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Saturday, 14 March, 2026
होमएजुकेशनपढ़ाई का सफर अधूरा: क्यों मुंबई के BMC स्कूलों के आधे से ज़्यादा छात्र बीच में स्कूल छोड़ देते हैं?

पढ़ाई का सफर अधूरा: क्यों मुंबई के BMC स्कूलों के आधे से ज़्यादा छात्र बीच में स्कूल छोड़ देते हैं?

एक नई रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में BMC स्कूलों में पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले छात्रों में से केवल 48% ही दसवीं कक्षा तक पढ़ाई जारी रख पाए. माध्यमिक स्कूलों की सीमित संख्या और बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों से जुड़ा डेटा उपलब्ध न होने के कारण, यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि ये छात्र आगे कहां जाते हैं.

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मुंबई: मुंबई के म्युनिसिपल स्कूलों में हज़ारों बच्चों के लिए, पहली क्लास में एक भीड़-भाड़ वाली क्लासरूम से शुरू होने वाला सफ़र अक्सर मंज़िल तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो जाता है. एक नई रिपोर्ट में पता चला है कि बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) स्कूलों में अपनी पढ़ाई शुरू करने वाले आधे से भी कम छात्र 10वीं क्लास तक इस सिस्टम में बने रहते हैं—जिससे शहर की पब्लिक शिक्षा में कमियों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं.

‘मुंबई में म्युनिसिपल शिक्षा की स्थिति 2026’ नाम की यह रिपोर्ट प्रजा फाउंडेशन ने जारी की है. अपनी वेबसाइट के अनुसार, यह एक “गैर-पक्षपातपूर्ण संगठन है जो जवाबदेह शासन को संभव बनाने की दिशा में काम करता है.” रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015-16 में BMC स्कूलों में पहली क्लास में दाखिला लेने वाले छात्रों में से सिर्फ़ 48 प्रतिशत ही 2024-25 तक 10वीं क्लास तक इस सिस्टम में बने रहे.

रिपोर्ट में पहली से 10वीं क्लास तक छात्रों के स्कूल में बने रहने की दर (रिटेंशन रेट) के विश्लेषण से पता चलता है कि जहां ज़्यादातर छात्र शुरुआती सालों में स्कूल में बने रहते हैं, वहीं 7वीं क्लास के बाद यह दर लगातार घटने लगती है. रिपोर्ट के अनुसार, इस रुझान की एक वजह उन म्युनिसिपल स्कूलों की कम संख्या है जो सेकेंडरी शिक्षा देते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, “पहली से 10वीं क्लास तक के रिटेंशन रेट दिखाते हैं कि 7वीं क्लास के बाद लगातार गिरावट आती है, जिसकी वजह शायद सेकेंडरी शिक्षा (8वीं क्लास से आगे) के लिए BMC स्कूलों की कमी हो सकती है.”

ग्राफ़िक: श्रुति नैथानी | दिप्रिंट

रिपोर्ट यह भी बताती है कि शहर में BMC द्वारा चलाए जा रहे कई स्कूलों में से 587 स्कूलों में पहली से 8वीं क्लास तक की पढ़ाई होती है, जबकि सिर्फ़ 75 स्कूलों में ही 9वीं और 10वीं क्लास की शिक्षा दी जाती है. इस ढाँचागत कमी का मतलब है कि म्युनिसिपल संस्थानों में प्राइमरी या अपर-प्राइमरी शिक्षा पूरी करने वाले बड़ी संख्या में छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए दूसरे स्कूलों में जाना पड़ता है, जिससे उनके बीच में ही पढ़ाई छोड़ने (ड्रॉपआउट) का खतरा बढ़ जाता है.

शुक्रवार को, प्रजा फाउंडेशन द्वारा रिपोर्ट जारी करने के लिए आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, डिप्टी म्युनिसिपल कमिश्नर (शिक्षा), प्राची जांभेकर ने कहा, “मुझे लगता है कि छात्रों के स्कूल में टिके रहने की दर (रिटेंशन रेट) काफी चिंताजनक है. ऐसा लगता है कि कई छात्र उन सरकारी स्कूलों में चले जाते हैं, जहां 9वीं और 10वीं कक्षा की पढ़ाई होती है. हमारी सबसे पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि हम छात्रों के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) से रोकें. किसी भी हाल में, किसी भी बच्चे को समय से पहले स्कूल नहीं छोड़ना चाहिए; उन्हें कम से कम 10वीं कक्षा तक अपनी पढ़ाई पूरी करनी ही चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने अनुरोध किया है कि अगली बार जब डेटा इकट्ठा किया जाए, तो उसमें खास तौर पर यह देखा जाए कि क्या छात्र सचमुच 9वीं और 10वीं कक्षा में अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं. शायद बोर्ड इस बारे में कोई सर्टिफिकेशन दे सकता है, खासकर यह जानकारी कि 10वीं कक्षा की परीक्षाओं में कितने छात्र शामिल हुए.”

यह रिपोर्ट छात्रों के स्कूल छोड़ने के बारे में लगातार मिलने वाले आधिकारिक डेटा की कमी पर भी चिंता जताती है.

रिपोर्ट में कहा गया है: “स्कूल छोड़ने वालों की संख्या कम करने के मकसद से चलाए गए राष्ट्रीय अभियानों, जैसे सर्व शिक्षा अभियान, RTE (2009), और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) के बावजूद, BMC के शिक्षा विभाग के पास वार्ड-वार, स्कूल-वार, कक्षा-वार या लिंग-वार बारीक डेटा रखने के लिए कोई सेंट्रलाइज्ड व्यवस्था नहीं है.”

“पिछले कुछ सालों से, प्रजा फाउंडेशन BMC स्कूलों में स्कूल छोड़ने वाले छात्रों की संख्या जानने के लिए RTI फाइल करता आ रहा है. हालाँकि, साल 2019-2020 के लिए दी गई जानकारी अधूरी थी; जबकि साल 2022-23 और 2023-24 के लिए, स्कूल छोड़ने वालों के बारे में कोई जानकारी दी ही नहीं गई,” रिपोर्ट में आगे कहा गया है.

BMC के अतिरिक्त म्युनिसिपल कमिश्नर, अविनाश धाकने ने ज़्यादा से ज़्यादा ओपन-सोर्स डेटा उपलब्ध कराने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया. “यह रिपोर्ट बुरी बातों से ज़्यादा अच्छी बातों को उजागर करती है, लेकिन रिटेंशन रेट और स्कूल छोड़ने वालों से जुड़े ये मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर काम करना बहुत ज़रूरी है. हमारे लिए यह समझना बहुत अहम है कि छात्र आखिर कहां जा रहे हैं. इसे ट्रैक करना (पता लगाना) इतना मुश्किल भी नहीं है. डेटा को ट्रैक भी किया जाना चाहिए और आम लोगों के लिए उपलब्ध भी कराया जाना चाहिए.”

अंग्रेज़ी को प्राथमिकता

प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट में म्युनिसिपल स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की भाषा की पसंद में आए एक बड़े बदलाव पर भी रोशनी डाली गई है. 2015-16 से 2024-25 के बीच, कुल स्कूल दाखिलों में BMC स्कूलों का हिस्सा थोड़ा बढ़कर 41 प्रतिशत से 44 प्रतिशत हो गया, जिससे पता चलता है कि म्युनिसिपल स्कूल शहर के छात्रों के एक बड़े तबके को शिक्षा देना जारी रखे हुए हैं.

हालांकि, शिक्षा के माध्यम में एक साफ़ बदलाव आया है.

इसी दौरान, मराठी-माध्यम वाले BMC स्कूलों में छात्रों के दाखिले में 34 प्रतिशत की गिरावट आई, हिंदी-माध्यम वाले स्कूलों में 39 प्रतिशत और उर्दू-माध्यम वाले स्कूलों में 30 प्रतिशत की गिरावट आई. इसके विपरीत, अंग्रेज़ी-माध्यम वाले म्युनिसिपल स्कूलों में दाखिलों में 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो यह दिखाता है कि अभिभावकों के बीच सरकारी शिक्षा व्यवस्था के तहत अंग्रेज़ी-भाषा में शिक्षा पाने की चाहत बढ़ रही है.

रिपोर्ट बताती है कि म्युनिसिपल स्कूलों में अंग्रेज़ी-माध्यम वाले सेक्शन के विस्तार का असर इस बदलाव पर पड़ सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है, “छात्रों की पसंद अब अंग्रेज़ी माध्यम और व्यवस्थित बोर्ड स्कूलों की ओर झुक रही है, जिससे इन श्रेणियों में औसत दाखिले बढ़ रहे हैं.”

रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई के सभी स्कूलों में कुल दाखिलों में BMC स्कूलों का हिस्सा थोड़ा बढ़ने के बावजूद, पिछले एक दशक में मुंबई की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में छात्रों की कुल संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, शहर के सभी स्कूलों में कुल दाखिले 2015-16 में 9,24,933 से घटकर 2024-25 में 7,08,763 रह गए, जो 23 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है.

रिपोर्ट में कहा गया है, “स्कूलों की कुल श्रेणियों में से, 83 प्रतिशत स्कूल ‘सेमी-इंग्लिश’ पैटर्न का पालन करते हैं, जिनमें कुल दाखिलों का 65 प्रतिशत हिस्सा आता है. इसकी तुलना में, अंग्रेज़ी-माध्यम वाले स्कूल कुल स्कूलों का 13 प्रतिशत हैं, लेकिन उनमें कुल छात्रों के दाखिलों का 35 प्रतिशत हिस्सा आता है.” प्रजा फाउंडेशन के CEO मिलिंद म्हस्के ने कहा, “अब जब चुने हुए प्रतिनिधि आ गए हैं, तो स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों को मज़बूत करने, स्कूल डेवलपमेंट प्लान बनाने और यह पक्का करने में पार्षदों की अहम भूमिका है कि वार्ड लेवल पर स्कूलों पर खास ध्यान दिया जाए. BMC स्कूलों के कामकाज को बेहतर बनाने और म्युनिसिपल शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा फिर से कायम करने के लिए, लोकल संस्थागत ढांचों को मज़बूत करना ही सबसे ज़रूरी होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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