हैदराबाद: पांच रिसर्चर्स ने भारत के समुद्रों और तटरेखाओं से जुड़े मछली पकड़ने वाले इन्फ्लुएंसर्स, बंदरगाहों पर कारोबारियों, टूरिस्ट व्लॉगर्स और तटीय अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े एक दशक के डिजिटल कंटेंट की स्टडी की. इससे उन्हें दूरदराज के शार्क लैंडिंग साइट्स तक दुर्लभ पहुंच मिली, देशभर में प्रजातियों की विविधता की जानकारी मिली और भारत में शार्क को लेकर लोगों की धारणा को समझने में मदद मिली.
भारत की 11098.81 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर वैज्ञानिक लंबे समय से शार्क, रे और स्केट जैसी मांसाहारी मछलियों के प्राचीन समूह, एलास्मोब्रैंक, पर अधूरे और प्रजाति-विशेष आंकड़ों की समस्या से जूझ रहे हैं. भारत दुनिया के शीर्ष शार्क-फिशिंग देशों में भी शामिल है.
भारतीय जलक्षेत्र में शार्क की 114 प्रजातियां और रे की 116 प्रजातियां पाई जाती हैं. पिछले 50 वर्षों में इन प्रजातियों के लिए जीवित रहना मुश्किल हो गया है. दुनिया भर में बढ़ते मछली पकड़ने के दबाव के कारण 1970 के दशक से अब तक शार्क और रे की आबादी में 71 प्रतिशत की गिरावट आई है. अत्यधिक शिकार, आवास का विनाश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने इनकी संख्या को तेजी से घटाया है. इससे ये शिकारी, जो धरती पर डायनासोर से भी पहले विकसित हुए थे, हमारे जीवनकाल में ही विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं.
सुधा कोटिलिल ने कहा, जो इस पेपर के लेखकों में से एक हैं और एक स्थायी समुद्री भोजन पहल, इनसीज़न फिश में एक रिसर्चर हैं, “भारत में शार्क और रे के लिए राष्ट्रीय स्तर की तस्वीर उपलब्ध नहीं है। इस बीच, व्यक्तिगत रिसर्च स्थानीय स्तर पर केंद्रित है. एक समग्र तस्वीर अक्सर गायब होती है, जो डिजिटल संरक्षण के माध्यम से संभव है.”
यह स्टडी एक्वाटिक कंजर्वेशन: मरीन एंड फ्रेशवाटर इकोसिस्टम्स जर्नल जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इसमें भारत के 96 स्थानों का डेटा शामिल है, जिनमें पूर्व और पश्चिमी तट पर 33 बंदरगाह, 34 तटीय गांव और छह बाजार शामिल हैं. वैज्ञानिकों ने छह सोशल मीडिया और सिटीजन साइंस प्लेटफॉर्म से जुड़े 1,293 एलास्मोब्रैंक संबंधी पोस्ट का विश्लेषण किया और 83 प्रजातियों को दर्ज किया.
“हमने शार्क की दो दुर्लभ प्रजातियों की पहचान की, जिन्हें आखिरी बार 2014 में देखा गया था,” कोटिलिल ने उत्साह के साथ कहा.
पहचानी गई प्रजातियों में से 62.2 प्रतिशत IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की रेड लिस्ट में शामिल थीं. कुछ प्रजातियां भारत में कानून के तहत भी संरक्षित पाई गईं, जिन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I और II में सूचीबद्ध किया गया है, जो इन्हें सर्वोच्च संरक्षण प्रदान करता है.

रिसर्चर्स ने सिर्फ दुर्लभ प्रजातियों की पहचान ही नहीं की, बल्कि शार्क हॉटस्पॉट्स और दूरस्थ लैंडिंग स्थलों तक भी महत्वपूर्ण पहुंच हासिल की, जहां मछुआरे अपनी पकड़ को किनारे उतारते हैं. औपचारिक वैज्ञानिक शोध की तुलना में इंटरनेट कनेक्टिविटी भारत के दूर-दराज इलाकों तक तेजी से पहुंची है. वैज्ञानिक इस पहुंच का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं और इससे भारत में शार्क संरक्षण को देखने का एक नया नजरिया सामने आ रहा है.
कोटिलिल ने कहा, “विश्लेषण से पता चला कि केरल में इंटरनेट की पहुंच ज्यादा है, जिसका सीधा मतलब है कि लोग ज्यादा तस्वीरें लेते हैं और पोस्ट करते हैं. इससे हमें कई छोटे लैंडिंग स्थलों और हॉटस्पॉट्स का डेटा मिला.”
“इसके उलट, अंडमान एवं निकोबार और लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय राज्य अच्छी तरह प्रतिनिधित्व नहीं कर पाए. इसका संबंध फिर से फोन और इंटरनेट तक पहुंच से जुड़ा है,” उन्होंने जोड़ा.
पेपर में तर्क दिया गया है कि तकनीक में प्रगति और व्यापक इंटरनेट पहुंच भारत में कम-ज्ञात समुद्री प्रजातियों के साथ लोगों के संवाद के तरीके को बदल रही है. देश की ज्यादातर आबादी युवा होने के कारण सोशल मीडिया का उपयोग और इसकी प्रासंगिकता आगे और बढ़ने वाली है.

इंटरनेट और डेटा
आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2025 तक भारत में 491 मिलियन सक्रिय सोशल मीडिया यूजर पहचानें थीं. तुलना के लिए, यह संख्या भारत की कुल आबादी के 33.7 प्रतिशत के बराबर है.
सोशल मीडिया पोस्ट मुख्य रूप से दो बंदरगाहों पर केंद्रित थीं. पूर्वी तट पर तमिलनाडु का कासिमेडु बंदरगाह और पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र का ससून डॉक. कोच्चि बंदरगाह और गुजरात के बंदरगाहों जैसे प्रमुख लैंडिंग केंद्रों से पोस्ट काफी हद तक नदारद थीं.
इस रिसर्च के नतीजों को डिजिटल विभाजन के संदर्भ में समझना जरूरी है. लोगों की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति यह तय करती है कि उन्हें कितना और कैसा डेटा उपलब्ध होता है.
जैसे-जैसे इंटरनेट का उपयोग बढ़ा, युवा मछुआरों ने वीडियो और पोस्ट साझा करना शुरू किया, जिनमें उनका समुद्री जीवन दिखाया गया. उन्होंने अपनी पकड़, मछली पकड़ने के औजार और समुद्र व किनारे की रोजमर्रा की दिनचर्या को दिखाया. ज्यादातर कंटेंट स्थानीय भाषाओं में बनाया गया, जिससे वे सीधे अपने समुदायों से बात कर सके और पारंपरिक मछली पकड़ने के नेटवर्क से बाहर भी अपनी मौजूदगी बना सके.
मछुआरों के साथ-साथ पर्यटन ब्लॉगर और बाजार जाने वाले लोग भी बंदरगाहों और मछली बाजारों से तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करते रहे, जिनमें मछली पकड़ने की गतिविधि को अक्सर एक दृश्य या स्थानीय रंग के रूप में पेश किया गया. कोट्टिलिल ने कहा, “खासतौर पर शार्क को लेकर एक आकर्षण देखा गया.”
ज्यादातर पोस्ट, यानी 91.89 प्रतिशत, व्यक्तियों द्वारा किए गए थे, जिनमें भारतीय और विदेशी पर्यटक, मछुआरे, व्यापारी और फूड ब्लॉगर शामिल थे. इसके बाद संगठनों की हिस्सेदारी 3.01 प्रतिशत रही. अन्य 5.09 प्रतिशत में संरक्षण संगठन, नेटवर्क, न्यूज़ चैनल, होटल और वीडियो क्रिएटर शामिल थे. पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों की हिस्सेदारी 0.23 प्रतिशत थी. अधिकांश पोस्ट सामान्य लैंडिंग पर केंद्रित थीं और संरक्षण पर जोर देती थीं, जबकि कुछ पोस्ट मूल्य सूची, मेन्यू और रेसिपी पर थीं, जो उपयोग और मूल्य पर ध्यान देने को दिखाती हैं.
इनके कंटेंट में ताज़ी पकड़, नीलामी और तटीय दिनचर्या पर फोकस था, जिससे इन स्थानों की दृश्यता बढ़ी. “जो लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, वे अनजाने में सिटीजन साइंटिस्ट बन जाते हैं, क्योंकि वे संरक्षण और शोध के लिए उपयोगी इतना सारा डेटा दर्ज करने में मदद कर रहे हैं,” कोट्टिलिल ने कहा.
खाली जगहों को भरना
पारंपरिक शोध आमतौर पर काफी समय लेने वाला होता है. इसमें वैज्ञानिक सीमित संसाधनों के साथ बहुत मेहनत से डेटा इकट्ठा करते हैं, और यह प्रक्रिया अक्सर एक साल या उससे अधिक समय लेती है ताकि डेटा उपयोगी बन सके. डिजिटल डेटा के जरिए अब शोधकर्ता देशभर से एक तय अवधि में लगातार डेटा हासिल कर सकते हैं, जिससे रुझानों और पैटर्न को समझना संभव हो गया है.
इस अध्ययन ने उन भाषा बाधाओं को भी तोड़ा, जिनका सामना वैज्ञानिकों को आमतौर पर फील्ड में करना पड़ता है. “हम स्थानीय भाषाओं में शार्क के नाम खोजकर क्षेत्रीय बाजारों और स्थानीय भाषा के कंटेंट तक भी पहुंच पाए,” कोट्टिलिल ने कहा.

आंध्र प्रदेश के काकीनाडा बंदरगाह पर दो लोग स्पैडनोज़ शार्क की पकड़ को बर्फ के डिब्बे में पैक करने के लिए छांटते हुए.
रिसर्चर्स ने शार्क से जुड़े क्षेत्रीय कंटेंट को खोजने के लिए खास हैशटैग का इस्तेमाल किया, जैसे तमिल में #sura और #sorrah, और मराठी में #mori.
पेपर में यह भी देखा गया कि उपयोगकर्ता शार्क और रे से जुड़े सोशल मीडिया कंटेंट के साथ कैसे जुड़ते हैं. इससे पोस्ट के कैप्शन और टिप्पणियों के जरिए लोगों का शार्क और रे के प्रति नजरिया समझने में मदद मिली. आमतौर पर भारत में शोध मछली पकड़ने वाले समुदायों के नजरिये पर केंद्रित रहा है, लेकिन आम जनता के दृष्टिकोण पर नहीं.
“भारतीय शार्क और रे को डर की बजाय उपयोगिता के नजरिये से देखते हैं, यह बात चौंकाने वाली थी,” कोट्टिलिल ने कहा.
इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत में शार्क और रे समुद्र की बजाय ज्यादा बार मछली बाजारों में देखे जाते हैं. कई क्षेत्रों में शार्क का मांस पारंपरिक रूप से खाया जाता है. इसके उलट, विदेशों में शार्क के काटने और हमलों से जुड़ी कहानियां ज्यादा आम हैं, जो मुख्य रूप से वॉटर स्पोर्ट्स और तटीय पर्यटन से जुड़ी होती हैं. इसी वजह से भारत के संदर्भ में ‘जॉज़ इफेक्ट’ की मौजूदगी बहुत कम है.
एक इंस्टाग्राम पोस्ट, जिसमें मछुआरे स्पैडनोज़ शार्क के पेट से बच्चों को बाहर निकालकर उन्हें समुद्र में छोड़ते दिखे, उसे 50,740 लाइक, 417,290 व्यू और 389 टिप्पणियां मिलीं.
यह अध्ययन मछुआरों और पर्यटकों को सिर्फ संसाधनों का दोहन करने वाले नहीं, बल्कि अनजाने में डेटा देने वाले योगदानकर्ता के रूप में भी पहचानता है, जिससे संरक्षण से जुड़ा ज्ञान तैयार होने का तरीका बदल रहा है.
धारणाओं में बदलाव
संरक्षण के प्रयास अब तक ज्यादा आकर्षक और कम व्यावसायिक महत्व वाली प्रजातियों, जैसे डॉल्फिन और कछुओं, पर केंद्रित रहे हैं, जबकि शार्क और रे नीति संबंधी चर्चा में हाशिये पर रहे हैं. “शार्क और रे पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है,” लंदन की जूलॉजिकल सोसाइटी की संरक्षण वैज्ञानिक त्रिशा गुप्ता ने कहा. “इस तरह के तरीके वैज्ञानिक शोध में लगातार ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं. ये सवालों के जवाब देते हैं, जैसे किन प्रजातियों को संरक्षण की जरूरत है, कहां कौन सी प्रजाति पाई जाती है, और कौन सी प्रजातियां घट रही हैं या गायब हो चुकी हैं. इस पेपर ने कई वैज्ञानिक खाली जगहों को भर दिया है.”
उभरती अर्थव्यवस्थाओं में विकास अक्सर संरक्षण से आगे निकल जाता है, और भारत का समुद्री क्षेत्र भी इससे अलग नहीं है. जैसे-जैसे भारत मत्स्य पालन, बंदरगाहों, तटीय पर्यटन और समुद्री व्यापार के विस्तार के साथ ब्लू इकॉनमी की ओर तेजी से बढ़ रहा है, समुद्री शासन पर दबाव बढ़ रहा है. इससे आर्थिक विकास और पारिस्थितिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाने की जरूरत सामने आती है.
शार्क और रे, जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया और व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल किया गया, इस बदलाव की धुरी पर खड़े हैं. गुप्ता ने कहा, “सरकार का काफी काम मत्स्य पालन के विस्तार में जा रहा है, न कि उसे टिकाऊ तरीके से प्रबंधित करने में.”
जैसे-जैसे भारत का समुद्री दायरा बढ़ रहा है, इस तरह के मिश्रित तरीके स्टॉक आकलन, प्रजातियों की विविधता और जनधारणा से जुड़ी जानकारी पैदा कर सकते हैं. इससे नीतिगत फैसलों में मदद मिल सकती है, लक्षित संरक्षण हस्तक्षेप तय किए जा सकते हैं और जनता की भागीदारी को मजबूत किया जा सकता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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