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Friday, 6 February, 2026
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पायल तड़वी आत्महत्या मामला: 7 साल बाद भी, जिस केस से नए UGC नियम बने, वह अब तक अधर में क्यों है

भक्ति मेहरे, हेमा आहूजा और अंकिता खंडेलवाल—जो उसकी तीन सीनियर थीं—को शुरू में उत्पीड़न और जातिवादी टिप्पणियों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया. मामला अभी भी अटका हुआ है.

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मुंबई: कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव से निपटने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनवरी में लगाई गई रोक ने एक बार फिर 2019 में हुई पायल तड़वी की आत्महत्या के मामले को चर्चा में ला दिया है. मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल में गायनेकोलॉजी और ऑब्सटेट्रिक्स की सेकेंड ईयर की पोस्टग्रेजुएट छात्रा पायल ने अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली थी. इसी मामले के बाद यूजीसी के नियमों में संशोधन किया गया था, जिन पर अब रोक लगी हुई है.

जैसे 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला (26) ने कथित जातिगत भेदभाव के बाद आत्महत्या की थी, वैसे ही 26 साल की पायल, जो तड़वी मुस्लिम भील अनुसूचित जनजाति समुदाय से थीं, को भी जातिवाद का शिकार बताया जाता है.

पायल की तीन सीनियर सहकर्मियों—भक्ति मेहरे, हेमा आहूजा और अंकिता खंडेलवाल—को शुरुआत में पायल को परेशान करने और जातिसूचक टिप्पणियां करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

जुलाई 2019 में मुंबई पुलिस ने तीनों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की. ट्रायल के दौरान, अगस्त 2019 में, गिरफ्तारी के सिर्फ तीन महीने बाद, भक्ति, हेमा और अंकिता को जमानत मिल गई. फरवरी 2020 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनके मेडिकल लाइसेंस बहाल करने का आदेश दिया, जिन्हें मामला सामने आने के बाद निलंबित कर दिया गया था.

यह मामला अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है. पायल की मौत के छह साल से ज्यादा समय बाद भी उनके माता-पिता, आबेदा और सलीम तड़वी, अब भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं.

आबेदा तड़वी ने दिप्रिंट से कहा, “शुरुआत में हमें बताया गया था कि मामला फास्ट ट्रैक किया जाएगा और नौ महीने में फैसला आ जाएगा. लेकिन अब सात साल हो चुके हैं और हम अब भी इंतजार कर रहे हैं.”

2019 में आबेदा तड़वी ने रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी. इसमें कॉलेज कैंपस में जातिगत भेदभाव से निपटने और इस संबंध में 2012 के यूजीसी नियमों को सख्ती से लागू करने की मांग की गई थी.

Graphic by Deepakshi Sharma | ThePrint

मामले के अंत में जब 2026 के नियम अपडेट किए गए, तो ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन किए. फिलहाल नए नियमों के लागू होने पर रोक लगी हुई है.

छोटे कमरे, बड़े सपने

पायल जलगांव में अपने माता-पिता और भाई रितेश के साथ एक साधारण दो कमरे के घर में पली-बढ़ी थीं. रितेश पोलियो से प्रभावित हैं. पायल पहली बार घर से बाहर निकली थीं, जब वह एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए जलगांव से करीब 670 किलोमीटर दूर मिरज के सरकारी मेडिकल कॉलेज गईं.

ग्रेजुएशन के बाद पायल ने सांगली स्थित पीवीपी सरकारी अस्पताल में एक साल की इंटर्नशिप पूरी की. 2016 में उन्होंने वैलेंटाइन डे के दिन सलमान तड़वी से शादी की. सलमान भी डॉक्टर थे और मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में एनेस्थीसिया में एमडी कर रहे थे. बाद में उन्होंने विले पार्ले के कूपर अस्पताल में नौकरी कर ली. कुछ समय बाद पायल पोस्टग्रेजुएट पढ़ाई के लिए मुंबई आ गईं. सलमान ने नायर अस्पताल के पास महालक्ष्मी में एक फ्लैट किराए पर लिया था.

तड़वी मुस्लिम भील समुदाय पारंपरिक रूप से खेती से जुड़ा रहा है और शिक्षा व्यवस्था में यह समुदाय लंबे समय तक हाशिये पर रहा. ऐसे में पायल की महत्वाकांक्षाएं उनके समुदाय के भीतर और बाहर दोनों जगह अलग दिखती थीं. पायल की मौत के बाद उनके दुखी माता-पिता ने मीडिया को बताया था कि वह न सिर्फ परिवार की पहली डॉक्टर थीं, बल्कि शायद पूरे समुदाय की पहली महिला डॉक्टर भी थीं.

पायल की मौत के बाद, एमबीबीएस के दिनों की उनकी दोस्तों ने दिप्रिंट को बताया था कि वह एक खुशमिजाज और मिलनसार लड़की थीं. वह भी किसी आम युवा की तरह ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ देखना और अपने बैचमेट्स के साथ बाहर जाना पसंद करती थीं.

मिरज कॉलेज के उनके एक दोस्त, डॉ. रोमिल काकड़, ने 2019 में दिप्रिंट को बताया था कि नायर अस्पताल में 1 मई 2018 से शुरू हुए कोर्स के बाद पायल कई महीनों से परेशान थीं, इससे पहले कि उन्होंने अपनी जान ले ली.

डॉ. काकड़ ने बताया था कि 30 नवंबर 2018 को पायल ने उन्हें एक टेक्स्ट मैसेज भेजा था. उसमें उन्होंने लिखा था कि सभी लोग तनाव में हैं कि कहीं वह आत्महत्या न कर लें. उन्होंने बताया था कि पायल ने उन्हें अपनी तीन सीनियर डॉक्टरों के बारे में बताया था, जो उन्हें निशाना बना रही थीं और डिलीवरी और एपिसियोटॉमी जैसे प्रोसीजर करने नहीं देती थीं. एपिसियोटॉमी एक सर्जिकल कट होता है, जो मुश्किल डिलीवरी में मदद के लिए योनि में लगाया जाता है. पायल ने यह भी बताया था कि वे सीनियर उन्हें मरीजों और उनके रिश्तेदारों के सामने जोर-जोर से डांटती थीं.

चिट्ठी: ‘तंग किया गया और अनदेखा किया गया’

पायल की मौत के बाद, तीनों आरोपी सीनियर डॉक्टरों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया गया और उन्हें तुरंत कॉलेज से निलंबित कर दिया गया. उनके मेडिकल लाइसेंस भी निलंबित कर दिए गए. रिमांड सुनवाई के दौरान आरोपियों ने कहा कि उन्होंने तड़वी के खिलाफ कोई जातिसूचक टिप्पणी नहीं की और उनके सारे कमेंट पायल के कथित तौर पर काम से बचने को लेकर थे.

घटनास्थल पर कोई लिखित सुसाइड नोट नहीं मिला था, लेकिन मुंबई पुलिस को पायल के कमरे से हाथ से लिखे एक नोट की फोटो मिली थी. फॉरेंसिक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई कि यह पायल की ही लिखावट थी.

यह सुसाइड नोट उनके माता-पिता के नाम था. इसमें पायल ने अपनी हालत और एक अन्य छात्रा स्नेहल शिंदे की हालत के लिए सीधे तौर पर तीनों सीनियर महिला डॉक्टरों को जिम्मेदार ठहराया था.

नोट में पायल ने लिखा था कि नायर अस्पताल में उसे कुछ भी सीखने नहीं दिया गया और उसे सिर्फ क्लेरिकल कामों तक सीमित कर दिया गया. उसने यह भी लिखा कि विभागाध्यक्ष से की गई उसकी शिकायतों से भी कोई मदद नहीं मिली.

जुलाई 2019 में दाखिल की गई 1,203 पन्नों की चार्जशीट, जो तीन खंडों में थी, में करीब 180 गवाहों के बयान शामिल थे. चार्जशीट में जिन पायल के सहकर्मियों और स्टाफ के बयान जुड़े थे, उन्होंने बताया कि कैसे आरोपियों ने उसे अनुसूचित जनजाति समुदाय से होने और आरक्षित श्रेणी के तहत मेडिकल कोर्स में दाखिला पाने के कारण निशाना बनाया.

ध्यान देने वाली बात यह है कि चार्जशीट दाखिल हुए छह साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन अब तक आरोप तय नहीं किए गए हैं.

अगस्त 2019 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने तीनों आरोपियों को सख्त शर्तों के साथ जमानत दी थी, जिन्हें बाद में ढीला कर दिया गया.

अबेदा तड़वी ने दिप्रिंट से कहा, “तब से अब तक का ज़्यादातर समय आरोपियों की तरफ से जमानत की शर्तों में ढील देने की अलग-अलग अर्ज़ियों की सुनवाई में चला गया. मुख्य मामला पूरी तरह किनारे कर दिया गया है.”

यही एक चीज़ है जो उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है

नवंबर 2024 में, उस समय के स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर प्रदीप घरात ने मुंबई सेशंस कोर्ट में, जहां केस की सुनवाई हो रही थी, एक एप्लीकेशन दी. इसमें उन्होंने नायर हॉस्पिटल में गायनेकोलॉजी और ऑब्स्टेट्रिक्स के पूर्व हेड डॉ. चिंग लिंग चियांग को आरोपी के तौर पर शामिल करने की मांग की.

फरवरी 2025 में अदालत ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में च्यांग को आरोपी के तौर पर जोड़ने की अनुमति दे दी.

हालांकि, मार्च 2025 में महाराष्ट्र सरकार ने अचानक घरात को विशेष लोक अभियोजक के पद से हटा दिया और उनकी जगह किसी और को नियुक्त कर दिया.

इससे नाराज़ होकर अबेदा ने उसी महीने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया. उन्होंने राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें घरात को हटाया गया था. यह वही समय था जब च्यांग को सह-आरोपी बनाया गया था. यह मामला अब भी लंबित है.

अबेदा और सलीम 2019 से अदालत की सुनवाइयों में खुद मौजूद रहने के लिए मुंबई आते रहे हैं.

अबेदा ने कहा, “करीब छह महीने पहले तक हम महीने में दो बार आते थे. लेकिन हमारा मामला पिछले एक साल से बॉम्बे हाई कोर्ट में अटका हुआ है और सेशंस कोर्ट भी तारीख नहीं दे रही है. इसलिए हमारे वकील ने सलाह दी कि हम तभी आएं जब कोई बड़ा घटनाक्रम हो.”

उन्होंने कहा, “हमने इंसाफ की उम्मीद में इतनी लंबी लड़ाई लड़ी है कि अब लगता है इसे आख़िर तक पहुंचाना ही होगा. यही एक चीज़ है जो हमें आगे बढ़ने की ताकत देती है.”

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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