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Saturday, 2 March, 2024
होमएजुकेशनमेरी नियुक्ति ने उन 'प्रोगेसिव्स' को परेशान कर दिया है, जो सोचते थे कि जेएनयू उनका गढ़ है: वाईस चांसलर शांतिश्री पंडित

मेरी नियुक्ति ने उन ‘प्रोगेसिव्स’ को परेशान कर दिया है, जो सोचते थे कि जेएनयू उनका गढ़ है: वाईस चांसलर शांतिश्री पंडित

प्रो. शांतिश्री धुलीपुडी पंडित ने यह भी कहा कि जेएनयू में पैसों की गंभीर रूप से तंगी है, जिसके लिए उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों को दोषी ठहराया. उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि इस साल जेएनयूएसयू चुनाव होंगे.

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नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति (वी-सी) शांतिश्री डी. पंडित, जिन्होंने इसी साल फरवरी में अपना कार्यभार संभाला है, का मानना है कि उनकी नियुक्ति उन ‘प्रगतिशीलों (प्रोगेसिव्स)’ के लिए परेशान करने वाली हैं, जिन्होंने वर्षों से इस संस्थान को अपना गढ़ माना हुआ था.

पंडित ने दिप्रिंट के साथ एक साक्षात्कार में बताया, ‘नरेंद्र मोदी सरकार ने एक गैर-हिंदी भाषी, पिछड़े वर्ग की महिला को वी-सी के रूप में मेरी नियुक्ति के साथ कई वर्जनाओं (ग्लास सिलिंग्स) को तोड़ दिया हैं.’

प्रो. पंडित ने यह भी कहा कि यह विश्वविद्यालय फ़िलहाल 130 करोड़ रुपये की फंडिंग की कमी के साथ-साथ खराब गुणवत्ता वाले बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है और इसके लिए उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों को दोषी ठहराया.

पंडित ने कहा, ‘छात्रावासों का नवीनीकरण पिछले 15 वर्षों से किया ही नहीं गया है और छात्र बेहद खराब परिस्थितियों में रह रहे हैं. जब मैंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से बात की, तो उन्होंने अपनी मातृ संस्था (एल्मा मेटर) के लिए अपना पूरा समर्थन देने की पेशकश की.’ साथ ही उन्होंने बताया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय पहले ही रसोई और छात्रावासों के नवीनीकरण के लिए लगभग 57 करोड़ रुपये की राशि जारी कर चुका है.

यह समझाते हुए कि वह एक एलुमनाई एंडोमेंट फण्ड (पूर्व छात्र अनुदान कोष) बनाने, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कर्मचारियों को भाषा पाठ्यक्रम प्रदान करने, और विश्वविद्यालय में ‘एकेडेमिक चेयर्स’ की स्थापना पर काम कर रही हैं, प्रो. पंडित ने कहा ‘विश्वविद्यालय के पास 130 करोड़ रुपये का फंडिंग डेफिसिट (निधि घाटा) है. अब यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं यह सुनिश्चित करूं कि विश्वविद्यालय अपने लिए स्वयं कुछ वित्तीय संसाधन उत्पन्न करने में सक्षम हो.’

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‘टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं है हमारा विश्वविद्यालय’

पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद, पंडित ने जेएनयू के छात्रों की आलोचना करने वाले और भाजपा सरकार का समर्थन करने वाले पुराने ट्वीट्स की वजह से सुर्खियां बटोरीं थी. इन्हें कथित तौर पर उनके ही नाम वाले एक अन्य ट्विटर अकाउंट द्वारा पोस्ट किया गया था और इन्हें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया था. उन्होंने बाद में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया था कि उनका कभी कोई ट्विटर अकाउंट था ही नहीं, और यह भी कि ‘जेएनयू से जुड़े किसी व्यक्ति’ ने इस सारे विवाद को जन्म दिया हो सकता है.

इस विवाद के बारे में बोलते हुए, पंडित ने कहा कि उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, जहां उन्होंने जेएनयू आने से पहले काम किया था, में हमेशा मुस्लिम और ईसाई छात्रों का समर्थन किया था और वह अल्पसंख्यक विरोधी नहीं हैं जैसा कि दर्शाया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘जो कोई भी मुझे जानता है, वह जानता होगा कि वे ट्वीट मेरे विचारों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते थे. मेरे बारे में साझा की गई जानकारी भी गलत थी. मैं तमिलनाडु की एक पेरियार हूं और स्पष्ट रूप से मुझ पर हमला करने वाले लोग ऊंचीं जाति के, बहिष्कारवादी और मनुवादी पुरुष थे.’

वी-सी पंडित ने जेएनयू का वर्णन करने के लिए ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ मुहावरे के इस्तेमाल पर पूरी तरह से आपत्ति जताई, और इसे ‘वास्तविकता नहीं बल्कि कोरी बयानबाजी’ कहा.

उन्होंने कहा, ‘हर विश्वविद्यालय के अपने कुछ ‘सिरफिरे’ तत्व होते हैं जो किसी भी विचारधारा के चरम छोर पर होते हैं, लेकिन वह ‘फ्रिंज समूह’ समग्र रूप से पुरे विश्वविद्यालय का प्रतिनिधि नहीं होता.’

जेएनयू को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के लिए आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारे साठ प्रतिशत छात्र और पूर्व छात्र सिविल सेवाओं में हैं. इस देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल तीन मंत्री भी इसी विश्वविद्यालय से हैं. यह एक टुकड़े-टुकड़े विश्वविद्यालय कैसे हो सकता है?’

इस साल अप्रैल में, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा रामनवमी के अवसर पर एक छात्रावास में चिकन बनाये जाने को लेकर जेएनयू के छात्रों पर कथित रूप से शारीरिक हमला करने के बाद, वी-सी ने एक बयान में कहा था कि जेएनयू ‘राष्ट्र विरोधी नहीं है’.

‘इस साल छात्रसंघ चुनाव होने की उम्मीद है’

जेएनयू छात्र संघ (जेएनयूएसयू) के चुनाव, जो पिछले दो वर्षों से कोविड महामारी के कारण नहीं हुए हैं, के बारे में बात करते हुए पंडित ने कहा कि वह चुनावों के पक्ष में हैं क्योंकि वे बहस और चर्चा का अवसर प्रदान करते हैं. लेकिन इससे राजनीतिक लाभ हासिल करने की चाहत रखने वालों के लिए, उन्होंने कहा कि ‘जेएनयू अब राजनीतिक करियर के लिए एक कब्रगाह के समान है’

अपने इस बयान के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा, ‘हम उम्मीद कर रहे हैं कि हम इस साल छात्र चुनाव कराने में सक्षम होंगे. लेकिन इस बार, छात्रों को लिंगदोह समिति की सिफारिशों का पालन करना होगा, जिसे उन्होंने पहले मानने से इनकार कर दिया था. कुछ तत्वों की कुख्याति का राष्ट्रीय स्तर पर इस विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करना एक ऐसी चीज है जो मैं नहीं चाहती. छात्रों को यहां, इस परिसर में, अपनी राजनीतिक लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए.’

लिंगदोह समिति की सिफारिशों – जो कॉलेजों में स्वतंत्र और निष्पक्ष छात्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) शासनकाल के दौरान उल्लिखित दिशानिर्देशों का एक सेट है – को 2016 में जेएनयू छात्र निकाय द्वारा खारिज कर दिया गया था.

इस बीच, जेएनयू की कार्यकारी परिषद ने इस महीने की शुरुआत में विश्वविद्यालय में एक अंतरराष्ट्रीय मामलों के कार्यालय (इंटरनेशनल अफेयर्स ऑफिस) की स्थापना को मंजूरी दी दे थी. वीसी के अनुसार, इससे जेएनयू को संबंधों में सुधार करने और अन्य देशों के विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी.

इसके अलावा, पंडित ने बताया कि, ‘पीएमओ ने ऑफशोर कैंपस (देश के बाहर परिसर) स्थापित करने के लिए एक कमेटी बनाई है, और तकनीकी संस्थानों के अलावा, जेएनयू एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जिसकी काफी अधिक मांग है. अफ्रीकी संघ के पंद्रह देशों ने अपनी सरजमीं पर जेएनयू परिसरों की स्थापना के लिए अनुरोध किया है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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