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Thursday, 18 July, 2024
होमफीचर'मुझे सलमान रुश्दी जैसा महसूस होता है'- बांग्लादेशी नास्तिक ब्लॉगर को भागकर भारत में छिपना पड़ा

‘मुझे सलमान रुश्दी जैसा महसूस होता है’- बांग्लादेशी नास्तिक ब्लॉगर को भागकर भारत में छिपना पड़ा

अब जबकि उनकी हत्या की मांग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है, असद नूर कहते हैं कि उन्हें दुनिया को बताना चाहिए कि बांग्लादेश में समाज कितना कट्टरपंथी हो गया है.

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असद नूर के पास एक नया फ़ोन नंबर और एक नया घर का पता है. निर्वासित बांग्लादेशी नास्तिक ब्लॉगर और मानवाधिकार कार्यकर्ता का कहना है कि बहुत कम लोगों के पास उनका नया कॉन्टैक्ट डिटेल है. लेकिन बांग्लादेश में उनके परिवार के सदस्य उनमें से नहीं हैं. और यूरोप से उनका सिर कलम करने की मांग करने वाला वीडियो सामने आने के बाद से किसी को नहीं पता कि वह भारत में कहां छिपे हैं.

32 वर्षीय नूर का कहना है कि अब उन्हें पता है कि सलमान रुश्दी जैसा होना कैसा लगता है.

उन्होंने एक अज्ञात स्थान से दिप्रिंट को बताया, ”मैं सलमान रुश्दी की तरह लिखने में सक्षम नहीं हो सकता, लेकिन धार्मिक भावनाओं को आहत करने के मामले में मेरी भी वही स्थिति है.” उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है कि रुश्दी की उम्र तक पहुंचने से पहले ही उन्हें मार दिया जाए.

नूर मुश्किल से ही अपने घर से बाहर निकलते हैं और दिन-रात अपने लैपटॉप के सामने बिताते हैं. वह अपने कीबोर्ड पर काम करते हैं, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमलों की रिपोर्ट संकलित करते हैं, ऑनलाइन नफरत पर नज़र रखते हैं, और व्लॉग तैयार करते हैं. इन दिनों उनके पास कुछ और करने के लिए समय नहीं है, और सिनेमैटोग्राफर बनने का उनका सपना भी दूर लगता है. पछताते हुए वह कहते हैं, “अपनी जान को ख़तरे के कारण मैं लोगों से मिल भी नहीं सकता. मैं डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रोजेक्ट पर कैसे काम कर सकता हूं?”

भारत और बांग्लादेश

हालांकि, भारत में गुमनामी में रह पाना कई बार उन्हें राहत की सांस लेने में मदद करता है. वह बेझिझक शाम को टहलने जाते हैं, वह रास्ता पर बिक रही चाय पीते हैं या किसी कैफे में अकेले बैठते हैं, पेपर नैपकिन पर अपने अगले व्लॉग के लिए प्वाइंट लिखते हैं और अपनी कॉफी का इंतजार करते हैं.

वह कहते हैं, “यह एक बड़ा और जटिल देश है. लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी है, बहसें होती हैं. मैं लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बहुत मुखर रक्षकों को हर मंच से बोलते हुए देखता हूं. आदर्श स्थिति न सही, लेकिन कम से कम मैं यहां जीवित हूं. इस्लामी कट्टरवाद किसी बहस की इजाज़त नहीं देता. मैं बांग्लादेश में उस तरह नहीं रह सकता,”

आजकल नूर को ज्यादा पढ़ने का समय नहीं मिलता. लेकिन जब भी वह ऐसा करते हैं, तो वह बांग्लादेशी लेखकों हुमायूं आज़ाद और तसलीमा नसरीन और बंगाली उपन्यासकार समरेश मजूमदार की साहित्यिक कृतियों की ओर लौट जाते हैं. तीनों लेखकों ने उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने में मदद की है.

Noor hardly steps out of his house, and appreciates the relative anonymity India offers | Facebook
नूर मुश्किल से ही अपने घर से बाहर निकलते हैं, और भारत में पहचान छिपाकर रह पाने की सराहना करते हैं | फेसबुक

लेकिन वह शक्तिशाली के सामने खड़े रहने की कीमत चुका रहे हैं – राजनीतिक और धार्मिक दोनों तरह से. 2013 में ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद से बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरपंथी उनके पीछे पड़े हैं. 7 अगस्त 2020 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने लिखा कि बांग्लादेश में अधिकारियों को नूर के परिवार के सदस्यों को “परेशान करने और डराने-धमकाने” से बचना चाहिए. स्थानीय पुलिस ने 14-15 जुलाई 2020 की आधी रात को दक्षिणी बरगुना जिले के अमताली गांव में ब्लॉगर के घर पर छापा मारा, जब वे उसे नहीं ढूंढ पाए तो उसके माता-पिता को ढूंढा. रिपोर्ट में कहा गया है, “पुलिस ने 16 जुलाई को उनके घर पर फिर से छापा मारा. 18 जुलाई को सुबह-सुबह, पुलिस ने घर पर फिर से छापा मारा और असद के पिता, तोफज्जल हुसैन, उनकी मां, रबेया बेगम, दो छोटी बहनों (एक नाबालिग थी) और दो अन्य रिश्तेदारों को बिना किसी औपचारिक आरोप या वारंट के हिरासत में ले लिया. स्थानीय पुलिस ने परिवार के सदस्यों को 19 जुलाई की रात को रिहा करने से पहले 40 घंटे तक हिरासत में रखा.”

इन्हीं कारणों से नूर अपने परिवार के संपर्क में रहना पसंद नहीं करते हैं. “मैं केवल आशा कर सकता हूं कि वे खुश और सुरक्षित हों.”


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धमकियां नहीं रुकेंगी

अब जब उनकी हत्या की मांग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है, तो उनका कहना है कि उन्हें दुनिया को बताना चाहिए कि उनकी मातृभूमि में समाज कितना कट्टरपंथी हो गया है. उन्होंने आरोप लगाया, “ऐसे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी एक मज़ाक है जहां सड़कों पर धर्म को छोड़ने वालों को चाकू मार दिया जाता है. और अब बांग्लादेशी नागरिक मुझे विदेश से धमकी दे रहे हैं.”

8 और 10 अगस्त को, पेरिस से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बिजॉय हुसैन तंजील और यूके से फरहान चौधरी ने धर्म छोड़ने के आधार पर नूर की फांसी की वकालत करते हुए वीडियो डाले. उन्होंने वीडियो हटा दिए हैं, लेकिन ब्लॉगर के खिलाफ धमकियां मिलना जारी है. वह कहते हैं, ”मुझे डर है कि मेरे पास शायद ज्यादा समय नहीं है.”

अब हटाए गए वीडियो में, चौधरी, जिनके फेसबुक पर लगभग 1,74,000 फॉलोअर्स हैं, ने पूछा कि नूर जैसे विधर्मियों का भाग्य क्या होना चाहिए. उनके एक अनुयायी ने नूर को पैगंबर मुहम्मद की आलोचना करने से रोकने के लिए उनकी जीभ काटने का सुझाव दिया. एक अन्य ने आग्रह किया कि उनके हाथ काट दिए जाएं ताकि वह इस्लाम के खिलाफ न लिख सके. नूर याद करते हुए कहते हैं, “चौधरी ने कहा था कि मेरा भी वही हश्र होगा जो स्कूल शिक्षक सैमुअल पैटी का हुआ था, जिनका इस्लाम की आलोचना करने पर 16 अक्टूबर 2020 को फ्रांस में सिर कलम कर दिया गया था.”

तंजील और चौधरी दोनों जन्म से बांग्लादेशी हैं. हालांकि, वे यूरोप में बस गए हैं, नूर का कहना है कि वे इस्लाम की आलोचना करने वाले किसी भी व्यक्ति के प्रति महसूस होने वाली नफरत को दूर नहीं कर पाए हैं.

नफरत पर नज़र रखना

नूर इस असहिष्णुता का श्रेय उन मदरसों को देते हैं, जिनमें उन्होंने बांग्लादेश में बड़े होने के दौरान पढ़ाई की थी.

वे कहते हैं, “मेरे माता-पिता इससे ज़्यादा कुछ नहीं जानते थे. वहां जो सिखाया जाता है वह आपको अन्य धर्मों के लोगों को उपहास की दृष्टि से देखने पर मजबूर करता है, भले ही यह सीधे तौर पर घृणा जैसा न हो. हुज़ूर [धार्मिक उपदेशक] लोग, जिनमें से अधिकांश बांग्लादेश के भीतरी इलाकों में बहुत लोकप्रिय हैं, नियमित रूप से धार्मिक उग्रवाद का प्रचार करते हैं. वाज महफ़िलें [इस्लाम का प्रचार करने के लिए होने वाले इवेंट] अक्सर नफरत भरी सभाएं होती हैं. नफरत स्कूलों से शुरू होकर सामाजिक और धार्मिक समारोहों तक पहुंचते-पहुंचते आम बात हो जाती है.”

मदरसों ने उन्हें जो कुछ भी सिखाया हो, पर किताबों ने नूर को उससे परे की दुनिया के बारे में बताया. ढाका के सर्वदेशीयवाद ने जीवन के अन्य तरीकों के प्रति उनकी आंखें खोल दीं, और उन धारणाओं को चुनौती दी जो उन्होंने अपने पैतृक गांव गोपालगंज में बड़े होने के दौरान रखी थीं. 2013 में, नूर ने उस चीज़ के बारे में ब्लॉगिंग शुरू की जो उन्हें अपने आसपास समस्याग्रस्त लगी, जैसे कि बांग्लादेश के समाज और राजनीति का इस्लामीकरण, और देश में अल्पसंख्यकों के लिए बढ़ता खतरा.

Noor conducts live session with his audience | Facebook
नूर ने अपने दर्शकों के लिए लाइव सेशन किया | फेसबुक

“जब से जाकिर नाइक ने ऑनलाइन धार्मिक स्पीच देना शुरू किया, लोगों को पता चला कि आप आधुनिक कपड़े पहन सकते हैं, अंग्रेजी भाषा में बात कर सकते हैं और फिर भी पिछड़े रह सकते हैं. समस्या अब भीतरी इलाकों तक ही सीमित नहीं थी. नूर कहते हैं, ”इस देश के हर कोने में कट्टरपंथ एक वास्तविकता बन रहा था.”

सोशल मीडिया पर, अल्पसंख्यकों पर हमले का कोई भी उदाहरण उनके सामने आता है तो वह उसका डॉक्युमेंटेशन करते हैं. सितंबर 2012 में, चटगांव डिवीजन के कॉक्स बाजार इलाके में, एक बौद्ध उत्तम कुमार बरुआ पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया था. बौद्ध घरों, दुकानों और मंदिरों को लूट लिया गया और आग लगा दी गई. साल बीतते गए, पुराने घरों के खंडहरों पर नए घर बनाए गए, और जहां पुराने मंदिर हुआ करते थे, वहां नए मंदिर बने. लेकिन मारपीट करने वाले लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. बरुआ का आज तक कोई पता नहीं चला.

इसके बाद नूर ने 2016 के अक्टूबर के बारे में बात की, जब चटगांव डिवीजन के ब्राह्मणबारिया जिले के नासिरनगर उपजिला के एक रोशश दास को ‘धार्मिक नफरत फैलाने वाली’ फेसबुक पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया गया और प्रताड़ित किया गया. स्थानीय अवामी लीग के नेताओं ने हंगामा मचाया, दास से पूछताछ की और उन्हें तब तक प्रताड़ित किया जब तक उन्हें पता नहीं चला कि उस गरीब आदमी के पास फेसबुक अकाउंट भी नहीं है.

2017 में, कुछ ऐसा ही रंगपुर के टीटू रे का इंतजार कर रहा था, जिन्हें एक आपत्तिजनक पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया गया और जेल में यातना दी गई, जब तक कि यह पता नहीं चला कि उन्होंने कभी भी वह अपलोड नहीं किया था जिसके लिए उन पर आरोप लगाया जा रहा था.

सूची लगातार लंबी होती जाती है, लेकिन नूर नहीं रुकते.

“मैं वह दिखाने की कोशिश करता हूं जो बांग्लादेश में मुख्यधारा का समाचार मीडिया नहीं कर सकता. मैं ऐसे सवाल पूछता हूं जो हमारे देश के अधिकांश पत्रकार पिटाई या जान जाने के डर से नहीं पूछते. मेरे पास बांग्लादेश भर में युवा कार्यकर्ताओं का एक मजबूत नेटवर्क है जो जहां कहीं भी नफरत होती है उस पर नज़र रखते हैं और मुझे रिपोर्ट करते हैं और वीडियो भेजते हैं. मैंने उन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर डालता हूं.

सच की कीमत

जैसे-जैसे नूर मशहूर होते गए, उनके खिलाफ डिजिटल और भौतिक दोनों क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. लेकिन असली परेशानी जनवरी 2017 में शुरू हुई, जब वह सिर्फ 25 साल के थे. कट्टरपंथी इस्लामी समूहों ने नूर पर कथित तौर पर पैगंबर को बदनाम करने का आरोप लगाया और उसकी गिरफ्तारी की मांग की. 11 जनवरी 2017 को, बांग्लादेश पुलिस ने उन पर देश के 2013 सूचना और संचार प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत धर्म की मानहानि का आरोप लगाया.

नूर को 26 दिसंबर 2017 को ढाका के हजरत शाहजलाल अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उस समय गिरफ्तार किया गया था जब वह काठमांडू के लिए उड़ान भरने वाले थे. उन्होंने आठ महीने जेल में बिताए और जमानत पर रिहा होने के बाद उनके खिलाफ गुस्सा भरा प्रदर्शन हुआ. उन्हें नशीली दवाओं की तस्करी के आरोप में फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, जिसके बारे में उनका दावा है कि ये आरोप झूठे थे. चार महीने बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने गुप्त रूप से बांग्लादेश छोड़ने का फैसला किया. लेकिन फरवरी 2019 से नूर भारत में छिपे हुए हैं.

उन्हें देश छोड़े हुए चार साल हो गए हैं, लेकिन उन पर लगे आरोप वापस नहीं लिए गए हैं.

नूर की जेल से रिहाई के बाद इस्लामिक समूह हेफज़ात-ए-इस्लाम बांग्लादेश ने उन्हें फांसी देने की मांग की.

जुलाई 2020 में, उन्होंने रंगुनिया उपजिला में स्थानीय बौद्ध समुदाय पर हमलों पर भारत से ब्लॉग प्रकाशित किए. अवामी लीग के एक नेता ने उनके खिलाफ “धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने” के लिए देश के डिजिटल सुरक्षा अधिनियम के तहत मुकदमा दायर किया.

नूर को पता था कि उसकी मातृभूमि अब उसके लिए सुरक्षित नहीं है, लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि नफरत इंग्लैंड और फ्रांस में भी फैल जाएगी. उन्हें यकीन है कि अब उनके लिए कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है, लेकिन फिर भी वे अपने सिद्धांतों पर कायम हैं.

“[बांग्लादेश की] जीडीपी बढ़ गई है, लेकिन आर्थिक असमानता कायम है और भ्रष्टाचार भी. लोग दुखी हैं, और देश का अधिकांश भाग गरीब और अशिक्षित है. उन्होंने इस जीवन से आशा खो दी है और इसलिए वे अगले जीवन की आशा करते हैं. और यहीं पर धर्म के विक्रेता जन्नत के वादे के साथ आते हैं और उन लोगों के लिए नफरत का प्रचार करते हैं जो उनके धर्म का पालन नहीं करते हैं. किसी को तो बोलना ही था. मैंने किया.”

वह ऐसी प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं थे; उनके जैसे अन्य लोगों ने भारी कीमत चुकाई है. 2013 और 2016 के बीच, बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक लेखकों और ब्लॉगर्स, साथ ही विदेशियों, एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के सदस्यों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा उनके लेखन या जीवनशैली विकल्पों के माध्यम से इस्लाम और पैगंबर पर हमला करने के लिए मार डाला गया था. 2 जुलाई 2016 तक इन हमलों में लगभग 48 लोग मारे गए या गंभीर रूप से घायल हो गए.

ये हमले कथित तौर पर अंसारुल्लाह बांग्ला टीम और इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया जैसे चरमपंथी समूहों द्वारा किए गए थे. हमलों पर अपनी प्रतिक्रिया के लिए बांग्लादेशी सरकार की भी आलोचना हुई, जिसमें कथित तौर पर कुछ धार्मिक समूहों को बदनाम करने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए कुछ ब्लॉगर्स पर आरोप लगाना और जेल भेजना शामिल था. इस अनियंत्रित, निर्दयी हत्या ने अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं. वे कहते हैं, “उनमें से अधिकतर मेरे दोस्त थे. मैं उनकी मौतों को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा. मैं धार्मिक कट्टरवाद के खिलाफ बोलना जारी रखूंगा,”

एक्स-मुस्लिम नहीं

भारत में जहां वह छिपे हैं, वहां से, नूर अपने फेसबुक पेज पर नियमित व्लॉग डालत हैं और अक्सर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के दैनिक दमन पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए लाइव आते हैं. इस मंगलवार, वह बांग्लादेशी क्रिकेटर तंजीम हसन साकिब के महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर प्रतिगामी विचारों पर बहस करने के लिए अपने पसंदीदा लेखकों में से एक, तस्लीमा नसरीन और ब्लॉगर आसिफ मोहिउद्दीन के साथ फेसबुक पर लाइव आए.

नूर ने बहस के दौरान कहा, “साकिब एक प्रसिद्ध क्रिकेटर हैं, लेकिन वह महिलाओं पर घृणित टिप्पणी करते हैं, बलात्कार के लिए उनके कपड़ों की पसंद को जिम्मेदार ठहराते हैं. उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों को जायज़ ठहराया है. लेकिन बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने उन्हें राष्ट्रीय टीम से निलंबित भी नहीं किया है,”

यह बांग्लादेश में धार्मिक और सामाजिक रूढ़िवादिता का पालन करने वाले किसी भी व्यक्ति का निर्भीक निष्कासन है जिसने दोस्तों और समर्थकों को भी नूर के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलने से रोक दिया है. नाम न छापने की शर्त पर एक बांग्लादेशी पत्रकार कहते हैं, लेकिन उनके जैसे बहादुर बहुत कम लोग हैं. वह कहते हैं, ”धार्मिक नेताओं व राजनेताओं से लेकर मशहूर हस्तियों तक, अगर नूर किसी को भी नफरत फैलाने का दोषी पाते हैं तो उन्हें नहीं बख्शते.” उन्होंने आगे कहा कि नूर का फेसबुक पेज एक दैनिक नफरत ट्रैकर है. पत्रकार कहते हैं, “हम उसे बहुत दिलचस्पी से देखते हैं, हालांकि, हम इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करेंगे. दुख की बात है कि बांग्लादेश के समाज में नूर जैसे मुखर एक्स-मुस्लिम के लिए कोई जगह नहीं है.”

हालांकि, नूर खुद को एक्स-मुस्लिम नहीं कहते और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि वह नास्तिक हैं. “खुद को एक्स-मुस्लिम कहने का मतलब यह होगा कि समस्या केवल इस्लाम के साथ है और [कि] मैंने अपना दिमाग अन्य धर्मों के लिए खुला रखा है. जो कि नहीं है. सभी धर्मों में समस्याएं हैं. मेरे जीवन में ईश्वर की कोई जगह नहीं है.”

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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