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Wednesday, 26 February, 2025
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प्रेगनेंट करो, अमीर बनो—बिहार में साइबर क्राइम का नया मॉडल

नवादा जिला लंबे समय से घोटालों, धोखाधड़ी और योजनाओं का केंद्र रहा है. लेकिन टेलीग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म ने धोखाधड़ी का स्वरूप बदल दिया है.

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नवादा: हफ्तों तक मुकेश कुमार उस महिला का इंतजार करते रहे, जिसे वह गर्भवती करने वाले थे जिसके बदले में उन्हें 15 लाख रुपये मिलने का वादा किया गया था. लेकिन बिहार के वैशाली जिले के इस 27 वर्षीय मजदूर के साथ एक बड़े साइबर ठगी रैकेट—‘ऑल इंडिया प्रेग्नेंट जॉब सर्विस’—का शिकार बना दिया गया. इस धोखाधड़ी को अंजाम देने वाले लोग नवादा जिले के गांवों से हैं, जो अब भारत के नए जामताड़ा के रूप में उभर रहा है.

“मेरी पत्नी को हमारे पहले बच्चे के जन्म में सिर्फ तीन महीने बाकी थे और मैंने सोचा कि इस समय और पैसे का सही इस्तेमाल कर सकता हूं,” मुकेश ने कहा. लेकिन इसके बजाय, वह अपनी सारी जमा पूंजी गंवा बैठे. विडंबना यह है कि उनके फोन की कॉलर ट्यून खुद साइबर ठगी से बचाव का अलर्ट है.

मुकेश बिहार और भारत के अन्य हिस्सों के उन सैकड़ों युवकों में से एक हैं, जिन्होंने फेसबुक पर घूम रहे एक विज्ञापन पर क्लिक किया: एक महिला का चेहरा और उस पर लिखा था—‘मुझे कॉल करें.’ इस ठगी का लालच? एक भारतीय महिला को गर्भवती बनाने पर 15 लाख रुपये मिलेंगे. और अगर आप सफल नहीं हुए, तो भी आपको कुछ लाख रुपये का भुगतान किया जाएगा.

इस गिरोह के लोग—बेरोजगार लेकिन तकनीकी रूप से कुशल युवा, जिनमें कुछ की उम्र महज 16 साल है—किसी हाई-टेक, एयर-कंडीशंड ऑफिस से काम नहीं कर रहे. वे सस्ते चीनी फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके दफ्तर झोपड़ियों, खेतों और बागों में बने हैं, खासतौर पर चकवाई, सिमरी और समै गांवों में. और वे पुलिस को लगातार छकाते आ रहे हैं.

नवादा साइबर पुलिस स्टेशन की प्रमुख डीएसपी प्रिया ज्योति इस ठगी को एक बहु-सिर वाले हाइड्रा की तरह बताती हैं. उनकी टीम ने 2024 में आठ और 2025 की शुरुआत से अब तक तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया, जब यह गर्भावस्था घोटाला स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया. लेकिन यह तो बस एक छोटी सी शुरुआत भर है.

उन्होंने कहा, “आप इस तरह के अजीबोगरीब मामलों में सौ लोगों को गिरफ्तार कर लें, फिर भी 101वां व्यक्ति इस ठगी के नाम पर लोगों से पैसे ऐंठता रहेगा.”

Nawada police stattion
नवादा में नव स्थापित साइबर थाना | फोटो: ज्योति यादव

नवादा जिला लंबे समय से ठगी, धोखाधड़ी और जालसाजी का गढ़ रहा है.

2000 के दशक की शुरुआत में, अखबारों, पैम्फलेट्स और पत्रिकाओं में कैंसर का इलाज करने वाली औषधियों और ऊर्जा बढ़ाने वाली कैप्सूल्स के विज्ञापन भरे रहते थे, जो सिर्फ आटे से बनी होते थे. जब टेलीविजन ग्रामीण बिहार में आम हो गया, तो जालसाजों ने ‘पहचान कौन’ जैसे स्कैम शुरू कर दिए. इसमें अमिताभ बच्चन या आमिर खान जैसी हस्तियों की धुंधली या अधूरी तस्वीरें दिखाई जाती थीं और सही पहचान बताने पर लाखों के इनाम का वादा किया जाता था. इस बहाने वे पूरे देश से कॉल मंगवाते, लोगों की बैंक डिटेल्स और कार्ड नंबर हासिल कर लेते. इसके अलावा, फर्जी पोस्ट ऑफिस मनी ऑर्डर, भूमि घोटाले, हनी ट्रैप और परीक्षा प्रश्न पत्रों की बिक्री जैसे ठगी के पारंपरिक तरीके भी चलते रहे.

लेकिन टेलीग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स ने ठगी के इस खेल को पूरी तरह बदल दिया है. नवादा के जालसाज अब साइबर ठगी की ओर बढ़ चुके हैं—हथियारों की जगह उनके हाथों में स्मार्टफोन हैं. यह जिला अब झारखंड के जामताड़ा, हरियाणा के मेवात और राजस्थान के भरतपुर जैसे साइबर अपराध केंद्रों को टक्कर दे रहा है.

“एक समय था जब जामताड़ा भारत में अकेला साइबर अपराध का गढ़ था. लेकिन धीरे-धीरे नवादा जैसे कई इलाकों ने इस खेल के पैंतरे सीख लिए और अब ये साइबर अपराध के नए केंद्र के रूप में उभर रहे हैं,” बिहार साइबर क्राइम ब्रांच में पांच वर्षों तक सेवा दे चुके आईपीएस अधिकारी सुशील कुमार ने कहा.

“आप किसी भी स्कैम का नाम लें, नवादा के जालसाज उसे आजमा चुके हैं. यह लगातार विकसित हो रहा है,” कुमार ने कहा, जो अब बिहार पुलिस अकादमी, राजगीर में एसपी (प्रशिक्षण) के पद पर तैनात हैं. “कुछ शिक्षित युवाओं ने जामताड़ा जाकर वहां के मॉडल को सीखा और फिर अपने गांव लौटकर वही तरीका अपनाया.”

नवादा में साइबर अपराध के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 में जहां 18 एफआईआर दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 81 हो गई है. लेकिन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह आंकड़ा ‘ऑल इंडिया प्रेग्नेंट जॉब सर्विस’ जैसे घोटालों के पीड़ितों की वास्तविक संख्या को नहीं दर्शाता.

डीएसपी ज्योति ने कहा, “इस क्षेत्र में अपराध अब एक स्टेटस सिंबल बन चुका है.”

अपराधी

5 जनवरी को दोपहर करीब 1:30 बजे, डीएसपी ज्योति की टीम के छह पुलिसकर्मी तीन बाइकों पर सवार होकर नवादा जिले के कहुआरा गांव पहुंचे. साइबर पुलिस को जानकारी मिली थी कि इस गांव में कुछ लोग ‘ऑल इंडिया प्रेग्नेंट जॉब (बेबी बर्थ सर्विस)’ और ‘प्लेबॉय सर्विस’ जैसी ठगी चला रहे हैं. करीब 8,000 की आबादी वाले इस गांव में पुलिस ने जैसे ही पूछताछ शुरू की, चार युवक सरसों के खेतों की ओर भाग निकले. पुलिसकर्मी भी उनके पीछे दौड़े. युवक अलग-अलग दिशाओं में दौड़े, लेकिन आखिरकार फिल्म कोहरा जैसे एक पीछा करने वाली घटना के बाद तीन को गिरफ्तार कर लिया गया. इनमें से एक महज 17 साल का था, यह जानकारी छापेमारी का नेतृत्व कर रहे सब-इंस्पेक्टर निलेश कुमार सिंह ने दी. पुलिस ने छह सस्ते चीनी मोबाइल फोन (जैसे वीवो और रेडमी), जॉब कार्ड और महिलाओं की तस्वीरें बरामद कीं.

छापे से कुछ घंटे पहले, सब-इंस्पेक्टर सिंह ने प्रतिबिंब ऐप में लॉग इन किया था. गृह मंत्रालय द्वारा अप्रैल 2024 में लॉन्च किए गए इस ऐप में जीआईएस (Geographic Information System) तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पुलिस अधिकारियों को देशभर में साइबर अपराधियों के नेटवर्क को ट्रैक करने और उनके लाइव लोकेशन की जानकारी मिलती है. इसी ऐप के जरिए सिंह को पता चला कि गिरोह महज 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कहुआरा गांव में सक्रिय था, और इसी के चलते छापा सफल रहा.

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हाल ही में पुलिस की कार्रवाई के बाद कहुआरा की गलियों में सन्नाटा पसरा है | फोटो: ज्योति यादव

“यह एक असाधारण रूप से साधारण घोटाला है,” सिंह ने कहा. “कौन सोच सकता था कि किसी महिला को गर्भवती करने के बदले एक करोड़ रुपए मिल सकते हैं? कोई भी युवा इस ऑफर को ठुकराएगा नहीं.”

इस ठगी के शिकार अक्सर गरीब किसान, मजदूर और दिहाड़ी प्रवासी होते हैं. ठग लाखों की नहीं, बल्कि चंद हजार की ठगी करते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को निशाना बनाने के कारण यह ठगी मुनाफेदार बन जाती है. अधिकतर पीड़ित शर्म और अपनी पत्नियों से डर के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते.

हालांकि इस ठगी के कई रूप सामने आ चुके हैं, लेकिन ऑल इंडिया प्रेग्नेंट जॉब सर्विस की शुरुआत नवादा के गुरमह गांव में एक छोटी-सी झोपड़ी से हुई थी. पुलिस के मुताबिक, इसका ‘मास्टरमाइंड’ था मुन्ना कुमार—मुख्य आरोपी, जिसे पिछले साल जनवरी में गिरफ्तार किया गया था.

कुछ समय राजस्थान में काम करने के बाद, मुन्ना गुरमह लौटा और गांव के पास एक नहर में मछली पालन का व्यवसाय शुरू करने की घोषणा की. उसने संभावित ‘कर्मचारियों’ को पहचाना और 25 से ज्यादा युवकों को ‘भर्ती’ किया. लेकिन मछली पकड़ने की बजाय, उसने उन्हें फिशिंग यानी ऑनलाइन ठगी करना सिखाया.

गांव के सरपंच नरेश साव ने कहा,“हमें कभी शक नहीं हुआ कि वे लोगों को ठग रहे हैं.”

मुन्ना ने फर्जी सिम कार्ड और सस्ते मोबाइल फोन के जरिए युवकों को ट्रेनिंग दी. वे नहर के किनारे छोटे-छोटे वॉचटावर बनाकर नेटवर्क पकड़ते और कॉल करते. यह सिलसिला महीनों तक चला, जब तक कि जनवरी 2024 में पुलिस ने इस ठिकाने पर छापा नहीं मारा. गिरफ्तार किए गए आठ आरोपी जमानत पर छूट गए, जबकि 18 अभी भी फरार हैं.

“जब हमने पहली बार इस घोटाले के बारे में सुना, तो हंसी के मारे पेट में दर्द हो गया. यह इतना अनोखा था,” सब-इंस्पेक्टर सिंह ने कहा. लेकिन जल्द ही, हर कोई इस अपराध की नकल करने लगा और पुलिस की मुश्किलें बढ़ गईं.

नवादा साइबर पुलिस स्टेशन एक छोटे से एससी-एसटी और महिला थाना परिसर के भीतर स्थित महज तीन कमरों का एक ऑफिस है. यहां सिर्फ तीन डेस्कटॉप कंप्यूटर और कुछ सीपीयू मौजूद हैं.

“यह थाना भारी स्टाफ की कमी से जूझ रहा है,” डीएसपी प्रिया ज्योति ने कहा, जब वह एक जूनियर पुलिस अधिकारी को कोर्ट दस्तावेज़ में व्याकरण की गलतियों को ठीक करने का निर्देश दे रही थीं.


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पुलिस की चुनौतियां

बिहार में साइबर अपराधों में बढ़ोतरी को देखते हुए जून 2023 में 44 साइबर पुलिस थानों की स्थापना की गई. हालांकि, 660 स्वीकृत पदों के बावजूद, ज्यादातर थानों में स्टाफ की भारी कमी बनी हुई है.

“हैदराबाद के साइबर पुलिस थाने में चार इंस्पेक्टर, छह सब-इंस्पेक्टर और 16 कांस्टेबल थे. और मेरे पास क्या है? सिर्फ एक सब-इंस्पेक्टर और आधा दर्जन कांस्टेबल,” डीएसपी ज्योति ने कहा. उन्हें एक डिजिटल अपराध मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए हैदराबाद के साइबर पुलिस थाने जाने का मौका मिला था.

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नवादा साइबर पुलिस स्टेशन में एक सामान्य दोपहर | फोटो: ज्योति यादव

डिजिटल ठगी के इस सुनामी को रोकना मुश्किल हो गया है. 2024 में, बिहार में 6.3 लाख फ्रॉड कॉल दर्ज की गईं, जिनमें से 1.2 लाख पीड़ितों ने चक्षु ऐप के जरिए इसकी शिकायत की. अब लोग किसी भी पुलिस थाने में साइबर अपराध की रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं. एक अधिकारी ने बताया कि इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग अपने जिले के साइबर पुलिस स्टेशन की तलाश में जरूरी शुरुआती समय बर्बाद न करें.

बिहार के साइबर क्राइम सेल के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में साइबर अपराध के मामले 2018 में 374 से बढ़कर 2024 में 5,274 हो गए. यह वृद्धि अन्य राज्यों में भी देखी गई है. उत्तर प्रदेश में 2018 में 6,280 मामले थे, जो 2022 में बढ़कर 10,117 हो गए. पूरे भारत में, यह संख्या 2018 में 27,248 से बढ़कर 2022 में 65,893 हो गई. साइबर अपराध पर लगाम लगाने के लिए बिहार सरकार ने पीड़ितों के लिए हेल्पलाइन कॉल सेंटर, चक्षु ऐप और पुलिस कर्मियों के लिए डिजिटल हाइजीन पर प्रशिक्षण शिविर शुरू किए हैं.

“पारंपरिक अपराधों, जैसे कि हत्या में, पुलिस को बढ़त मिलती है. लेकिन साइबर अपराध में, अपराधियों और पुलिस के पास समान तकनीक, इंटरनेट और जानकारी उपलब्ध होती है,” आईपीएस सुशील कुमार ने कहा. “यह दोनों के लिए एक समान स्तर का मैदान है.”

बिहार के साइबर सेल में स्टाफ की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है.

ईओयू, बिहार की साइबर क्राइम यूनिट के प्रभारी, 2002 बैच के आईपीएस अधिकारी आईजी राकेश राठी ने पुलिस अधिकारियों के सामने आने वाली चुनौतियों को स्वीकार किया.

Bihar cyber crime
नवादा साइबर पुलिस स्टेशन की दीवारें जागरूकता पोस्टरों से सजी हैं, जो बिहार में साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे को उजागर करती हैं। फोटो: ज्योति यादव

उन्होंने कहा, “हमारे अधिकारी आमतौर पर जनरलिस्ट के रूप में प्रशिक्षित होते हैं, जो कई प्रकार के अपराधों और कानून-व्यवस्था की स्थितियों को संभालते हैं। जबकि साइबर अपराधी और ठग विशेष रूप से इस क्षेत्र में कुशल होते हैं.”

हालांकि, राठी ने पुलिस की रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा किया.

“जिन अधिकारियों की साइबर अपराधों में रुचि है और जिनके पास डोमेन नॉलेज है, उन्हें चयनित कर व्यापक प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे इन जटिल मामलों को बेहतर तरीके से सुलझा सकें.”

इस साल का बिहार पुलिस सप्ताह, जो 22 से 27 फरवरी तक आयोजित किया जा रहा है, साइबर अपराधों से निपटने और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने पर केंद्रित है.

हालांकि, इन मामलों में निपटान दर बहुत कम है, और सजा दर तो और भी कम. नवादा साइबर पुलिस के अनुसार, 2023 में दर्ज 68 एफआईआर में से केवल तीन मामलों का निपटारा हुआ.

यह पैटर्न सभी साइबर हॉटस्पॉट में आम है—छापे मारे जाते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, चार्जशीट दाखिल की जाती हैं, आरोपी जमानत पर छूट जाते हैं. लेकिन जब सजा दिलाने की बात आती है, तो कई कानूनी खामियां सामने आ जाती हैं.

“फिलहाल, साइबर अपराधों पर आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई होती है, जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम जैसा ही है. आसानी से जमानत मिल जाती है, और नाबालिगों को किशोर सुधार गृह भेजा जाता है, जहां से वे कुछ समय बाद छूट जाते हैं,” सुशील कुमार ने कहा। उन्होंने स्वीकार किया कि बड़े मामलों में सजा दिलाना मुश्किल होता है.

पीड़ितों की कहानी

जिस दिन मुकेश के साथ धोखाधड़ी हुई, उसी दिन जालसाजों ने पटना के एक दर्जी बीरेंद्र ठाकुर को कई बार फोन किया. प्रेग्नेंसी स्कैम में उसने 4,470 रुपए गंवा दिए.

ठाकुर ने दिप्रिंट को बताया, “मैं अंगूठा छाप हूं. जब मुझे फेसबुक पर एक युवती की फोटो और ‘मुझे कॉल करें’ वाला नंबर मिला, तो मैंने फोन किया.” सबसे पहले, उससे 500 रुपए का रजिस्ट्रेशन फीस देने को कहा गया. फिर उसे 5,500 रुपए सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर देने को कहा गया. जब ठाकुर ने कहा कि उसके पास इतने पैसे नहीं हैं, तो जालसाजों ने उसे भरोसा दिलाया कि वह जो भी रकम दे सकता है, उसे स्वीकार कर लिया जाएगा.

ठाकुर ने अपनी बचत खर्च कर दी, यह सोचकर कि जब उसे पैसे मिलेंगे, तो वह इसकी भरपाई कर देगा. उसने ‘पहचान पत्र’ और होटल के विवरण का इंतजार किया, लेकिन फिर कभी उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ. जब से नवादा पुलिस ने उन्हें बताया कि यह एक घोटाला है और वह किसी महिला को गर्भवती करने के लिए पटना के किसी तीन सितारा होटल में नहीं जा रहे हैं, तब से ठाकुर ने अनजान कॉल का जवाब देना बंद कर दिया है.

उन्होंने कहा, “मैं उन्हें कोसता हूं. उन्होंने मेरे जैसे गरीब व्यक्ति को ठगा है.” उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने अपने परिवार में किसी को नहीं बताया है और अपनी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी में उथल-पुथल से बचने के लिए इसे गुप्त रखना चाहते हैं.

उन्होंने कहा, “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, कि मैं एक अनजान महिला को गर्भवती करके 10 लाख रुपये कमाना चाहता था?” ठाकुर ने यह भी बताया कि महिलाओं की तस्वीरें “हाई-प्रोफाइल” नहीं थीं. वे “आम महिलाएं” थीं, जिससे पूरे घोटाले की प्रामाणिकता का पता चलता है.

मुकेश के मामले में, धोखेबाजों ने चौथी कॉल के दौरान पुलिसकर्मी होने का नाटक किया. उन्होंने दावा किया कि अवैध सेक्स वर्क में शामिल होने के आरोपों से बचने के लिए उन्हें 25,000 रुपये की फीस देना होगी. तभी मुकेश ने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया और पाया कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है. उन्होंने अपनी 6,400 रुपये की बचत खो दी और हैदराबाद लौट आए, जहां वे राजमिस्त्री का काम करते हैं और लगभग 350-400 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं.

पुलिस को निराशा इस बात से है कि ‘ऑल इंडिया प्रेग्नेंट जॉब सर्विस’ का फेसबुक पेज अभी भी 2,000 से अधिक सदस्यों के साथ एक निजी समूह के रूप में चल रहा है.

डीएसपी ज्योति ने कहा, “हमने मेटा को लिखा है, लेकिन हमें अभी भी नहीं पता कि यह अभी भी क्यों चालू है. यह अब टेलीग्राम ग्रुप और व्हाट्सएप में भी घुस गया है.”

आसानी से पैसे कमाना

कहुआरा गांव में, हर कोई उस छापेमारी के बारे में चुप है जिसके कारण दो लोगों और नाबालिग की गिरफ्तारी हुई. गिरोह में शामिल साढ़े 17 वर्षीय किशोर की मां घौली देवी ने कहा, “मेरे बेटे ने कुछ गलत नहीं किया है. मैंने उसे गाय चराने के लिए भेजा था.”

उनका पति मुंबई में दिहाड़ी मजदूर है और उसके पास कोई नहीं है. हालांकि, घौली देवी के बेटे जैसे युवा इस बहुस्तरीय उद्योग में सिर्फ पैदल सैनिक हैं. डिजिटल लेनदेन के जरिए पैसा इकट्ठा किया जाता है. फिर समूह ऑनलाइन ऑर्डर देते हैं और नकदी प्राप्त करने के लिए उत्पादों को ऑफलाइन बाजार में बेचते हैं. एक अन्य तरीका देश भर के प्रवासी मजदूरों के नाम पर खोले गए खाली बैंक खातों का उपयोग करके पैसे निकालना है.

एक ‘सुधारे हुए’ ठग के अनुसार, बड़े खिलाड़ी करोड़ों रुपये कमाते हैं और इसका इस्तेमाल मुर्गी पालन, ईंट भट्टों या रियल एस्टेट जैसे वैध व्यवसायों में करने के लिए करते हैं.

Ghauli Devi
घौली देवी अपने घर में | फोटो: ज्योति यादव

“युवाओं की नई फसल मुश्किल से 1,000 रुपये प्रतिदिन कमाती है. लेकिन वे ही गिरफ़्तार किए जाते हैं,” उन्होंने कहा.

8,600 मतदाताओं वाला गांव कहुआरा 12 वार्डों में फैला हुआ है और इसमें सात सरकारी स्कूल हैं. गांव के मुखिया दिनेश कुमार सिंह सभी स्कूलों, शिक्षकों और बुजुर्गों का चक्कर लगा रहे हैं और यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि युवा इस घोटाले में कैसे फंस गए. वे अन्य गांव के मुखियाओं से भी पूछताछ कर रहे हैं.

दिनेश कुमार सिंह ने कहा, “कोई कैसे जान सकता है कि युवा अपने मोबाइल फोन के साथ क्या कर रहे हैं? यह एक रोज़मर्रा की डिवाइस है.” कुछ सकारात्मक ध्यान आकर्षित करने और अपनी छवि बचाने के प्रयास में उन्होंने गांव में एक लाइब्रेरी खोली.

उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि युवा सम्मानजनक नौकरी करें और अगर वे खुद को बहुत आलसी पाते हैं तो अपने मोबाइल पर साइबर घोटाले करने के बजाय किताबों की ओर लौटें.” लेकिन उनकी अच्छी मंशा उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के विपरीत है.

वे आरोपियों के परिवारों या उन लोगों से भिड़ नहीं सकते जिन पर उन्हें साइबर घोटाले चलाने का संदेह है – आधे गांव को नाराज़ किए बिना नहीं. “यह अब गांव के वोटों का ध्रुवीकरण कर रहा है.” साइबर अपराध के हॉटस्पॉट जैसे कतरीसराय और वारिसलीगंज के कई गांवों ने अपने नेताओं को वोट देकर सत्ता से बाहर कर दिया है क्योंकि वे उन्हें बचाने में असमर्थ हैं.

भिनू राम, जिन्होंने 2023 में कृषि निरीक्षक के रूप में जिला मुख्यालय में जाने से पहले छह साल तक कहुआरा में ग्राम सचिव के रूप में काम किया था, ने देखा है कि साइबर अपराध ने गांव के सामाजिक ताने-बाने को कैसे बदल दिया है.

उन्होंने कहा, “गांव के मुखिया इस बात से हैरान हैं कि पुलिस उनके पंचायतों में दस्तक दे रही है, यह थोड़ा अतिशयोक्ति है। वे सभी जानते हैं कि क्या चल रहा है.” उन्होंने आगे कहा, “अगर आप फसल, मवेशी या नकदी चुराते हैं, तो आपको गांव में चोर के रूप में पहचाना जाता है और आपका सामाजिक बहिष्कार किया जा सकता है. लेकिन अगर आप खेतों या बागीचों में मोबाइल फोन पर काम कर रहे हैं, तो कोई ध्यान नहीं देता.”

उन्होंने कहा कि साइबर डकैती अब एक सामाजिक रूप से स्वीकृत पेशा बन गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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