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Tuesday, 16 July, 2024
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दार्जिलिंग की पहचान- चाय खो रही अपनी महक, नेपाल ही केवल समस्या नहीं 

कुर्सियांग और अन्य जगहों पर दार्जिलिंग चाय के दो कप की कीमत 500 रुपये है. चाय बागानों में 8 घंटे की ग्राइंडिंग शिफ्ट में श्रमिकों को दैनिक मजदूरी के रूप में 230 रुपये मिलते हैं.

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दार्जिलिंग: बनर्जी परिवार कर्सियांग के पास मार्गरेट डेक टी लाउंज में ताजा पीसी हुई विंटेज सफेद चाय के प्याले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. ‘चाय की शैम्पेन’ की हर घूंट के साथ, डूबी हुई पत्तियों के बारीक नोट्स अपना जादू चलाते हैं. ‘ज़बर्दस्त!’ संजय बताते हैं, नहीं चाहते कि प्याला जाए, उसकी गर्माहट को अपनी उंगलियों में रिसने देते हैं. कर्सियांग के लोकप्रिय कैफे में, इस सफेद विंटेज के दो कप प्याले की कीमत 500 रुपये है.

दार्जिलिंग के लेबोंग में एक चाय बागान में वापस, प्रेरणा गुरुंग दिन के लिए अपनी मजदूरी के पैसे गिनती हैं. वह 8 घंटे के पसीने और श्रम के लिए 230 रुपये कमाए हैं. यह एक नाशुक्रा काम है, लेकिन प्रेरणा चाय बागान में काम करना जारी रखती हैं, इस उम्मीद में कि एक दिन वह अधिक पैसा कमाएंगी- कम से कम अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त.

दार्जिलिंग के एक लाख से अधिक चाय श्रमिकों के बीच असंतोष पनप रहा है – स्थायी और अस्थायी दोनों तरह के श्रमिकों में. लेकिन श्रम उन कई चुनौतियों में से एक है जिसे बीमार चाय उद्योग बाहर लाना है. नेपाल और जलवायु परिवर्तन, जिले की चाय की पत्तियों की उपज और बिक्री को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं.

दार्जिलिंग टी एसोसिएशन के चेयरपर्सन बीके सरिया कहते हैं. दार्जिलिंग में 87 चाय बागान हैं और सभी काम कर रहे हैं. ‘2017 की राजनीतिक हिंसा से पहले (गोरखालैंड के एक अलग राज्य की मांग पर), दार्जिलिंग में 14 मिलियन किलोग्राम चाय का उत्पादन होता था. इस साल (2022), इसने लगभग 6.7 मिलियन किलोग्राम का ही उत्पादन किया है. मजदूरी एक फैक्टर है, लेकिन बड़ी चिंताएं नेपाल से चाय के सस्ते उपज और जलवायु से कड़ी प्रतिस्पर्धा हैं.’

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में हैप्पी वैली टी एस्टेट गार्डन के मजदूर | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

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नेपाल समस्या

दार्जिलिंग नेपाल के साथ अपनी सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है, जो 101 किमी है. पड़ोसी देश की अभी शुरू हुई लेकिन पहले से ही फल-फूल रहे चाय उद्योग की कम गुणवत्ता वाली पत्तियां भारत में आ रही हैं, जिससे स्थानीय चाय बागान मालिकों को काफी निराशा हुई है.

केंद्र सरकार के मुक्त व्यापार समझौते के तहत नेपाल से चाय का आयात बिना शुल्क के किया जा सकता है.

सरिया कहते हैं, ‘नेपाल की व्यापार नीतियां हमारी दार्जिलिंग चाय के मुकाबले चाय के सस्ते उपज को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं. यह आज सबसे बड़ा खतरा है.’

2021 में, नेपाल ने भारत को 11.47 मिलियन किलोग्राम चाय का निर्यात किया. 2022 में, लगभग 10.5 मिलियन किलोग्राम नेपाली चाय कथित तौर पर अक्टूबर तक भारत में आई. अब बागान मालिक सरकार से दार्जिलिंग चाय की रक्षा के लिए उपाय करने का आग्रह कर रहे हैं, जो 2004 में भौगोलिक निशान या जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला भारतीय उत्पाद था.

सरिया कहते हैं, ‘हम चाहते हैं कि भारत सरकार दार्जिलिंग चाय को बचाने के लिए नेपाल चाय पर 100% आयात शुल्क लगाए. यहां तक कि बांग्लादेश भी अपने उद्योग को बचाने के लिए भारतीय चाय पर 85% आयात शुल्क लगाता है.’

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में हैप्पी वैली टी एस्टेट गार्डन के मजदूर | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

2020-21 में, नेपाल ने 23,000 टन से अधिक चाय का उत्पादन किया, लेकिन गुणवत्ता खराब थी. उनकी झाड़ियां तुलनात्मक रूप से कच्ची होती हैं और गुणवत्ता की जांच उतनी कड़ी नहीं है जितनी दार्जिलिंग के चाय बागानों में होती है. यहां के चाय बागान मालिकों के लिए यह एक पीड़ादायक वजह है.

सरिया का दावा है, ‘इससे भी बुरी बात यह है कि नेपाल की चाय को अक्सर नकली दार्जिलिंग चाय के रूप में बेचा जाता है. और इसकी निम्न स्तर के कारण, कीमत प्रामाणिक दार्जिलिंग चाय की तुलना में बहुत सस्ती है, और यह आलमारियों से जल्दी खत्म हो जाती है.’

सरिया कहते हैं, भारतीय चाय व्यापारियों का दावा है कि दार्जिलिंग चाय की कीमत की बोली 300-400 रुपये प्रति किलोग्राम होती है जबकि नेपाल चाय के लिए शुरुआती बोली 150 रुपये प्रति किलोग्राम से कम होती है. ‘इससे मूल दार्जिलिंग चाय की बिक्री में बाधा आई है और कोविड के बाद चाय व्यवसाय की रिकवरी भी धीमी हो गई है. जब तक भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करती और प्रतिबंध नहीं लगाती, दार्जिलिंग चाय के लिए बचे रहना कठिन होगा.’

दार्जिलिंग में उगाई जाने वाली चाय का लगभग 75 प्रतिशत एशिया, यूरोप, मध्य पूर्व और अब अमेरिका में भी निर्यात किया जाता है.

सारदा ने कहा, लेकिन दार्जिलिंग की नाथमुल्स चाय के चौथी पीढ़ी के मालिक शैलेश सारदा अधिक आशावादी हैं. ‘दार्जिलिंग चाय लोकप्रिय रहेगी और बाजार से बाहर नहीं होगी. यहां से जिस भारी कीमत पर चाय का निर्यात किया जाता है, उसे देखकर आप चौंक जाएंगे. प्रीमियम चाय विदेशों में लाखों में बिकती है. और अब, अमेरिकी बाजार भी खुल रहा है, चाय उद्योग को और अधिक कारोबार दे रहा है. हालांकि, हमारे देश के भीतर बाजार सिकुड़ा हुआ है.’

सरिया आश्वस्त नहीं

वह कहते हैं, ‘दार्जिलिंग चाय की नीलामी कीमतों में कोई कमी नहीं आई है. चाय की ऊंची बोली नहीं लग रही है, जिससे उत्पादकों पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है. उन्हें लागत में कटौती के साथ संतुलन बनाना होगा.’

और मजदूर इसकी कीमत चुका रहे हैं.

मुश्किल जगह में फंसी

45 वर्षीय प्रेरणा गुरुंग ने लगभग 30 साल पहले दार्जिलिंग के लेबोंग में एक चाय बागान में काम करना शुरू किया था, तब जब वह शादी के बाद वहां गई थीं.

प्रेरणा ने कहा, ‘यह वह जगह है जहां मैंने दिन में 8 घंटे बिताए,’ कंचनजंगा के ऊपर ढलान पर देखते हुए चाय की झाड़ियों को काटते हुए कहा. तुड़ाई का सीजन खत्म हो गया है. सर्दियों के महीनों में, दार्जिलिंग के चाय कर्मचारी बगीचों की सफाई करेंगे और झाड़ियों की छंटाई करेंगे, उन्हें अगले साल वसंत में खेती के लिए तैयार करेंगे.

प्रेरणा अपने सात सदस्यों के परिवार में अकेली कमाने वाली हैं. उनके पति को कैंसर हैं जो अब चाय बागानों में काम नहीं कर सकते. उनकी बेटी, जो 11वीं में पढ़ती है, एयर होस्टेस बनने का सपना देखती है. लेकिन प्रेरणा 6,900 रुपये के वेतन पर अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी में फंसी हुई हैं.

दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में चाय बागानों में काम करने वाली अन्य महिलाओं के बच्चों की देखभाल करती एक चाय बागान की मजदूर | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट.

प्रेरणा कहती हैं, ‘हमारा वेतन दो किश्तों में आता है, और हम जिस दिन काम नहीं करते हैं, तो हमें उस दिन का भुगतान नहीं मिलता है. आजकल सब कुछ इतना महंगा है, इतनी कम तनख्वाह से घर में सबको खुश रखना बहुत मुश्किल है.’

सप्ताह में छह दिन, वह सुबह 5 बजे उठती हैं, अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं, घर की सफाई करती हैं, काम के लिए तैयार होती हैं और सुबह 7 बजे तक चाय बागान पहुंच जाती हैं. 15 मिनट की चढाई के बाद, वह बगीचे में काम करना शुरू कर देती हैं.

प्रेरणा ने कहा, ‘कुछ रातों में जब घर वापस जाती हूं, तो बहुत थकान होती है, लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता है. मैं रात का खाना बनाती हूं, खाना परोसती हूं और बर्तन साफ करके सो जाती हूं.’ ‘एक चाय कर्मचारी के रूप में, हमें कोई लाभ नहीं मिलता है. यहां तक कि जो जूते हम पहनते हैं, वे भी हमारे ही पैसे के होते हैं.’

अपने बच्चों को दार्जिलिंग के एक स्कूल में भेजने के लिए, उन्हें 10 किलोमीटर के आने-जाने के लिए 100 रुपये देने पड़ते हैं. वह कहती हैं, ‘जाने में 50 रुपये और लौटने में 50 रुपये लगते हैं. मेरे 230 रुपये के रोजाना के वेतन से 100 रुपये काट लिए गए हैं,’


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प्रेरणा की तरह चाय बागान के हजारों मजदूर अपनी दशा सुनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

दार्जिलिंग के चाय व्यापार संघ के आंकड़ों के अनुसार, पहाड़ियों के चाय बागानों में लगभग 60,000 स्थायी चाय श्रमिक और 80,000 से अधिक अस्थायी श्रमिक हैं.

दार्जिलिंग नगरपालिका चलाने वाली हाम्रो पार्टी के ट्रेड यूनियन विंग के महासचिव जयंत राय ने कहा, ‘चाय बागान हमारे लिए एक भावना हैं, यह दार्जिलिंग को इसकी पहचान देता है. लेकिन यह सबसे उपेक्षित क्षेत्र है. चाय यहां का सबसे बड़ा उद्योग है, लेकिन श्रमिकों की उच्च मजदूरी और उचित रहने की स्थिति की मांग बुनियादी है. मैंने अपने परिवार में चाय श्रमिकों की चार पीढ़ियों को देखा है, हम सम्मान के जीवन के हकदार हैं.’

लेबोंग घाटी, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में गिंग टी एस्टेट में एक महिला मजदूर फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

सितंबर 2022 में, हाम्रो पार्टी के प्रमुख अजॉय एडवर्ड्स ने चाय बागान श्रमिकों के लिए बोनस मांगने के अभियान का नेतृत्व किया. दार्जिलिंग के पास एक चाय बागान में, श्रमिक अपने न दिए गए वार्षिक पूजा बोनस का विरोध कर रहे थे. एडवर्ड्स ने अपने हाथ से खून निकाला और चाय की झाड़ियों पर छिड़क दिया. और इसलिए #BloodTea अभियान शुरू हुआ, जिसकी चाय उद्योग से आलोचना हुई. दार्जिलिंग में चाय बागान मालिकों ने एडवर्ड्स पर अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया और राज्य सरकार से इस ‘झूठे अभियान‘ के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया.

लेकिन अभियान ने श्रमिकों के अधिकारों को फिर से ध्यान में ला दिया.

एडवर्ड्स ने दिप्रिंट को बताया, ‘दार्जिलिंग चाय का जीआई टैग है, लेकिन इस उद्योग की स्थिति गंभीर है. चाय के बागान दार्जिलिंग की रीढ़ हैं. हम चाय श्रमिकों के लिए तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि उन्हें वह नहीं मिल जाता जिसके वे हकदार हैं.’

दार्जिलिंग चाय बागान के श्रमिक बागान श्रम अधिनियम 1951 के तहत आते हैं, जो उन्हें बोनस, भविष्य निधि, आवास, ग्रेच्युटी, सुरक्षात्मक कपड़े, पेशबंद, छाता, राशन, मुफ्त चिकित्सा सुविधाओं और अन्य प्रोत्साहनों का हकदार बनाता है. लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, 15 से 20 चाय बागानों को घटते मुनाफे और कम पैदावार के कारण अपने कर्मचारियों को मजदूरी और बोनस देने में मुश्किल हो रही है.

जलवायु परिवर्तन

वर्षों से, चाय बागान के मालिकों ने देखा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अति मौसमी घटनाएं न केवल उपज बल्कि चाय की सुगंध को भी प्रभावित कर रही हैं.

दार्जिलिंग दुनिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जो सभी चार मौसमों में चाय का उत्पादन करता है या फ्लश/कटाई करता है. प्रत्येक फ्लश की अपनी विशिष्ट सुगंध, रंग और स्वाद होता है. लेकिन जलवायु परिवर्तन अब एक बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि यह फसल के सीजन को काफी कम कर देता है.

सरिया ने कहा, ‘शुष्क सर्दियां, कम वर्षा और भूस्खलन ने चाय की तुड़ाई के सीजन में बाधा पैदा की है. अनियमित मौसम चाय की तुड़ाई करने वालों के लिए एक बड़ी समस्या पैदा कर रहा है क्योंकि इससे उपज कम हो रही है.’

लेबोंग घाटी, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में गिंग टी एस्टेट से गुजरती एक महिला मजदूर | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

दार्जिलिंग टी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर द्वारा 2013 के एक अध्ययन में पाया गया कि 1993 से 2012 तक कर्सियांग में तापमान 0.51 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है. इसी अवधि के दौरान, वार्षिक बारिश में 152.50 सेमी की गिरावट आई है, जबकि सापेक्ष आर्द्रता में 16.07 प्रतिशत की गिरावट आई है. इन फैक्टर्स ने मिट्टी के कटाव, चाय की झाड़ियों की उम्र और अकार्बनिक खेती प्रथाओं के स्विच के साथ-साथ चाय पूरे उत्पादन की गिरावट में योगदान दिया है.

सरिया ने कहा, ‘इस साल लगभग सूखे जैसी स्थिति थी. गर्मी इतनी तेज थी कि चाय उगाना कठिन था. अच्छी चाय के फलने-फूलने के लिए ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है. जलवायु एक बड़ी वैश्विक चिंता है और यह निश्चित रूप से चाय के उत्पादन को प्रभावित करती है.’

2015 में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वर्गीय महारानी एलिजाबेथ को मकाईबारी चाय की सुगंधित दार्जिलिंग किस्म का उपहार दिया था – दोनों देशों के बीच चाय के साझा इतिहास के याद को लेकर. चीन के एकाधिकार का मुकाबला करने के लिए 19वीं शताब्दी में दार्जिलिंग और भारत के अन्य हिस्सों में चाय बागान शुरू करने वाले अंग्रेज़ थे. आज, एक सदी से भी अधिक समय के बाद, दार्जिलिंग के चाय बागानों में संकट पैदा हो रहा है क्योंकि वे लोग इस अंधेरी दुनिया में अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

(संपादन : इन्द्रजीत)

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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