार सिर्फ 11 प्रोडक्ट निकले. ज़्यादातर आर्थिक तौर पर टिकाऊ नहीं थे. लेकिन जो टिक पाए, उनसे एब्सोल्यूट ने पिछले 15 महीनों में 15 से 20 मिलियन डॉलर की कमाई की है.

एब्सोल्यूट के वैज्ञानिकों की टीमें अलग-अलग किसान समूहों से मिलीं और प्रोडक्ट की असरदार क्षमता दिखाई.

“जब उन्होंने खुद देखा, तब उन्हें भरोसा हुआ,” खरे कहते हैं. वे जोड़ते हैं कि दुनिया की कुछ बड़ी एगकेम कंपनियों ने इन प्रोडक्ट्स को ग्लोबल ले जाने के लिए समझौते किए हैं.

एक राष्ट्रवादी एजेंडा

जब खरे बताते हैं कि एब्सोल्यूट क्यों मौजूद है, तो उनकी वैज्ञानिक सटीकता देशभक्ति की सोच से जुड़ जाती है. वे भारत के अस्थिर सब्सिडी खर्च, देसी बौद्धिक संपदा की कमी और चीन से मुकाबले की ज़रूरत की बात करते हैं. सस्टेनेबिलिटी उनके मिशन का सिर्फ एक हिस्सा है.

“बायोफर्टिलाइज़र केमिकल खाद की पूरी जगह नहीं ले सकते, लेकिन मौजूदा यूरिया, डीएपी, एमओपी जैसे उर्वरकों का बोझ काफी हद तक कम कर सकते हैं,” वे सोच में डूबे हुए कहते हैं. “सरकार इन पर अरबों डॉलर की सब्सिडी देती है. हम यह कब तक करते रहेंगे?”

एब्सोल्यूट के CEO और फाउंडर अगम खरे ने कहा कि कंपनी अपने प्रोडक्ट्स बनाने के लिए ‘प्रकृति की समझ’ का इस्तेमाल करती है | विशेष व्यवस्था

उनकी दूसरी शिकायत यह है कि भारत में आईपी यानी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी तैयार नहीं हो रही. मौजूदा कीटनाशक कंपनियां, जैसे बायर (जर्मनी), कॉर्टेवा (अमेरिका), एफएमसी (अमेरिका), भारत में मौजूद हैं, लेकिन “आईपी की वैल्यू बाहर बैठी है.”

उनके लिए आत्मनिर्भरता एक आर्थिक मजबूरी है.

“कल को कोई भू-राजनीतिक बदलाव हो सकता है और सप्लाई रुक सकती है,” वे कहते हैं. “हमारी कंपनी का दूसरा बड़ा सिद्धांत यह है कि चाइना प्लस वन की समस्या को कैसे हल किया जाए.”

एब्सोल्यूट में फर्मेंटेशन उपकरण | फोटो: उदित हिंदुजा | दिप्रिंट

खरे चीन से सीधे मुकाबला करना चाहते हैं. उनके मुताबिक, आज चीन सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को अपनी साइंस और कम लागत वाले उत्पादन से पछाड़ रहा है. उनकी महत्वाकांक्षा है कि कम से कम खेती, हेल्थ और मटीरियल के क्षेत्र में उसका विकल्प खड़ा किया जाए.

प्रोटीन की अगली जंग

व्हे प्रोटीन इसकी शुरुआत है.

भारत अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए ज़्यादातर स्पोर्ट्स-ग्रेड व्हे प्रोटीन अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप से आयात करता है, क्योंकि देश में बने कंसन्ट्रेट और आइसोलेट की कमी है.

“व्हे प्रोटीन की हालत देखिए. भारत में हम थोड़ा-सा व्हे बनाते हैं, लेकिन ज़्यादातर आयात करते हैं और यूरोप पर निर्भर हैं,” खरे कहते हैं. “आज हमने भारत में व्हे प्रोटीन को व्यावसायिक तौर पर सिंथेसाइज़ कर लिया है.”

उन्होंने यह भी दावा किया कि एब्सोल्यूट दुनिया की सिर्फ दो या तीन ऐसी कंपनियों में से एक है, जिनके पास यह क्षमता है. इतना ही नहीं, उनका कहना है कि उनका प्रोटीन उत्पादन किसी भी चीनी कंपनी से सस्ता है.

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एब्सोल्यूट की लैब में एक साइंटिस्ट। कंपनी में लगभग 300 लोग काम करते हैं, जिनमें 80 से ज़्यादा साइंटिस्ट शामिल हैं | फोटो: इंस्टाग्राम/@goabsolute

प्रोटीन प्रोडक्ट अभी प्री-लॉन्च स्टेज में हैं और कंपनी ने हाल ही में कमर्शियलाइजेशन शुरू किया है. लेकिन खरे के मुताबिक, कंपनी के पास पहले ही 30 मिलियन डॉलर से ज़्यादा के एलओआई हैं.

फर्मेंटेशन से बनने वाले प्रोटीन का बाज़ार बहुत बड़ा है. 2034 तक इसके 100 बिलियन डॉलर से ऊपर जाने का अनुमान है. और व्हे प्रोटीन सिर्फ एक तरह का प्रोटीन है, जिस पर एब्सोल्यूट काम कर रहा है. बाकी दो हैं, एक एंटी-इंफ्लेमेटरी एंज़ाइम और दूसरा चीनी का विकल्प.

“यह ऐसा प्रोटीन है, जिसका स्वाद बिल्कुल चीनी जैसा है और यह चीनी की जगह ले सकता है. और हर 1,000 किलो चीनी के लिए सिर्फ 1 किलो इस प्रोटीन की ज़रूरत होगी,” खरे कहते हैं. वे जोड़ते हैं कि फार्मा कंपनियों से शुरुआती मांग भी आ चुकी है.

बायो लेदर से ‘दुनिया को टक्कर’

वे लेदर और लग्ज़री प्रोडक्ट के भविष्य को भी बदल रहे हैं. न जानवरों से, न केमिकल से, बल्कि माइक्रोबियल फर्मेंटेशन से.

मटीरियल कैटेगरी में यह ऐसा प्रोडक्ट है, जो दिखने और व्यवहार में असली जैसा है, लेकिन अपनी एक अलग श्रेणी बनाता है. खरे मेज़ पर रखी शीट की तरफ देखते हैं.

“हमने इसके लिए अभी कोई नया नाम नहीं रखा है. अभी भी इसे बायो लेदर ही कहते हैं,” वे हल्की मुस्कान के साथ कहते हैं.

खरे ने अभी इसका कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू नहीं किया है. “यह अभी हमारी प्राथमिकता नहीं है.” लेकिन शुरुआती प्रयोगों के नतीजे काफ़ी प्रभावशाली रहे हैं. वे एक ‘स्नेकस्किन’ जूता उठाते हैं. इसके हर हिस्से को, फीते छोड़कर, कंपनी ने खुद लैब में उगाया है.

“लेदर के बाज़ार में तीन तरह की कंपनियां हैं. जानवरों से बना लेदर, पीयू और पीवीसी यानी प्लास्टिक लेदर, और प्लांट-बेस्ड लेदर, जहां पपीता, अनानास, केला या कैक्टस की त्वचा से लेदर बनाया जाता है,” खरे अपने प्रोडक्ट को नवजात बच्चे की तरह हाथ में पकड़े हुए कहते हैं.

Microbial cultures grown at Absolute’s lab | Photo: Instagram/@goabsolute
एब्सोल्यूट की लैब में उगाए गए माइक्रोबियल कल्चर | फोटो: इंस्टाग्राम/@goabsolute

खरे का तर्क है कि इनमें से कई विकल्प समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, जबकि जानवरों का लेदर हवा, गर्मी और ठंड सब झेल सकता है. एब्सोल्यूट ने जैविक प्रक्रियाओं से जानवरों की त्वचा बनने के तरीके की नकल की है.

उनके मुताबिक, दुनिया के बड़े लग्ज़री ब्रांड पहले ही उनके बायो लेदर में दिलचस्पी दिखा चुके हैं.

“लेदर का वैश्विक बाज़ार 400 बिलियन डॉलर का है,” वे कहते हैं. “आज भारत ऐसी मज़बूत स्थिति बना रहा है, जहां एक ही प्रोडक्ट पूरी दुनिया को टक्कर दे सकता है.”

टियर-3 से ‘थर्ड वेव’ साइंस तक

बायोसाइंस की सीमाएं आगे बढ़ाने से पहले, खरे राजस्थान के खेतड़ी नगर में पले-बढ़े एक छोटे शहर के लड़के थे. यह एक टियर-3 कस्बा है, जहां हर कुछ दिनों में मुश्किल से 20 मिनट पानी आता था. पानी की इस कमी ने ही पहली बार उनके भीतर साइंस और सस्टेनेबिलिटी को लेकर दिलचस्पी जगाई.

“जैसलमेर के आसपास के इलाकों से आने वाले मेरे कुछ दोस्त बरसात के मौसम में गड्ढे खोदकर पानी जमा करते थे,” खरे कहते हैं. वे जोड़ते हैं कि ऐसे माहौल में बड़े होने से सामूहिकता की भावना और समस्याओं से निपटने की ललक पैदा हुई.

उनके पिता फैक्ट्री में काम करते थे और किताबें घर लाया करते थे, जबकि उनकी मां, जो एक टीचर थीं, पढ़ाई को सबसे ऊपर रखती थीं.

खरे को याद है कि बचपन में वे आसमान में सितारों को देखते रहते थे और उनकी गिनती से हैरान हो जाते थे.

“अगर आप अपने शरीर के जीन यानी डीएनए को खोल दें, तो उससे आप प्लूटो तक जाकर 17 बार वापस आ सकते हैं,” वे मुस्कराते हुए कहते हैं.

खरे के लिए बायोलॉजी को डिकोड करना बदलाव लाने वाली साइंस की “तीसरी लहर” है. पहली लहर फिजिक्स थी, जिसने शहरों को बिजली दी और टेलीकम्युनिकेशन दिया. दूसरी लहर केमिस्ट्री थी, जिसने आधुनिक दवाइयां और खाना दिया. एआई उनके लिए सिर्फ एक टूल है, जो इस प्रक्रिया को तेज़ करता है.

एब्सोल्यूट की विरासत भी खास है. खरे बताते हैं कि कंपनी का नाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने रखा था. उस वक्त खरे कलाम फाउंडेशन में उभरती टेक्नोलॉजी पर काम करने वाली टीम का हिस्सा थे.

एब्सोल्यूट की स्थापना, कई मायनों में, दिवंगत राष्ट्रपति के मिशन को श्रद्धांजलि थी. 2015 में जब कलाम का निधन हुआ, तो खरे गहराई से प्रभावित हुए.

“वे मुझसे हमेशा पूछते थे कि दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं,” खरे याद करते हैं. “और यह भी कि मैं अपनी ज़िंदगी में उनके मिशन को आगे बढ़ाने के लिए क्या करूंगा.”

हालांकि, कंपनी शुरू करने से पहले खरे ने 2012 से 2016 तक वर्टेक्स ग्रुप में इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम किया. यह एक फैक्ट्री ऑटोमेशन कंपनी थी.

“हम फैक्ट्रियों के लिए रोबोटिक आर्म बनाते थे, जहां ज़्यादा तापमान की वजह से इंसान काम नहीं कर सकते,” वे अपनी लैब के डिसइंफेक्टेंट चैंबर से गुजरते हुए कहते हैं.

आज एब्सोल्यूट में करीब 300 लोग काम करते हैं, जिनमें से आधे आरएंडडी और टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं. इसके 80 से 85 वैज्ञानिकों में से करीब 30 के पास पीएचडी है. लेकिन ब्रेकथ्रू इनोवेशन एक धीमी प्रक्रिया है. 2015 में शुरू होने के बावजूद, एब्सोल्यूट के कृषि उत्पाद सिर्फ 15 महीने पहले ही बाज़ार तक पहुंचे.

“भारत में स्टार्टअप्स के लिए कैपेक्स लगाने को लेकर बहुत कम पूंजी उपलब्ध है,” खरे कहते हैं. “ईवी फैक्ट्री लगाने के लिए एक तय रास्ता है, जिससे लोग परिचित हैं. लेकिन नए इनोवेशन के लिए ऐसा कोई रास्ता नहीं है.”

उनके मुताबिक, सरकार का रिसर्च डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड (आरडीआईएफ) एक “गेम-चेंजर” है.

“लेकिन आरडीआईएफ को सफल बनाने के लिए निवेशकों को यह समझना होगा कि डीप आरएंडडी वाली कंपनियों में निवेश कैसे किया जाए,” खरे कहते हैं. “ये कंपनियां पहले, तीसरे या पांचवें साल में कमाई नहीं करेंगी. कमाई छठे या सातवें साल में आएगी, यानी इसका एक चक्र होता है.”

पारंपरिक कारोबार के उलट, बड़े इनोवेशन पर बनी कंपनियां एक्सपोनेंशियल होती हैं और एक ही प्रोडक्ट से पूरा बाज़ार पकड़ सकती हैं. जैसे एब्सोल्यूट का बायो लेदर.

खरे ने फिर से वही भूरे रंग का चौकोर टुकड़ा उठाया. वे इसे लॉन्च करने को बेचैन हैं, लेकिन फिलहाल उनकी प्राथमिकता खेती और प्रोटीन है.

उनके मुताबिक, इसका असर ज़मीन पर दिखने लगा है. उन्हें सोनीपत के एक किसान से हुई बातचीत याद आती है, जिससे उन्होंने पूछा था कि वह उनके जैविक प्रोडक्ट क्यों इस्तेमाल कर रहा है.

“उसने मुझसे एक ऐसी बात कही, जो मेरे साथ हमेशा के लिए रह गई,” खरे कहते हैं. “उसने कहा, मिट्टी तो मेरी है, ज़हर कैसे डाल दूं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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